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Jan 18, 2009

ओबामा की अगवानी


प्रिय बराक,
आशीर्वाद और शुभकामनाएँ । हो सकता है कि चमचागीरी करनेवाले कहें कि अमरीका के राष्ट्रपति के लिए कुछ भारी-भरकम संबोधन होने चाहियें । पर पता नहीं हमें क्यों लगता है कि जब इतनी ही दूरी है तो फिर पत्र लिखने की ही क्या ज़रूरत है ? आप हमारे भूतपूर्व विद्यार्थियों या बच्चों की उम्र के हो तिस पर हम ब्राह्मण और भूतपूर्व अध्यापक । और आप जानते ही हो कि अध्यापक कभी रिटायर नहीं होता । सब को अपना चेला समझ कर पढ़ाने लगता है । हम ये भी जानते हैं कि आप सामान्य स्कूल में ही पढ़े हो जहाँ हम जैसे ही मास्टर पढ़ाते होंगे जो ऊपर से रूखे-सूखे दिखते होंगे पर अन्दर से अपनेपन से भरपूर । तथाकथित बड़े स्कूलों में तो अध्यापक बच्च्चों को पढ़ाते कम और उनसे पढ़ते अधिक हैं क्योंकि ऐसे बच्चे स्कूल में अपने नहीं, बाप के जूते पहन कर जाते हैं ।

हमने आपकी पुस्तक पढ़ी है । इसलिए नहीं कि आप राष्ट्रपति हो बल्कि इसलिए कि आप दूसरों से भिन्न राष्ट्रपति हो । आप ज़मीन से उठकर गए हो । आप में हमें मिट्टी और पसीने की गंध आती है । पुस्तक तो क्लिंटन ने भी लिखी और बिकी भी खूब पर हमने नहीं पढ़ी क्योंकि वह एक राष्ट्रपति और लम्पट-लीला के लिए कुख्यात हो चुके व्यक्ति का चोंचला था । आजकल सब जगह अपनी थोड़ी सी ख्याति या कुख्याति को भुनाने का रिवाज़ चल पड़ा है । तथाकथित बड़े लोगों को किराये पर लिखने वाले भी बहुत से मिल जाते हैं । उन्हें क्या पढ़ना । पर आपने यह पुस्तक राष्ट्रपति तो क्या, राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से भी पहले लिखी थी । इसलिए इस पुस्तक में एक विचारशील युवा है, एक काइयाँ राजनीतिज्ञ नहीं ।

आपने सपने देखे हैं और सपने भी टुच्चे नहीं बल्कि एक ईमानदार युवक के सपने देखे हैं । हम उन सपनों में शामिल होना चाहते हैं । आपके साथ केवल खाओ-पीओ और मौज करो वाले उपभोक्तावादी अमरीकी सपने ही नहीं, आपके रक्त में एशिया और अफ्रीका भी शामिल हैं जिनकी पुरानी, सादगी-पसंद और मेहनती संस्कृति रही है । आज अमरीका की संस्कृति में इनका छौंक लगना बहुत ज़रूरी है क्योंकि शुद्ध अमरीकी उपभोक्तावादी संस्कृति का परिणाम तो दुनिया देख ही रही है । केवल भोग, व्यक्ति ही नहीं, दुनिया को खा जाता है । अमरीका पर अणु विस्फ़ोट करने, शीत युद्ध भड़काने, इस्लामी कट्टर पंथ को हवा देने और मात्र भोग को ही जीवन का लक्ष्य बनाने वाली सोच का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व जाता है । जानेवाले तो आपके लिए काँटे बिछा कर चले जा रहे हैं । आपकी राह आसान नहीं है । आप के नाम बराक का अर्थ है 'वरदान'। भगवान आपको इस दुनिया के लिए वरदान बनने का सौभाग्य प्रदान करे । आप में समझ भी है, शक्ति के रूप में सत्ता भी मिल गई है । अब तो बस सत्संगति और मिल जाए क्योंकि उच्च पद वालों को मीठी बकवास करने वाले बहुत मिल जाते हैं और उसी में वक्त निकल जाता है । हमने अपने भूतपूर्व युवा प्रधान मंत्री राजीव गाँधी के साथ यह होते देखा है । वे दृष्टि संपन्न थे । नई तकनीक के विकास का रास्ता खोला जिसके कारण भारत आज कम्प्यूटर के क्षेत्र में एक शक्ति बना हुआ है । राजीव गाँधी को जितना बहुमत मिला उससे वे चाहते तो संविधान बदल सकते थे पर चमचों ने ऐसा करने का वातावरण ही नहीं बनने दिया । वे चाहते तो समान नागरिक संहिता, समान शिक्षा, धारा ३७० की समाप्ति आदि दूरगामी और क्रांतिकारी काम करवा सकते थे पर लोगों ने क्या सलाह दी- 'शाह बानो केस में मुस्लिम वोट पकाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को थूक चटवा दो' । फिर सलाह दी कि मन्दिर का ताला खुलवा कर हिन्दू समर्थन भी बटोर लो । हुआ यह कि दुविधा में न राम मिले और न माया । जूते भी खाए और प्याज भी । बस ऐसे घटिया सलाहकारों से बचना ।

