प्रिय बराक,
आशीर्वाद और शुभकामनाएँ । हो सकता है कि चमचागीरी करनेवाले कहें कि अमरीका के राष्ट्रपति के लिए कुछ भारी-भरकम संबोधन होने चाहियें । पर पता नहीं हमें क्यों लगता है कि जब इतनी ही दूरी है तो फिर पत्र लिखने की ही क्या ज़रूरत है ? आप हमारे भूतपूर्व विद्यार्थियों या बच्चों की उम्र के हो तिस पर हम ब्राह्मण और भूतपूर्व अध्यापक । और आप जानते ही हो कि अध्यापक कभी रिटायर नहीं होता । सब को अपना चेला समझ कर पढ़ाने लगता है । हम ये भी जानते हैं कि आप सामान्य स्कूल में ही पढ़े हो जहाँ हम जैसे ही मास्टर पढ़ाते होंगे जो ऊपर से रूखे-सूखे दिखते होंगे पर अन्दर से अपनेपन से भरपूर । तथाकथित बड़े स्कूलों में तो अध्यापक बच्च्चों को पढ़ाते कम और उनसे पढ़ते अधिक हैं क्योंकि ऐसे बच्चे स्कूल में अपने नहीं, बाप के जूते पहन कर जाते हैं ।
हमने आपकी पुस्तक पढ़ी है । इसलिए नहीं कि आप राष्ट्रपति हो बल्कि इसलिए कि आप दूसरों से भिन्न राष्ट्रपति हो । आप ज़मीन से उठकर गए हो । आप में हमें मिट्टी और पसीने की गंध आती है । पुस्तक तो क्लिंटन ने भी लिखी और बिकी भी खूब पर हमने नहीं पढ़ी क्योंकि वह एक राष्ट्रपति और लम्पट-लीला के लिए कुख्यात हो चुके व्यक्ति का चोंचला था । आजकल सब जगह अपनी थोड़ी सी ख्याति या कुख्याति को भुनाने का रिवाज़ चल पड़ा है । तथाकथित बड़े लोगों को किराये पर लिखने वाले भी बहुत से मिल जाते हैं । उन्हें क्या पढ़ना । पर आपने यह पुस्तक राष्ट्रपति तो क्या, राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से भी पहले लिखी थी । इसलिए इस पुस्तक में एक विचारशील युवा है, एक काइयाँ राजनीतिज्ञ नहीं ।
आपने सपने देखे हैं और सपने भी टुच्चे नहीं बल्कि एक ईमानदार युवक के सपने देखे हैं । हम उन सपनों में शामिल होना चाहते हैं । आपके साथ केवल खाओ-पीओ और मौज करो वाले उपभोक्तावादी अमरीकी सपने ही नहीं, आपके रक्त में एशिया और अफ्रीका भी शामिल हैं जिनकी पुरानी, सादगी-पसंद और मेहनती संस्कृति रही है । आज अमरीका की संस्कृति में इनका छौंक लगना बहुत ज़रूरी है क्योंकि शुद्ध अमरीकी उपभोक्तावादी संस्कृति का परिणाम तो दुनिया देख ही रही है । केवल भोग, व्यक्ति ही नहीं, दुनिया को खा जाता है । अमरीका पर अणु विस्फ़ोट करने, शीत युद्ध भड़काने, इस्लामी कट्टर पंथ को हवा देने और मात्र भोग को ही जीवन का लक्ष्य बनाने वाली सोच का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व जाता है । जानेवाले तो आपके लिए काँटे बिछा कर चले जा रहे हैं । आपकी राह आसान नहीं है । आप के नाम बराक का अर्थ है 'वरदान'। भगवान आपको इस दुनिया के लिए वरदान बनने का सौभाग्य प्रदान करे । आप में समझ भी है, शक्ति के रूप में सत्ता भी मिल गई है । अब तो बस सत्संगति और मिल जाए क्योंकि उच्च पद वालों को मीठी बकवास करने वाले बहुत मिल जाते हैं और उसी में वक्त निकल जाता है । हमने अपने भूतपूर्व युवा प्रधान मंत्री राजीव गाँधी के साथ यह होते देखा है । वे दृष्टि संपन्न थे । नई तकनीक के विकास का रास्ता खोला जिसके कारण भारत आज कम्प्यूटर के क्षेत्र में एक शक्ति बना हुआ है । राजीव गाँधी को जितना बहुमत मिला उससे वे चाहते तो संविधान बदल सकते थे पर चमचों ने ऐसा करने का वातावरण ही नहीं बनने दिया । वे चाहते तो समान नागरिक संहिता, समान शिक्षा, धारा ३७० की समाप्ति आदि दूरगामी और क्रांतिकारी काम करवा सकते थे पर लोगों ने क्या सलाह दी- 'शाह बानो केस में मुस्लिम वोट पकाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को थूक चटवा दो' । फिर सलाह दी कि मन्दिर का ताला खुलवा कर हिन्दू समर्थन भी बटोर लो । हुआ यह कि दुविधा में न राम मिले और न माया । जूते भी खाए और प्याज भी । बस ऐसे घटिया सलाहकारों से बचना ।
आपका शपथ-ग्रहण समारोह बड़े ताम-झाम से हो रहा है । समय तो अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए ख़राब ही चल रहा है । हम आपकी जगह होते तो एक भी पैसा खर्च नहीं करते । आजकल टेलिविज़न है ही सारी दुनिया उसी पर देख लेती । पता नहीं यह इच्छा आपके ही मन में जगी है या किसी की नेक सलाह है । वैसे यह सच है कि गैर-गोरे लोगों के लिए तो यह ऐतिहासिक अवसर है । उनके मन में अब तब का सबसे बड़ा समारोह करने की इच्छा हो रही होगी । ऐसे समय में अधिक सादगी ज़्यादा असर डालती है । यही पैसा उन स्कूलों को दिया जा सकता था जहाँ काले और पिछड़े बच्चे पढ़ते हैं और जिनमें पैसों की बड़ी कमी है ।
हमारे यहाँ तो छोटे-मोटे कामों में भी भारी भीड़ जुट जाती है । पर आजकल भीड़ में भगदड़ मचने की कई घटनाएँ बहुत होने लगी हैं । इस मामले में काले-गोरों का कोई दंगा न हो जाए इसका भी ध्यान रखें । अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम समझेंगें कि आपके यहाँ लोग समझदार हो रहे हैं । गोरों के धैर्य की परीक्षा तो अब हो रही है ना । पहले जिस अमरीका ने उपभोक्तावाद का झंडा लहराया था और उसके परिणाम स्वरूप मंदी झेल रहा है, हम चाहते हैं कि वही अमरीका आपके नेतृत्व में सादगी, मेहनत और मितव्ययिता का भी उदाहरण पेश करे ।
आप लिंकन वाली बाइबल से शपथ लेंगे । आपका ध्येय वाक्य है- 'इन गोड आइ ट्रस्ट' । वैसे तो ईश्वर एक ही है, पर पता नहीं क्यों धर्म वाले इसे स्वीकार नहीं करते । ईश्वर को एक मानेंगे पर झगड़ा भी ईश्वर के ही नाम पर करेंगे । धर्म के नाम पर सेनाएँ लेकर निकलेंगे और मार-मार कर या फुसलाकर धर्म-परिवर्तन करवाएँगे । हमारे यहाँ तो गाँधीजी 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' गाते थे (और सिर्फ़ गाँधीजी ही गाते थे) । पर उनको किसी धर्मवाला अपने धर्म में जगह नहीं देता । क्या धर्म के लिए कट्टर होना ज़रूरी है ? हर धर्म ने अपना नया ईश्वर बनाया और निकल पड़े पुराने धर्मों को मिटाने । आपके सामने नस्ल ही नहीं धर्म की भी समस्याएँ आ सकती हैं । हमारे यहाँ तो ध्येय वाक्य है- 'सत्यमेव जयते' । हमारे उपनिषदों में तो सत्य ही ईश्वर है और साँच बरोबर तप नहीं -कहा गया है । सत्य ही सबसे अधिक वैज्ञानिक है । पर समस्या यह है कि सत्य को मान लेने से अलग-अलग दुकानें नहीं चल सकती । हम आपको हमारे संविधान का प्राण तत्व बताते हैं -
अयं निजः परोऽवेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
यह मेरा है, यह पराया है - यह हिसाब छोटे लोग लगाते हैं । उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी धरती ही एक परिवार है ।
यदि आप इस वाक्य से प्रेरणा लेंगे तो आप वास्तव में अपने नाम के अनुरूप संसार के लिए वरदान सिद्ध होंगे ।
आपके नेतृत्व में यह दुनिया बेहतर बने, इसी शुभकामना के साथ,
रमेश जोशी
१८ जनवरी २००९
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Jhootha Sach

बुश साहब,
हाय! बाय! बाय!! अलविदा, जैराम जी की । विदाई चाहे सेवा निवृत्ति पर हो चाहे ट्रांसफर पर या मरकर दुनिया से - आदमी का इस पर कोई बस नहीं है । सरकारी नौकरी में तो आदमी को बिस्तर बाँध कर रखना पड़ता है, पता नहीं कब आर्डर आ जाए । सरकारी नौकरी में कुछ ही ऐसे भाग्यशाली होते हैं जो अपने शहर में ही ज्वाइन करते हैं, वहीं सारे प्रमोशन लेते हैं और वहीं रिटायर हो जाते हैं । अगर कभी ट्रांसफर हुआ भी तो उसी शहर में, जैसे किसी की खाट इस कमरे से उस कमरे में लगा दी जाए । ट्रांसफर तो हमारे भी हुए पर जयपुर से सीधे पोर्ट ब्लेयर- तीन हज़ार किलोमीटर दूर । इच्छित स्थान पर पूरे सेवाकाल तक बने रहने की योग्यता प्राप्त करने का न तो समय मिला, न ही लोगों ने यह ट्रेड सीक्रेट बताया ।
कुछ के ट्रांसफर पर जाने से लोग दुखी होते हैं तो कुछ के आने पर । तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के प्रारम्भ में संतों और असंतों सभी को प्रणाम किया है । उन्होंने संतों और असंतों दोनों में एक समानता भी बताई है-
मिलत एक दारुण दुःख देही ।
बिछुरत एक प्राण हर लेही ॥