आपका शपथ-ग्रहण समारोह बड़े ताम-झाम से हो रहा है । समय तो अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए ख़राब ही चल रहा है । हम आपकी जगह होते तो एक भी पैसा खर्च नहीं करते । आजकल टेलिविज़न है ही सारी दुनिया उसी पर देख लेती । पता नहीं यह इच्छा आपके ही मन में जगी है या किसी की नेक सलाह है । वैसे यह सच है कि गैर-गोरे लोगों के लिए तो यह ऐतिहासिक अवसर है । उनके मन में अब तब का सबसे बड़ा समारोह करने की इच्छा हो रही होगी । ऐसे समय में अधिक सादगी ज़्यादा असर डालती है । यही पैसा उन स्कूलों को दिया जा सकता था जहाँ काले और पिछड़े बच्चे पढ़ते हैं और जिनमें पैसों की बड़ी कमी है ।

हमारे यहाँ तो छोटे-मोटे कामों में भी भारी भीड़ जुट जाती है । पर आजकल भीड़ में भगदड़ मचने की कई घटनाएँ बहुत होने लगी हैं । इस मामले में काले-गोरों का कोई दंगा न हो जाए इसका भी ध्यान रखें । अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम समझेंगें कि आपके यहाँ लोग समझदार हो रहे हैं । गोरों के धैर्य की परीक्षा तो अब हो रही है ना । पहले जिस अमरीका ने उपभोक्तावाद का झंडा लहराया था और उसके परिणाम स्वरूप मंदी झेल रहा है, हम चाहते हैं कि वही अमरीका आपके नेतृत्व में सादगी, मेहनत और मितव्ययिता का भी उदाहरण पेश करे ।

आप लिंकन वाली बाइबल से शपथ लेंगे । आपका ध्येय वाक्य है- 'इन गोड आइ ट्रस्ट' । वैसे तो ईश्वर एक ही है, पर पता नहीं क्यों धर्म वाले इसे स्वीकार नहीं करते । ईश्वर को एक मानेंगे पर झगड़ा भी ईश्वर के ही नाम पर करेंगे । धर्म के नाम पर सेनाएँ लेकर निकलेंगे और मार-मार कर या फुसलाकर धर्म-परिवर्तन करवाएँगे । हमारे यहाँ तो गाँधीजी 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम' गाते थे (और सिर्फ़ गाँधीजी ही गाते थे) । पर उनको किसी धर्मवाला अपने धर्म में जगह नहीं देता । क्या धर्म के लिए कट्टर होना ज़रूरी है ? हर धर्म ने अपना नया ईश्वर बनाया और निकल पड़े पुराने धर्मों को मिटाने । आपके सामने नस्ल ही नहीं धर्म की भी समस्याएँ आ सकती हैं । हमारे यहाँ तो ध्येय वाक्य है- 'सत्यमेव जयते' । हमारे उपनिषदों में तो सत्य ही ईश्वर है और साँच बरोबर तप नहीं -कहा गया है । सत्य ही सबसे अधिक वैज्ञानिक है । पर समस्या यह है कि सत्य को मान लेने से अलग-अलग दुकानें नहीं चल सकती । हम आपको हमारे संविधान का प्राण तत्व बताते हैं -
अयं निजः परोऽवेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

यह मेरा है, यह पराया है - यह हिसाब छोटे लोग लगाते हैं । उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी धरती ही एक परिवार है ।

यदि आप इस वाक्य से प्रेरणा लेंगे तो आप वास्तव में अपने नाम के अनुरूप संसार के लिए वरदान सिद्ध होंगे ।
आपके नेतृत्व में यह दुनिया बेहतर बने, इसी शुभकामना के साथ,

रमेश जोशी

१८ जनवरी २००९

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Nov 23, 2008

तोताराम के तर्क - ओबामा की प्राथमिकता और अपने अपने लादेन


ओबामा के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति बनने की घटना को व्यापार जगत भुना रहा है । प्रकाशक ओबामा की किताबें मँहगे दामों में बेच रहे हैं तो वस्त्र व्यापारी ओबामा के फोटो वाली टी शर्ट । व्यापारी दाह संस्कार में भी व्यापार कर लेता है तो यह तो एक अभूतपूर्व घटना है । पर हम कोई व्यापारी तो हैं नहीं जो धंधा करें । हम तो निस्वार्थ शुभचिंतक हैं और तिस पर ओबामा हमारे बेटे की उम्र का । उसे सही मार्गदर्शन देना हमारा कर्तव्य है । सो आज जैसे ही तोताराम आया हमने उसके सामने स्थिति रखी । देखा, बालक फँस गया न बुशवाले चक्कर में? अच्छा होता इस अवसर का सदुपयोग कालों के शैक्षणिक और सामाजिक विकास के लिए करता, नस्लीय भेदभाव को मिटा कर सद्भाव बढ़ाता, देश को मितव्ययिता की सीख देकर अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता पर यह तो पड़ गया ओसामा के पीछे बुश की तरह । कहता है ओसामा को जिंदा या मुर्दा पकड़ना मेरी पहली प्राथमिकता होगी । सोचते हैं एक पत्र उसे समझाने के लिए लिख ही दें ।

तोताराम हँसा, बोला- बच्चा ओबामा नहीं तू है । उम्र भले कम हो पर है पक्का घाघ । राज करने के लिए ओसामा ज़रूरी है । ओसामा का डर दिखा कर बुश आठ साल राज कर गये और अब यह इसी मुद्दे पर आराम से चार साल राज करेगा और अगर इस मुद्दे को आगे भी जिंदा रख सका तो एक टर्म और पेल जाएगा । ओसामा न पकड़ा गया और न पकड़ा जाएगा । जैसे समझदार डाक्टर न तो मरीज़ को मरने देता है और न ठीक ही होने देता है । बस जीवन भर कमाई करता रहता है । चतुर ट्यूटर कभी परीक्षा से पहले कोर्स पूरा नहीं करवाता है । राजनीति में सबके अपने-अपने ओसामा होते हैं जिन्हें सत्ता के लिए जिंदा रखना ज़रूरी होता है । पाकिस्तान के लिए कश्मीर एक ओसामा है तो भाजपा के लिए समान नागरिक संहिता, धारा ३७० और राम मन्दिर मुद्दा एक ओसामा है । तभी तो सत्ता मिलने पर भी इन मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाल दिया । अब जब लोकसभा चुनाव आएगा तो फिर इन मुद्दों को बाँस पर टाँग कर घूमेंगे । कांग्रेस के पास धर्मनिरपेक्षता और गरीबी हटाओ के ओसामा हैं भले ही वोट के लिए अल्पसंख्यक तुष्टीकरण करें । मायावती के ओसामा सवर्ण मनुवादी है । जयललिता और करूणानिधि एक दूसरे के ओसामा हैं ।

हमने पूछा- तो फिर ओबामा के जीतने से अमरीका में कोई परिवर्तन नहीं आएगा? तोताराम ने उत्तर दिया- यह भ्रम तुझे और संसार के सारे मतदाताओं को अपने मन से निकल देना चाहिए कि सरकारें उनका उद्धार करेंगी । चुनाव लड़ना ,सरकारें बनाना भी अन्य व्यवसायों की तरह एक व्यवसाय है और कौन व्यवसायी चाहेगा कि उसका ग्राहक समझदार हो या ग्राहक का भला हो । उसे तो अधिक से अधिक लाभ कमाना है । इसलिए भइया, अगर सुख शान्ति चाहते हो तो जाति, धर्म,नस्ल के झगड़े भुला कर प्रेम से रहो और टी.वी.और बाज़ार के बहकावे में मत आओ।

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१८ नवम्बर २००८

इंडियन एक्सप्रेस बीबीसी


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अमरीका के अगले राष्ट्रपति के नाम