आपके मामले में तो पता नहीं ऐसा क्या संयोग हुआ कि जब आप आए तो ९/११ हो गया और जाने लगे तो अमरीकी अर्थव्यवस्था की आइसक्रीम मेल्ट डाउन होकर सड़क पर गिर पड़ी । अब उसे सड़क पर से उठाना मुश्किल हो रहा है । अगर एकांत हो तो और बात है पर जब सारी दुनिया देख रही हो तो ऐसा नहीं किया जा सकता न ! ऊपर से अफगानिस्तान और ईराक वाला चक्कर अलग । चलो, अब आपका तो पीछा छूटा । अब भुगतेगा तो बेचारा ओबामा । इसी को कहते हैं - बन्दर की बला तबेले के सिर ।
हमारे यहाँ तो जो भी नया मुख्य मंत्री आता है वह यही कहता है कि पिछले वाला खजाना खाली कर गया । उसके बाद जो आता वह भी यही कहता है । हम तो दोनों को सही मानते हैं । मतलब कि लोग आते-जाते रहते हैं आफत तो खजाने पर है जो हर हालत में खाली होता रहता है । जैसे कि हर आनेवाली पीढ़ी इस दुनिया को और अधिक ख़राब करके जाती है । हमारे यहाँ एक किस्सा चलता है । एक चोर था । जब वह मरने लगा तो अपने बेटे से बोला- बेटा मैनें जिंदगी भर चोरी की है । तू कुछ ऐसा करना जिससे लोग मुझे भला कहें । बाप बड़ी-बड़ी चोरियाँ करता था । बेटे ने जूते-चप्पल चुराना शुरू कर दिया । लोग कहने लगे- इस साले से तो इसका बाप ही अच्छा था । लगता है आपसे अपने पूर्ववर्तियों को फायदा ही होगा ।
तो आपका अन्तिम भाषण भी हो गया-१५ जनवरी को । अब जै राम जी की । वैसे आपको तो ओबामा के चुने जाते ही सामान बाँधना शुरु कर देना चाहिए था । पर आदमी मरते दम तक सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहता । हमारे पड़ोस में एक बुजुर्ग-विधुर सज्जन रहते थे । जैसा कि आप जानते हैं कि पत्नी के मरते ही आदमी अपने को जवान समझने लगता है । तब हम छोटे ही थे । बरसात के दिन थे । टीलों पर खुर्रा बना कर लम्बी-कूद कूद रहे थे । वे भी दिशा मैदान को आए थे । हमें देख कर बोले -अरे, तुम डालडा खाने वाले क्या कूदोगे ? सो वे कूदे और पैर में ऐसी मोच आई कि जिंदगी भर लंगड़ाते रहे । जब कभी हम बच्चे पूछते-ताऊ, कूदोगे ? तो मारने दौड़ते । आप भी राष्ट्रपतित्व की झोंक में जाते-जाते इराक में क्या सिट्टा लेने गए थे ? करवा आए न कचरा ।
जाते हुए को कोई घास नहीं डालता । लोग तो ऐसे मौके पर खुन्नस निकालने की कोशिश करते हैं । बूढ़े शेर को तो चूहे तक परेशान कर डालते हैं । जाते समय कोई सामान बँधवाने भी नहीं आता । सब आने वाले का सामान जचवाने लग जाते हैं । पर रंडी और नेता के दिमाग से भ्रम निकलता नहीं । सत्तर साल की होकर भी बाल रँगती है और शोहदों की सीटी का इंतजार करती है । हमारे यहाँ अस्सी पार वाले भी आगामी लोकसभा चुनावों के लिए ताल ठोंक रहे हैं ।
जाते-जाते आपने स्वयं अपना मूल्यांकन किया कि आपको भारत में लोग पसंद करते हैं । औरों का पता नहीं पर हम आपको अवश्य पसंद करते हैं । हमने आज तक किसी अमरीकी राष्ट्रपति को पत्र नहीं लिखा जब कि आपके नाम हमारे पत्रों की पूरी किताब तैयार है । हाथ में आते ही पहली प्रति आपको ही भेजेंगे । हमने जानबूझ कर आपके कार्यकाल के अन्तिम दिनों को कवर नहीं किया क्योंकि उसमें मेल्ट डाउन और जूता-प्रहार जैसी अशोभनीय घटनाएँ आ रही थीं ।
आपने अपने संबोधन में कहा कि आप ने आपने कार्यकाल में जो कुछ किया वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर किया । हमारे अनुसार तो यह अंतरात्मा बड़ी 'वो' होती है जैसे नायिका के अनुसार 'आप बड़े वो हैं ' । अपने फ़ायदे के अनुसार बोलने लगती है । जब किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता तो निर्दली की आत्मा कहने लगाती है- 'जा, सरकार बना सकने वाली पार्टी में शामिल होजा' । और वह अंतरात्मा की आवाज़ सुनता और मान लेता है । बाद में अगर वहाँ भी दाल नहीं गलती तो वह पुरानी पार्टी में चला जाता है जिसे घर-वापसी कहा जाता है । अंतरात्मा किसी को सांसद खरीदने के लिए कह देती है तो किसी सांसद को एक करोड़ में बिकने के लिए प्रेरित कर देती है । हिटलर को होलोकास्ट की प्रेरणा भी अंतरात्मा ने ही दी होगी । याहया खान को मुजीब को जेल में