सारा पालिन मैडम,

जय सियाराम ।
आप सोच रही होंगी कि पिछली बार राम-राम लिखा था और अबकी बार जय सियाराम क्यों? बात यह है कि आज भले ही हमारे यहाँ कन्या भ्रूण हत्या या दहेज़ हत्याएं होती हों पर हमारी परम्परा में नारी का बड़ा सम्मान है । सो नारी का नाम पहले है जैसे कि सीताराम, गौरी शंकर, राधेश्याम आदि । धन, ज्ञान और शक्ति की देवियाँ भी लक्ष्मी, सरस्वती और काली भी स्त्रियाँ हैं । हमारे यहाँ राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, पार्टी अध्यक्ष, राज्यपाल, मुख्यमन्त्री, एम. एल.ए., जिलाप्रमुख, कलक्टर सब महिलायें हैं । आपके यहाँ महिलाओं को मताधिकार भी आजादी के सैंकडों साल बाद मिला ।

वैसे तो अब आप अलास्का पहुँचकर बाल बच्चों को संभाल रही होंगी । अब अखबार वालों ने भी आपका चेप्टर बंद कर दिया है । चढ़ते सूरज को सब नमस्कार करते हैं । अब ओबामा के खाँसने-थूकने की खबरों से अखबार लिथड़े होंगे । पर हम कुर्सी नहीं, गुणों की कदर करते हैं । हम आपमें अमरीका का अगला राष्ट्रपति देख रहे हैं । कनाडा के मसखरों ने तो आपको सरकोजी की आवाज में वास्तव में मूर्ख बनाया । हमारे यहाँ भी अब कई ज्योतिषी मुँह निकाल रहें हैं कि उन्होंने ओबामा के जीतने की भविष्यवाणी कर दी थी । अब सबूत क्या है? पर हम तो आपको लिख कर दे रहे हैं । जिस दिन आप राष्ट्रपति बन जाएँ उस दिन हमें याद कर लीजियेगा । अब उन मँहगे कपड़ों को धोकर, प्रेस करके रख दीजियेगा । चार साल बाद काम आयेंगे ।

पहले हमने ओबामा के जीतने के बारे में नहीं सोचा था क्योंकि अमरीका में काले राष्ट्रपति की परम्परा ही नहीं है । जब एक परम्परा टूट गयी तो दूसरी भी टूटेगी । मतलब कि महिला भी राष्ट्रपति भी होगी । तब आपसे बेहतर कौन है इस पद के लिए । बस अभी से भिड़ जाइए ।

आपकी एक बात हमें बहुत पसंद है कि आप तलाक़ के चक्कर में नहीं पडीं, बच्चों के उत्पादन में गंभीरता से योगदान दिया । अमरीका में लोगों को तलाक़ से फुरसत नहीं है तो बच्चे कब पैदा करें । अगर यही हाल रहा तो विद्वानों का मानना है कि २०४२ तक अमरीका में गोरे लोग अल्पमत में आ जायेंगे । हमारी तो सलाह है कि आप लोगों को अपना उदाहरण देकर अधिक से अधिक बच्चे पैदा कराने के लिए प्रेरणा दें । अन्यथा एक दिन अमरीका पर रंगीन लोंगो का राज हो जायेगा । हमारे यहाँ के एक महान विचारक तोगडिया जी ने इसीलिए हिन्दुओं को आठ-आठ बच्चे पैदा कराने की सलाह दी थी पर इन नासमझ हिन्दुओं ने कोई ध्यान नहीं दिया । कहते हैं आठ-आठ बच्चों को खाना कौन खिलायेगा ।

इतना भी नहीं समझते कि जिसने चोंच दी है वह चुग्गा भी देगा । आप के यहाँ तो वैसे भी अनाज की क्या कमी है । सूअरों तक को अनाज खिलाया जाता है । फिर भी बच जाता है तो उससे बिजली बना ली ज़ाती है । इसलिए पाप को प्रणाम करके इस पुण्य काम में लग जाइए और भविष्य के लिए गोरा राष्ट्रपति ही सुरक्षित करें ।

अमरीका की सभी गोरी महिलाओं के लिए दूधों नहाने और पूतों फलने का आशीर्वाद और आपके लिए राष्ट्रपति बनने की अग्रिम शुभकामनाएँ ।

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७ नवम्बर २००८



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Nov 15, 2008

तोताराम के तर्क - बुश की बिल्ली :ओबामा का कुत्ता



आज तोताराम ने आते ही पूछा- मास्टर, अपना मोती किस नस्ल का कुत्ता है? हमें हँसी आ गई, कहा- अरे, कुत्ते की भी कोई नस्ल होती है क्या? कुत्ता माने कुत्ता। सभी कुत्ते पूँछ हिलाते हैं, सभी कुत्ते तलवे चाटते हैं, सभी चोरों को देख कर चुपचाप पड़े रहते हैं और सज्जनों को भोंकते हैं। कुत्ते की अपनी कोई जाति, धर्म, नस्ल, भाषा, प्रांतीयता, राष्ट्रीयता नहीं होती। जैसा मालिक वैसा कुत्ता। नवाब का कुत्ता पूजनीय तो गरीब के कुत्ते को कोई भी पत्थर मार सकता है। बॉस का कुत्ता मुतिया नहीं, मोतीजी होता है। गरीब हीरा भी पहन ले तो काँच और अम्बानी काँच भी पहनले तो कोहिनूर। कुत्ते की नस्ल नहीं उसके मालिक का नाम पूछा जाता है। अपने देश में चुनाव में टिकट देते समय, स्कूल में प्रवेश, नौकरी में आरक्षण, सस्ता अनाज, मुफ्त बिजली देते समय भले ही जाति, धर्म पूछे जाते हों पर वैसे जाति धर्म की बात करना असंवैधानिक है। और अब जब ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति बन गए तो समझले सारी दुनिया में नस्ल का प्रश्न बेमानी हो गया है। फिर भी आज तू कुत्तों की नस्ल के बारे में क्यों पूछ रहा है?

तोताराम बोला- भले ही ओबामा ने परिवर्तन के नाम पर जीत हासिल की हो पर व्हाइट हॉउस की परम्परा में परिवर्तन नहीं कर सकेंगे। उन्हें भी क्लिंटन और बुश की तरह कुत्ता पालना ही पड़ेगा। वैसे अभी बुश ने सलाह दी है कि कुत्ते की नस्ल जैसे महत्वपूर्ण मामले को अभी सार्वजनिक नहीं किया जाए। बुश ने अपनी बिल्ली का नाम 'इंडिया' रखा था मैं सोचता हूँ कि ओबामा को एक भारतीय नस्ल का कुत्ते भेंट करूँ और प्रार्थना करूँ कि वे उसका नाम 'भारत' रखें। इससे 'इंडिया की जगह 'भारत' की स्थापना की कामना कराने वालों की भी आत्मा शांत हो जायेगी। बुश के जाते-जाते 'इंडिया' को परमाणु समझौता मिला तो ओबामा के जाते-जाते भी भारत को भी कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।

हमने कहा- फालतू की बातें मत सोच। कुत्ता कुत्ता ही होता है। हर कुत्ता टाँग उठाकर पेशाब करता है। कोई कुत्ता दूध नहीं देता। वे जाने उनके कुत्ते जाने। वैसे जहाँ तक इतिहास की बात है तो पिछले पचास साल में तो अमरीका ने पाकिस्तानी कुत्ते ही पसंद किए हैं। तोताराम बोला- पर यह भी तो सिद्ध हो चुका है कि पाकिस्तानी कुत्तों ने बिस्कुट तो अमरीका के खाए पर दुम हिलायी आतंकवादियों के आगे। ऐसे कुत्ते मौका लगने पर मालिक को भी काट सकते हैं। भारतीय नस्ल का कुत्ता भले ही पड़ोसी की मुर्गी चुरा कर न लाये पर मालिक को कटेगा तो नहीं। भारतीय कुत्ता अपना धर्म समझता है। खैर, ओबामा किसी भी नस्ल का कुत्ता पालें, कुत्ता पालें या गाय यह उनका आतंरिक मामला है। हमें तो इसी बात से खुश है कि तोताराम को भारतीय नस्ल के कुत्तों पर गर्व तो है।

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१२ नवम्बर २००८



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Nov 5, 2008

सलाम अमरीका



हम अमरीका की भोगवादी, पूंजीवादी, नस्लवादी, गोरी कुंठाग्रस्त संस्कृति को देख और भुगत चुके हैं| इसीके दुष्परिणाम थे -हथियारों की होड़, आतंकवाद और बैंकों तथा अर्थव्यवस्था का लड़खड़ाना| आज ओबामा की जीत के साथ ही अमरीकी समाज ने अपने नस्लवादी पाप का प्रायश्चित कर लिया है| प्रायश्चित से पवित्रता आती है| योरप में यह भावना पता नहीं कब आयेगी पर अमरीका ने अपने लोकतंत्र का क्रांतिकारी उजला और सकारात्मक पक्ष दुनिया के सामने रख दिया है|