डालने और बंगलादेश में कत्ले-आम करवाने के लिए भी अंतरात्मा ने ही उकसाया होगा । बेचारे कॉलिन पावेल ने कहा था कि इराक के पास व्यापक विनाश के हथियार नहीं पर आपकी अंतरात्मा अड़ गई । राष्ट्रपति की आत्मा के आगे एक मंत्री की आत्मा की क्या बिसात ? इसलिए हमारा तो कहना है कि अकल से काम लेना चाहिए क्योंकि आजकल आत्मा शुद्ध नहीं रह गई है । अब रिटायर होने के बाद काफी समय मिलेगा । आपने आत्मकथा लिखने का मन बना ही लिया है । हमारा कहना है कि उस में तो कम से कम सच बोल दीजियेगा । सच बोले बिना शान्ति नहीं मिलती । गाना तो कहता है कि- सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया । पर हम कहते हैं कि देर आयद भी दुरुस्त आयद होता है । अगर आप सच बोल देंगें तो शायद इस समय जो सभ्यताओं के संघर्ष की बात की जाती है उसको भी एक नया और सही आयाम मिलेगा ।
अच्छा जी, हैप्पी रिटायर्ड लाइफ । वैसे तो भूतपूर्वों को कोई नहीं पूछता फिर भी ध्यान रखियेगा । ओसामा अभी जिंदा है । हम सोच रहे थे कि जाते-जाते ओसामा को तो गिरफ्तार करवा ही लेंगे पर संयोग की बात, दुष्ट अभी तक नहीं पकड़ा गया । अंत में आपकी बिल्ली के दुखद निधन पर हमारी संवेदनाएँ । पहले तो आपके कुत्ते का भी इंटरव्यू लेने आते थे पत्रकार, पर अब पता नहीं आपको भी कोई कवर करेगा या नहीं ? पर हम इतने स्वार्थी नहीं । पहले भी हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए था और अब भी नहीं । सो हम जैसे निस्वार्थ लोग तो आपके संपर्क में रहेंगे ही ।
१७ जनवरी २००९
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Jhootha Sach
प्रिय पाठको!
आज हम आपको बहुत दुखी हृदय से यह सूचना दे रहे हैं कि इंडिया की मृत्यु हो गई है । मृत्यु जीवन की अन्तिम परिणति है । जो पैदा हुआ है वह अवश्य मरेगा । पर हमें तो इसी बात का दुःख हैं कि जहाँ उसकी मृत्यु हुई है वहाँ किसी प्रकार के इलाज़ या अन्य सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी । बड़ा लाड-प्यार और सार-संभाल थी फिर भी मृत्यु हो गई । अब हम क्या कर सकते हैं । अब तो बस श्रद्धांजलि ही दी जा सकती है । दो मिनट का मौन ही रखा जा सकता है । इंडिया को दुनिया के सबसे समर्थ व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त था । जब समय बुरा आता है तो समर्थ से समर्थ व्यक्ति पर कोई अदना सा आदमी जूता तक फ़ेंक देता है और लोग तमाशा देख कर रह जाते हैं ।
इंडिया की मृत्यु की सूचना हमें फॉक्स न्यूज़ से मिली जिसमे व्हाइट हॉउस के लारा बुश के कार्यालय के सेली मेक्डोनो के हवाले से बताया गया कि इंडिया की १८ वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई । तो क्या इंडिया की उमर केवल १८ वर्ष ही थी । अब साहब १८ वर्ष पहले जनम हुआ तो उम्र १८ वर्ष से ज़्यादा कैसे हो सकती है । खुश होने की बात यह है कि इंडिया को लारा बुश ने अपने परिवार के सदस्य के समान बताया है ।
इंडिया को १८ वर्ष होने के कारण वोट का अधिकार भी मिलने वाला था । हो सकता है सुरक्षा परिषद् की सदस्यता भी मिल जाती । अमेरिका चाहे तो क्या नहीं हो सकता । पर क्या किया जाए अब तो इंडिया की मृत्यु ही हो चुकी । आप कहेंगें कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इंडिया मर जाए और हम जिंदा रहें ? ऐसा बहुत बार हुआ है । स्वर्णिम चतुर्भुज के इंजीनीयर पांडे की ठेकेदारों ने हत्या करवा दी और कुछ नहीं हुआ । नेता के जन्म दिन के लिए लाखों का चन्दा नहीं देने पर मनीष गुप्त की हत्या कर दी गई और कुछ नहीं हुआ । ताज़ा उदहारण ही देख लीजिये कि आतंकवादी पाकिस्तान के थे, सारी दुनिया जानती है, पाकिस्तान आँखों-आँखों में हँसता हुआ कह रहा कि आतंकवादी उसके यहाँ के नहीं थे । आगे भी यही कहता रहेगा । आपने सबूत दिए और वह कह रहा है कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं । आगे भी यही कहता रहेगा । दुनिया तमाशा देख रही है । यह मरना नहीं है तो क्या है ?