हालांकि हिलेरी क्लिंटन ने अपने लिए पार्टी की उम्मीदवारी जीतने के लिए ओबामा को अफ्रीकी मूल का मुसलमान प्रचारित करवाया, मेकेन ने उन्हें यूरोपियन समाजवादी कहते हुए हुसैन(मुसलमान) को रेखांकित किया| मेकेन की चुनाव सभा में ओबामा के लिए किल हिम, किल हिम के नारे भी लगे पर चुनाव परिणाम ने यह सिद्ध कर दिया कि यह अमरीकी बहुमत की आवाज नहीं थी|

हमने चुनाव सभाओं में आने वाले अस्सी-नब्बे साल के बुजुर्गों की आंखों में आंसू देखे हैं| उनको विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उस अमरीका में जहाँ कभी उनके साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया गया था, उस अमरीका में उनके सामने राष्ट्रपति पद का एक काला उम्मीदवार खडा है| अब ओबामा की जीत के जश्न में शामिल गोरों के चेहरों पर आक्रोश नहीं वरन सहजता थी| अब आशा की जानी चाहिए कि ओबामा ने जो समन्वयवादी और परिपक्व मुद्दे उठाये हैं उन पर कार्य करके अमरीका को एक कल्याणकारी और संवेदनशील राष्ट्र की छवि प्रदान करेंगे|

हम भी अमरीका की आलोचना करते रहे हैं पर इस क्षण पर हम अमरीकी लोकतंत्र को सलाम करते हैं और इस नई अमरीकी छवि के और उज्ज्वल होकर निखरने की कामना करतें हैं| आशा है कि संसार के कट्टरवादी और धर्म, जाति, भाषा के नाम पर विद्वेष फैलाने वाले कुछ शिक्षा लेंगे |

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जोन मकेन बनाम ओबामा उर्फ़ हम काले हैं तो क्या हुआ



जोन मकेन साहब ,

जय रामजी की। आपने अपना स्वयं का महत्व संक्षेप में बताते हुए कहा- 'आई हैव बीन टेस्टेड, सीनेटर ओबामा हजण्ट' ।

आपके पूर्ववर्ती बुश साहब को दुनिया ने आठ बरस झेला। अब यदि आपको भी अगले चार साल झेलना पड़ा तो क्या कर सकते हैं। भगवान की मर्जी। बुश साहब कैसे जीते यह तो अल गोर का जी जानता है। बुश के आते ही वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में आतिशबाजी हो गई और जाते-जाते सरकारी खजाने का भट्टा बैठा गए। ऐसा नहीं है कि बुश के ज़माने में धरती ने अनाज, फल-फूल नहीं दिए हों या अमरीकी मज़दूरों और कारीगरों ने काम नहीं किया हो या बादलों ने वर्षा नहीं की हो, या दुनिया के मूर्ख देशों ने हथियार नहीं खरीदे हों। कारण यह है कि टेक्सास की तेल लाबी ने अपने फायदे के लिए अफगानिस्तान, ईराक़ में टांग फंसाती और जनता की पसीने की कमाई सेना पर बहाई। पहले विनाश किया और फिर रम्सफील्ड जैसों ने निर्माण के नाम पर जम कर कमाई । अब अगर आपका नंबर आया तो क्या होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है ।

जहाँ तक आपका टेस्ट होने की बात है तो अमरीका की सेना ने कभी अपने देश की रक्षा के लिए युद्ध नहीं किया। सैनिक नौकरी के चक्कर में झींकते-झींकते कभी कोरिया गए तो कभी वियतनाम, कभी कुवैत तो कभी अफगानिस्तान तो कभी ईराक़ जाना पड़ा। जैसे-तैसे टाइम पास करके वापस आ गये जान बचाते-बचाते। कुछ मारे गए यह बात और है।

जहाँ तक आपकी व्यकिगत वीरता का सवाल है, हम तो इतना जानते हैं कि सच्चे वीर पीठ दिखाने या बंदी होने की बजाय वीर गति को प्राप्त होना ज्यादा बेहतर समझते हैं। हमारे स्वतन्त्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद कहा करते थे कि मैं जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आऊँगा। भगत सिंह जानबूझकर इस लिए गिरफ्तार हुए थे कि वे अंग्रजों की न्याय व्यवस्था का सच लोगों के सामने लाना चाहते थे। आप वियतनाम युद्ध जीत कर आते तो और बात । वैसे आपके पिताजी भी सेना में उच्चअधिकारी थे और आप भी। पता नहीं कैसे कैद कर लिए गए ।

ख़ैर जान बची और लाखों पाये, लौट कर सूरमा घर आए। अब आराम से फौज की पेंसन पेल रहें हैं। जहाँ तक अमरीका के द्वितीय विश्व युद्ध में विजयी होने की बात है तो जापान को अणु बम डालकर हथियार डालने के लिए विवश किया । ज़मीनी लडाई में हराते तो बात और थी। और हिटलर को अमरीका ने नहीं सोवियत रूस ने हराया था। अमरीका तो रूस की हार के इंतज़ार में तमाशा देख रहा । जब हिटलर हारता दिखा तो जहाँ मौका मिला कब्ज़ा कर लिया।

वैसे सेना में है मज़ा। अधिकतर तो मेस का खाना खाकर और सस्ती दारू पीकर ही रिटायर हो जातें है। युद्ध का मौका ही नहीं आता। फील्ड में रहो तो सब कुछ मुफ्त, तनख्वाह घर भेजो। पीस एरिया में रहो तो केन्टीन का सामान और दारू बाज़ार में बेचो। रिटायर होने पर पेंशन। बीच में मर जाओ तो पूरे कार्यकाल तक बच्चों को पूरी तनख्वाह और बाद में पेंशन। मुसीबत तो साधारण जनता की है- कभी बेकारी, कभी महंगाई, कभी छंटनी। आपको इसका क्या पता? आप तो खानदानी सरकारी दामाद रहें हैं ।

वैसे आपके अनुसार ओबामा का टेस्ट होना अभी बाक़ी । हमारे अनुसार तो उसने टेस्ट दे दिया साधारण स्थिति में रहकर, मेहनत की रोटी खाकर आपके सामने खड़ा है- यह क्या कम है। और फिर स्वप्न भी तो बड़ा देख रहा है, इसी बात की दाद दो बालक को । बड़ा सपना ईसा ने देखा, लिंकन ने देखा, गांधी ने देखा, मार्टिन लूथर ने देखा और अब ओबामा देख रहा है। आदमी का सपना ही उसकी पहचान होती है। त्वचा का रंग मत देखो उसके सपनों का रंग देखो।

बड़े घरानों की चमक और आतंक और गोरे रंग की कुंठा से बाहर आओ मियाँ मेकेन। अंत में एक हिन्दी गाने की पंक्ति- हम काले हैं क्या हुआ दिल वाले हैं ।

आपका,
रमेश जोशी

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४ नवम्बर २००८



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Oct 29, 2008

टुच्चा देश




सारा पालिन मेडम,

भगवान आपको काले ओबामा की काली छाया और ज़रदारी जैसों की रसिकता से बचाए वैसे ओबामा आदमी तो बुरा नहीं है। काला है तो क्या? भगवान की मर्जी। हमने तो राम, कृष्ण, शिव,विष्णु को काले रंग के कारण रिजेक्ट नहीं किया। यह बात और है की काले का राष्ट्रपति होना अमरीका की समृद्ध परम्परा में नहीं है। ओबामा के पितृ पक्ष के पूर्वज मुसलमान थे, ठीक है पर मुसलमान १५०० वर्ष और ईसाई २००० हज़ार वर्ष पहले कहाँ थे? हमारे यहाँ के सभी ईसाई और मुसलमान हिंदू थे पर आज न तो वे अपने को भूतपूर्व हिन्दू मानते हैं और न हम। और फिर ओबामा के नाना-नानी तो गोरे ईसाई हैं। पर खैर यहाँ आपके महान लोकतंत्र का अंदरूनी मामला है। हमारे लोकतंत्र में तो तीन-तीन मुसलमान राष्ट्रपति हो चुके हैं और अब भी प्रधान मंत्री एक अल्पसंख्यक है और कांग्रेस की अध्यक्षा इटली मूल की एक महिला है। जहाँ तक ज़रदारी की बात है बेचारा विधुर है और फिर आपकी प्रशंसा किस तरह करता क्योंकि आपके खाते में ब्यूटी क्वीन के अलावा और कोई उपलब्धि भी तो नहीं है।