बने फिरो जगद्गुरु, बने फिरो आर्थिक महाशक्ति ।
अब चलो आपको बता ही देते हैं कि यह इंडिया और कोई नहीं - लारा बुश की प्रिय बिल्ली है जिसको भारत प्रेम के कारण मेडम ने इंडिया नाम दिया था ।
आप में से कुछ ज़्यादा राष्ट्रवादी होने का नाटक करने के कारण कहेंगे कि बिल्ली को इंडिया नाम देने से भारत के सम्मान को ठेस लगी है । अब इसका क्या किया जाए । ऐसा तो होता ही रहता है । अमरीका में तो शिव, गणेश और काली आदि को सेंडिल पर छाप दिया था ।
वैसे बिल्ली, कुत्ते से ज़्यादा निकट होती है मालिक के ।
बिल्ली का नाम इंडिया रखने का किस्सा आज का नहीं बल्कि २४ जुलाई २००१ का है । हमने उस समय अपनी प्रतिक्रिया में दो कुण्डलिया छंद लिखे थे (कुण्डलिया संग्रह 'अपनी-अपनी लंका') जो आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहें हैं ताकि सनद रहे ।
नौकर के होते सदा रामू, भोला नाम ।
भोले शंकर,राम पर ना होते नाराज़ ।
ना होते नाराज़, उड़ेगी काहे खिल्ली ।
कुत्ते से हर तरह श्रेष्ठ होती है बिल्ली ।
जोशी जिनके कुत्ते बन, वे पूँछ हिलाएँ ।
तो उनकी बिल्ली बनकर हम क्यों शरमाएँ ।
बुश की बिल्ली बन गया अगर इंडिया देश ।
तो क्यों होते हो दुखी, क्यों खाते हो तैश ।
क्यों खाते हो तैश, बड़ों के कुत्ते बिल्ली ।
सब सुख भोगें, रहें सदा कलकत्ता, दिल्ली ।
कह जोशी कवि म्याऊँ बोलें उन्हें रिझाएँ ।
तो चूहा क्या, चिकन केन्टकी वाला खाएँ ।
६ जनवरी २००९
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Jhootha Sach
संस्कृत में एक श्लोक है- 'येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषः भवेत' अर्थात पुरुष को किसी भी प्रकार प्रसिद्ध होना चाहिए । प्रसिद्ध होने पर कई प्रकार के फायदे मिलने लग जाते हैं । और कुछ नहीं तो कोई न कोई पार्टी चुनाव में टिकट ही दे देती है । पत्रकारिता तो गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, बेचन शर्मा 'उग्र' आदि ने भी की पर हमेशा ही 'हैण्ड टू माउथ' रहे । और आज देखिये एक निहायत गुमनाम सा पत्रकार मुन्तज़र अल जैदी सारे संसार में चर्चित हो गया । उसे एक मुस्लिम उद्योगपति ने मर्सडीज कार तोहफे में देने की पेशकश की है, मिस्र के एक पिता ने निकाह के लिए अपनी बेटी प्रस्तुत की है । कंपनियों में उस जूते को अपनी कम्पनी का बताने की होड़ लग गई है । उन कंपनियों ने तो उस जूते को आरामदायक और मज़बूत कहकर बेचा था । उन्हें अपने जूते की मारक क्षमता का पता ही नहीं था । बुश को भी ईराक में व्यापक विनाश के हथियार नहीं मिले और व्यापक विनाश की वह क्षमता पता नहीं इस गंदे और पुराने जूते में कहाँ से प्रकट हो गई । उन जूतों को नष्ट कर दिया गया है पर पता नहीं ऐसे ही और कितने जूते ईराक में छुपे होंगे । इसलिए अमरीका को अपनी सेना ईराक में २०१० तक ही नहीं वरन तब तक रखनी चाहिए जब तक कि वहाँ एक भी जूता कम्पनी, एक भी जूता और यहाँ तक कि एक भी जूता पहनने लायक पैर बाकी है ।
तो बात चर्चित हुए मुन्तज़र की । वास्तव में कई बरसों से ईराक का आहत स्वाभिमान फिर गर्व से सिर उठाने के लिए एक मौके का मुन्तज़र था सो वह मौका पत्रकार मुन्तज़र ने उपलब्ध करवा दिया । उस बन्दे के वे जूते लगभग ५० करोड़ रुपये में खरीदने की बोली लग गयी है । कहते हैं उन्हें नष्ट कर दिया गया है । अच्छा हुआ जो नष्ट कर दिया वरना कोई न कोई उसे खरीदता, उसका स्मारक बनवाता, और फिर कोई पंथ खड़ा हो जाता । मतलब कि विवादास्पद श्रद्धा का एक और अखाड़ा तैयार हो जाता । कट्टर, अतार्किक और कर्महीन केन्द्र ही खुराफातों की जड़ बनते हैं । सभ्यताओं की इस तथाकथित लड़ाई में संसार अन्ध-श्रद्धा की इस विडंबना को भली भाँति अनुभव कर रहा है ।