हम तो आपको दिवाली की बधाई देने वाले थे पर क्या करें आपके यहाँ तो आजकल दिवाली की जगह दिवाला चल रहा है। वैसे दिवाले का भी क्या दोष? क्रेडिट कार्ड दे देकर आपने लोगों को फिजूल खर्च बना दिया आपके अर्थशास्त्रियों ने भी ब्रह्म वाक्य मान लिया की जितना उपभोग,उतना उत्पादन और जितना उत्पादन उतनी गतिशील अर्थव्यवस्था। पर आप यह भूल गए कि बूँद-बूँद टपकने से घड़ा खाली हो जाता है। आपने तो घड़े का पेंदा ही निकाल दिया। सो यह तो होना ही था। हमारे भारत को देखो रूखा-सूखा खाकर भी दिवाली मना रहा है और पटाखे फोड़ रहा है। शेयर बाज़ार की बात छोडिये वह तो जुवारियों का धंधा है।

वैसी एक बात कहना चाहेंगे कि आपका देश है बड़ा टुच्चा। अरे, आपने पार्टी फंड से एक लाख के कपड़े क्या सिलवा लिए , लोगों के पेट में दर्द होने लगा। हमारे यहाँ जय ललिता के पास दस हज़ार साडियाँ और आठ हज़ार सेंडिल हैं पर किसी कोई तकलीफ नहीं है महँगी पोशाकें राजा-रानी, नेता नहीं पहनेंगे तो क्या गाँधी, आमटे, टेरेसा या मेधा पाटकर पहनेंगे? हमारे यहाँ तो फिल्म में नाचने वाली भी एक गाने में बीस-बीस ड्रेसें बदल लेती है, हीरोइन का लहंगा दस पन्द्रह लाख का बन जाता है। अमिताभ बच्चन का चश्मा दो लाख का है पर क्या किसीको आलोचना करते सुना है? लोग सीटियाँ और तालियाँ बजाते हैं और मज़ा लेते हैं।

सोचने की बात है। आप सबसे धनवान देश की उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हैं तो क्या आप और आपका परिवार दस-दस डालर की जींस पहनकर जनता के सामने आता? अरे जो नेता अपने लिए कीमती कपडों का इंतज़ाम नहीं कर सकता वह जनता का क्या स्तर ऊंचा उठाएगा ?नेता के ठाठ ही उसकी क्षमता का प्रमाण हैं। और फिर आप क्या ये कपड़े पहन कर सोयेंगी? पहनकर जनता को ही तो दर्शन देंगी जनता आनंदित होगी सो जनता का पैसा जनता के ही तो काम आ रहा है। रानी एलिजाबेथ क्या घर के अन्दर ताज को ढोती हैं? जनता के आनंद के लिए बुढापे में भी दो किलो का ताज सर पर रखकर जनता को दर्शन देने पड़ते हैं। और आपने तो यहाँ तक कहा है कि चुनाव के बाद ये कपड़े आप दान में दे देंगी। चुनाव के समय ऐसे वक्तव्य देने ही चाहियें। वैसे हारने के बाद कौन पूछता है। क्या ज़रूरत है दान देने की। यदि जीत जाएँ तो ड्रेसें नीलाम करना। अमरीका में बड़े गुण ग्राहक लोग हैं। क्लिंटन,माइकल जेक्शन की वे ड्रेसें, पेरिस हिल्टन के कुत्ते का जूठा टिन,ब्रितानी का जूठा बर्गर तक लोगों ने लाखों करोड़ों में खरीद लिए फिर आप तो ब्यूटी क्वीन हैं। बड़े सेलेब्रिटीज के कुत्तों तक का गू पूज्य और संग्रहणीय होता है।

चुनाव का क्या परिणाम होगा कुछ नहीं कहा जा सकता। यह तो आपकी पार्टी के नस्ल,धर्मं,रंग और जेंडर के मुद्दों को भुनाने की क्षमता पर निर्भर करता है।

फिलहाल इतना ही। शेष चुनाव परिणामों के बाद। वैसे आपको एक सलाह देना चाहेंगे कि यह बात करते-करते आँख मारने की आदत छोडिये वरना बेचारे कितने ज़रदारी चक्कर में पड़ेंगे।

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२९ अक्टूबर २००८

पार्टी फंड से एक लाख के कपड़े


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