तो ईराकी, मुस्लिम और अमरीका-विरोधी गौरव के इस केन्द्र मुन्तज़र की चर्चा पूरी होने से पहले ही इस दीवाने ने माफी माँग ली । पटाखा फुस्स्स हो गया । इसका मतलब है कि यह कृत्य किसी महान दर्शन या विचार से सम्बंधित नहीं था । मुम्बई कांड में गिरफ़्तार कासब भी आतंकवादी वीरता दिखाने के बाद प्राणों की भीख माँग रहा है । भगत सिंह, आजाद, अशफाकुल्ला, राजगुरु, बिस्मिल ने तो माफ़ी तो दूर की बात है, जिस दृढ़ता और गर्व से जेल में रहे उससे अंग्रेज़ प्रभावित ही नहीं भयभीत तक थे । उन्होंने ऐसे अलौकिक संकल्प की कल्पना भी नहीं की थी । असेम्बली में बम विस्फोट के बाद भगतसिंह आसानी से भाग सकते थे पर वे भागने के लिए नहीं जान देने के लिए आए थे । वे चाहते थे कि मुक़दमा चले और वे ब्रिटिश सरकार ही नहीं वरन सारे संसार को बता सकें कि भारत क्या है, क्या चाहता है ? अंग्रेज़ तो चाहते थे कि भगत सिंह ज़रा सा माफी का संकेत दें और वे उन्हें छोड़ दें । जब भगत सिंह को फाँसी के लिए लेने आए तो वे शांत भाव से एक पुस्तक पढ़ रहे थे । हालाँकि अँग्रेजों ने उन्हें आतंकवादी बताने की कोशिश की पर क्या ऐसी शान्ति और दृढ़ता आतंकवादियों में हो सकती है? ऊधम सिंह ने लन्दन जाकर जालियाँवाला बाग के अपराधी को गोली मारी और भागने की बजाय गिरफ्तार हो गए, बोले मैं जो काम करने आया था वह कर दिया, अब तुम्हें जो करना है कर लो । यह है शहादत और वीरता । मुन्तज़र और कसाब के बहाने अपनी कुंठा को सहलाने वालों को अपना गर्व और श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए कोई सकारात्मक सोच और मार्ग अपनाने चाहिए ।
जहाँ तक मुन्तज़र के लिए उचित सलाह की बात है- उसे सबसे पहले जूता-कंपनियों से टेंडर आमंत्रित करने चाहियें कि जो कम्पनी ज़्यादा पैसे देगी वह अपने प्रक्षेपित जूतों को उसी कम्पनी का बता देगा । दूसरे, कार देने की पेशकश करने वाले भक्त को बैंक खाते में मर्सडीज़ की राशिः बैंक में जमा करवाने के लिए पत्र लिख दे । यद्यपि असली जूते नष्ट कर दिए गए हैं तो भी उसे यह प्रचारित करना चाहिए कि उसके पास वैसे जूतों का एक पुराना जोड़ा और है । जब अक्ल का अंधा और गाँठ का पूरा कोई भक्त संपर्क करे तो तत्काल बेच देना चाहिए क्योंकि ऐसी दीवानगी का नशा बहुत ज़ल्दी उतर जाता है । और उस मिस्री लड़की को जेल से छूट कर आने तक इंतजार करने के लिए लिख दे बशर्ते कि वह इंतजार कर सके । ऐसे मामलों में ज़ल्दी करनी चाहिए जैसे मोनिका लेवेंस्की और क्लिंटन ने अपने अपने सत्कर्मों का रोमांच तत्काल बेच लिया । समय निकल जाने के बाद तो पालक की गड्डी की तरह फेंकना ही पड़ता है ।
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१९ दिसम्बर २००८
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Jhootha Sach
सारा पालिन मैडम,
जय सियाराम ।
आप सोच रही होंगी कि पिछली बार राम-राम लिखा था और अबकी बार जय सियाराम क्यों? बात यह है कि आज भले ही हमारे यहाँ कन्या भ्रूण हत्या या दहेज़ हत्याएं होती हों पर हमारी परम्परा में नारी का बड़ा सम्मान है । सो नारी का नाम पहले है जैसे कि सीताराम, गौरी शंकर, राधेश्याम आदि । धन, ज्ञान और शक्ति की देवियाँ भी लक्ष्मी, सरस्वती और काली भी स्त्रियाँ हैं । हमारे यहाँ राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, पार्टी अध्यक्ष, राज्यपाल, मुख्यमन्त्री, एम. एल.ए., जिलाप्रमुख, कलक्टर सब महिलायें हैं । आपके यहाँ महिलाओं को मताधिकार भी आजादी के सैंकडों साल बाद मिला ।
वैसे तो अब आप अलास्का पहुँचकर बाल बच्चों को संभाल रही होंगी । अब अखबार वालों ने भी आपका चेप्टर बंद कर दिया है । चढ़ते सूरज को सब नमस्कार करते हैं । अब ओबामा के खाँसने-थूकने की खबरों से अखबार लिथड़े होंगे । पर हम कुर्सी नहीं, गुणों की कदर करते हैं । हम आपमें अमरीका का अगला राष्ट्रपति देख रहे हैं । कनाडा के मसखरों ने तो आपको सरकोजी की आवाज में वास्तव में मूर्ख बनाया । हमारे यहाँ भी अब कई ज्योतिषी मुँह निकाल रहें हैं कि उन्होंने ओबामा के जीतने की भविष्यवाणी कर दी थी । अब सबूत क्या है? पर हम तो आपको लिख कर दे रहे हैं । जिस दिन आप राष्ट्रपति बन जाएँ उस दिन हमें याद कर लीजियेगा । अब उन मँहगे कपड़ों को धोकर, प्रेस करके रख दीजियेगा । चार साल बाद काम आयेंगे ।
पहले हमने ओबामा के जीतने के बारे में नहीं सोचा था क्योंकि अमरीका में काले राष्ट्रपति की परम्परा ही नहीं है । जब एक परम्परा टूट गयी तो दूसरी भी टूटेगी । मतलब कि महिला भी राष्ट्रपति भी होगी । तब आपसे बेहतर कौन है इस पद के लिए । बस अभी से भिड़ जाइए ।
आपकी एक बात हमें बहुत पसंद है कि आप तलाक़ के चक्कर में नहीं पडीं, बच्चों के उत्पादन में गंभीरता से योगदान दिया । अमरीका में लोगों को तलाक़ से फुरसत नहीं है तो बच्चे कब पैदा करें । अगर यही हाल रहा तो विद्वानों का मानना है कि २०४२ तक अमरीका में गोरे लोग अल्पमत में आ जायेंगे । हमारी तो सलाह है कि आप लोगों को अपना उदाहरण देकर अधिक से अधिक बच्चे पैदा कराने के लिए प्रेरणा दें । अन्यथा एक दिन अमरीका पर रंगीन लोंगो का राज हो जायेगा । हमारे यहाँ के एक महान विचारक तोगडिया जी ने इसीलिए हिन्दुओं को आठ-आठ बच्चे पैदा कराने की सलाह दी थी पर इन नासमझ हिन्दुओं ने कोई ध्यान नहीं दिया । कहते हैं आठ-आठ बच्चों को खाना कौन खिलायेगा ।
इतना भी नहीं समझते कि जिसने चोंच दी है वह चुग्गा भी देगा । आप के यहाँ तो वैसे भी अनाज की क्या कमी है । सूअरों तक को अनाज खिलाया जाता है । फिर भी बच जाता है तो उससे बिजली बना ली ज़ाती है । इसलिए पाप को प्रणाम करके इस पुण्य काम में लग जाइए और भविष्य के लिए गोरा राष्ट्रपति ही सुरक्षित करें ।
अमरीका की सभी गोरी महिलाओं के लिए दूधों नहाने और पूतों फलने का आशीर्वाद और आपके लिए राष्ट्रपति बनने की अग्रिम शुभकामनाएँ ।
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७ नवम्बर २००८
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Jhootha Sach
आज तोताराम ने आते ही पूछा- मास्टर, अपना मोती किस नस्ल का कुत्ता है? हमें हँसी आ गई, कहा- अरे, कुत्ते की भी कोई नस्ल होती है क्या? कुत्ता माने कुत्ता। सभी कुत्ते पूँछ हिलाते हैं, सभी कुत्ते तलवे चाटते हैं, सभी चोरों को देख कर चुपचाप पड़े रहते हैं और सज्जनों को भोंकते हैं। कुत्ते की अपनी कोई जाति, धर्म, नस्ल, भाषा, प्रांतीयता, राष्ट्रीयता नहीं होती। जैसा मालिक वैसा कुत्ता। नवाब का कुत्ता पूजनीय तो गरीब के कुत्ते को कोई भी पत्थर मार सकता है। बॉस का कुत्ता मुतिया नहीं, मोतीजी होता है। गरीब हीरा भी पहन ले तो काँच और अम्बानी काँच भी पहनले तो कोहिनूर। कुत्ते की नस्ल नहीं उसके मालिक का नाम पूछा जाता है। अपने देश में चुनाव में टिकट देते समय, स्कूल में प्रवेश, नौकरी में आरक्षण, सस्ता अनाज, मुफ्त बिजली देते समय भले ही जाति, धर्म पूछे जाते हों पर वैसे जाति धर्म की बात करना असंवैधानिक है। और अब जब ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति बन गए तो समझले सारी दुनिया में नस्ल का प्रश्न बेमानी हो गया है। फिर भी आज तू कुत्तों की नस्ल के बारे में क्यों पूछ रहा है?
तोताराम बोला- भले ही ओबामा ने परिवर्तन के नाम पर जीत हासिल की हो पर व्हाइट हॉउस की परम्परा में परिवर्तन नहीं कर सकेंगे। उन्हें भी क्लिंटन और बुश की तरह कुत्ता पालना ही पड़ेगा। वैसे अभी बुश ने सलाह दी है कि कुत्ते की नस्ल जैसे महत्वपूर्ण मामले को अभी सार्वजनिक नहीं किया जाए। बुश ने अपनी बिल्ली का नाम 'इंडिया' रखा था मैं सोचता हूँ कि ओबामा को एक भारतीय नस्ल का कुत्ते भेंट करूँ और प्रार्थना करूँ कि वे उसका नाम 'भारत' रखें। इससे 'इंडिया की जगह 'भारत' की स्थापना की कामना कराने वालों की भी आत्मा शांत हो जायेगी। बुश के जाते-जाते 'इंडिया' को परमाणु समझौता मिला तो ओबामा के जाते-जाते भी भारत को भी कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।
हमने कहा- फालतू की बातें मत सोच। कुत्ता कुत्ता ही होता है। हर कुत्ता टाँग उठाकर पेशाब करता है। कोई कुत्ता दूध नहीं देता। वे जाने उनके कुत्ते जाने। वैसे जहाँ तक इतिहास की बात है तो पिछले पचास साल में तो अमरीका ने पाकिस्तानी कुत्ते ही पसंद किए हैं। तोताराम बोला- पर यह भी तो सिद्ध हो चुका है कि पाकिस्तानी कुत्तों ने बिस्कुट तो अमरीका के खाए पर दुम हिलायी आतंकवादियों के आगे। ऐसे कुत्ते मौका लगने पर मालिक को भी काट सकते हैं। भारतीय नस्ल का कुत्ता भले ही पड़ोसी की मुर्गी चुरा कर न लाये पर मालिक को कटेगा तो नहीं। भारतीय कुत्ता अपना धर्म समझता है। खैर, ओबामा किसी भी नस्ल का कुत्ता पालें, कुत्ता पालें या गाय यह उनका आतंरिक मामला है। हमें तो इसी बात से खुश है कि तोताराम को भारतीय नस्ल के कुत्तों पर गर्व तो है।
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१२ नवम्बर २००८
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Jhootha Sach

जोन मकेन साहब ,
जय रामजी की। आपने अपना स्वयं का महत्व संक्षेप में बताते हुए कहा- 'आई हैव बीन टेस्टेड, सीनेटर ओबामा हजण्ट' ।
आपके पूर्ववर्ती बुश साहब को दुनिया ने आठ बरस झेला। अब यदि आपको भी अगले चार साल झेलना पड़ा तो क्या कर सकते हैं। भगवान की मर्जी। बुश साहब कैसे जीते यह तो अल गोर का जी जानता है। बुश के आते ही वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में आतिशबाजी हो गई और जाते-जाते सरकारी खजाने का भट्टा बैठा गए। ऐसा नहीं है कि बुश के ज़माने में धरती ने अनाज, फल-फूल नहीं दिए हों या अमरीकी मज़दूरों और कारीगरों ने काम नहीं किया हो या बादलों ने वर्षा नहीं की हो, या दुनिया के मूर्ख देशों ने हथियार नहीं खरीदे हों। कारण यह है कि टेक्सास की तेल लाबी ने अपने फायदे के लिए अफगानिस्तान, ईराक़ में टांग फंसाती और जनता की पसीने की कमाई सेना पर बहाई। पहले विनाश किया और फिर रम्सफील्ड जैसों ने निर्माण के नाम पर जम कर कमाई । अब अगर आपका नंबर आया तो क्या होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है ।
जहाँ तक आपका टेस्ट होने की बात है तो अमरीका की सेना ने कभी अपने देश की रक्षा के लिए युद्ध नहीं किया। सैनिक नौकरी के चक्कर में झींकते-झींकते कभी कोरिया गए तो कभी वियतनाम, कभी कुवैत तो कभी अफगानिस्तान तो कभी ईराक़ जाना पड़ा। जैसे-तैसे टाइम पास करके वापस आ गये जान बचाते-बचाते। कुछ मारे गए यह बात और है।
जहाँ तक आपकी व्यकिगत वीरता का सवाल है, हम तो इतना जानते हैं कि सच्चे वीर पीठ दिखाने या बंदी होने की बजाय वीर गति को प्राप्त होना ज्यादा बेहतर समझते हैं। हमारे स्वतन्त्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद कहा करते थे कि मैं जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आऊँगा। भगत सिंह जानबूझकर इस लिए गिरफ्तार हुए थे कि वे अंग्रजों की न्याय व्यवस्था का सच लोगों के सामने लाना चाहते थे। आप वियतनाम युद्ध जीत कर आते तो और बात । वैसे आपके पिताजी भी सेना में उच्चअधिकारी थे और आप भी। पता नहीं कैसे कैद कर लिए गए ।
ख़ैर जान बची और लाखों पाये, लौट कर सूरमा घर आए। अब आराम से फौज की पेंसन पेल रहें हैं। जहाँ तक अमरीका के द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी होने की बात है तो जापान को अणु बम डालकर हथियार डालने के लिए विवश किया । ज़मीनी लडाई में हराते तो बात और थी। और हिटलर को अमरीका ने नहीं सोवियत रूस ने हराया था। अमरीका तो रूस की हार के इंतज़ार में तमाशा देख रहा । जब हिटलर हारता दिखा तो जहाँ मौका मिला कब्ज़ा कर लिया।
वैसे सेना में है मज़ा। अधिकतर तो मेस का खाना खाकर और सस्ती दारू पीकर ही रिटायर हो जातें है। युद्ध का मौका ही नहीं आता। फील्ड में रहो तो सब कुछ मुफ्त, तनख्वाह घर भेजो। पीस एरिया में रहो तो केन्टीन का सामान और दारू बाज़ार में बेचो। रिटायर होने पर पेंशन। बीच में मर जाओ तो पूरे कार्यकाल तक बच्चों को पूरी तनख्वाह और बाद में पेंशन। मुसीबत तो साधारण जनता की है- कभी बेकारी, कभी महंगाई, कभी छंटनी। आपको इसका क्या पता? आप तो खानदानी सरकारी दामाद रहें हैं ।
वैसे आपके अनुसार ओबामा का टेस्ट होना अभी बाक़ी । हमारे अनुसार तो उसने टेस्ट दे दिया साधारण स्थिति में रहकर, मेहनत की रोटी खाकर आपके सामने खड़ा है- यह क्या कम है। और फिर स्वप्न भी तो बड़ा देख रहा है, इसी बात की दाद दो बालक को । बड़ा सपना ईसा ने देखा, लिंकन ने देखा, गांधी ने देखा, मार्टिन लूथर ने देखा और अब ओबामा देख रहा है। आदमी का सपना ही उसकी पहचान होती है। त्वचा का रंग मत देखो उसके सपनों का रंग देखो।
बड़े घरानों की चमक और आतंक और गोरे रंग की कुंठा से बाहर आओ मियाँ मेकेन। अंत में एक हिन्दी गाने की पंक्ति- हम काले हैं क्या हुआ दिल वाले हैं ।
आपका,
रमेश जोशी
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४ नवम्बर २००८
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