Jan 6, 2024

क्रेन लटकिया हनुमान


क्रेन लटकिया हनुमान 

   

तोताराम हमेशा हमारी सरकार के एजेंडे में फिट न हो सकने वाली हर लोकतान्त्रिक बात को सकारात्मक सोच की आड़ में उड़ा देता है । लेकिन आज सदैव से विपरीत बहुत बिफरा हुआ आया, बोला- मास्टर, अब तो एफ आई आर दर्ज करवानी ही पड़ेगी । 

हमने कहा- किस लिबराण्डू, छद्म धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रद्रोही या मिमिक्री कलाकार ने तेरी भावना आहत कर दी ? दूसरे धर्म के किस लड़के ने हिन्दू लड़की को अपने प्रेम के धोखे में फँसाया है ? कौन हमसे पूछे बिना गौमाता को काटने के लिए ले जा रहा है क्योंकि ये लोग दूध तो पीते नहीं और अगर पीते भी हैं तो सकता है छुरी दिखाकर बेचारे किसी बकरे का ही निकाल लेते होंगे । किसने भगवा वस्त्र पहनाकर हिन्दू नायिका को नचा दिया ? बता तो सही, अभी आसाम में एफ आई आर दर्ज करवाकर गुजरात से पकड़वाकर मँगवा लेंगे । किसने राष्ट्र-गौरव हिन्दू जाति का अपमान किया है ? केस दर्ज करवाकर अधिकतम सजा दिला कर एक दिन में सदस्यता खत्म करवाकर शाम को ही बँगला भी खाली करवा लेते हैं । अगर किसी ने किसी को अपना पासवर्ड भी दे दिया है तो सफाई देने का मौका दिए बिना ही सांसदी खत्म कर देंगे । बता तो सही, हमारे अनुज की भावना को किसने आहत किया है ? 

तोताराम ने हमारे पैर छूने का अभिनय करते हुए कहा- आदरणीय, आप इकतरफा, बदले की तुच्छ राजनीति की बातें कर रहे हैं । मैं तो इन सबसे परे अपने और मेरे जैसे करोड़ों के आराध्य और आम आदमी के सहज-सरल लोकदेव हनुमान जी की बात कर रहा हूँ  जो बिना किसी पक्की सरकारी नौकरी, बिना टीए डीए, इंक्रीमेंट और पेंशन के अपने आराध्य की निष्काम सेवा करने वाले हैं ।  झूठे-सच्चे मेडिकल बिल उठाने का तो प्रश्न ही नहीं।  ऐसे मेरे आराध्य हनुमान का अपमान हुआ है । मेरी भावना भयंकर रूप से आहत हुई है । 

हमने पूछा- क्या किसीने हनुमान जी की उल्टी-सीधी जाति बताई है । क्या किसी ने उनके चरित्र  या खानपान पर कोई अशोभनीय टिप्पणी की है । 

बोला- ऐसा कुछ नहीं है । यदि कोई व्यक्तिगत कुछ करता तो वे उसे पूंछ में लपेट कर कभी का पाकिस्तान फेंक चुके होते । यहाँ तो किसी ने उनका वेश बनाकर, हवा में लटक कर एक सामान्य मनुष्य को माला पहनाई है । अब बता, क्या ऐसा करने से मेरे आराध्य का अपमान हुआ कि नहीं ? 

हमने कहा- कहीं तू उज्जैन में मध्य प्रदेश के नए नए बने युवा और महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री मोहन यादव  के स्वागत में कुछ अनोखा करने के चक्कर में हनुमान जी का वेश बनाकर क्रेन से लटककर उन्हें माला पहनाने वाले उत्साही कार्यकर्ता की बात तो नहीं कर रहा ? 

बोला- और किसकी बात करूंगा ? ताजा ताजा घटना तो यही है । अब 22 जनवरी तक पता नहीं, हनुमान ही क्या राम तक को लेकर भी जाने क्या-क्या तमाशे हो सकते हैं । लोगों ने राम,हनुमान सबका मजाक बनाकर रख दिया है । एक चित्र देखा कि नहीं, जिसमें मोदी जी राम के वेश में छोटे से बच्चे को अंगुली पकड़ाकर ले जा रहे हैं जैसे कोई पेरेंट बच्चे को स्कूल छोड़ने जा रहा हो । मोदी जी ने तो एक भाषण में यहाँ तक कह दिया कि उन्होंने राम ही नहीं, करोड़ों लोगों के सिर पर छत का इंतजाम किया है । उनके अनुसार अब तक रामलला 500 साल से टेंट में सर्दी,गरमी, बरसात काट रहे थे । 

एक बार तो हद हो गई जब मोदी जी संत तुकाराम का वेश बनाकर मिमिक्री करते हुए पंढ़रपुर पहुँच गए । 

हमने कहा- तोताराम, अब इस मामले में हम कुछ नहीं कह सकते क्योंकि अब यह मामला आधिकारिक सरकारी रामभक्तों का हो गया है । यदि किसी विपक्षी, धर्मनिरपेक्ष, मुस्लिम आदि ने कहा होता तो बात और थी ।अब तक तो बुलडोज़र चलवा देते ।  देखो, राम जी के आधिकारिक ठेकेदार चंपत राय ने कहा कि मोदी जी विष्णु हैं । 

राम कृष्ण सब विष्णु के ही तो अवतार हैं इसलिए वे विष्णु अर्थात मोदी जी के अंडर में ही आते हैं। 

तुझे पता होना चाहिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन अर्थात कृष्ण हैं, तिस पर यादव हैं तो पक्के ही कृष्ण हैं । तभी तो मोदी जी ने उन्हें  'शिव'  के ऊपर वरीयता देते हुए चुना है । वे अपने अवतार को नहीं पहचानेंगे क्या ? ऐसे में हनुमान जी कर्तव्य है कि वे उनको माला पहनाएं । माला ही क्या, यदि वे उनके चरणों में भी बैठ जाते तो कोई भावना आहत होने का मामला नहीं बनता । छतीसगढ़ में तो उन्होंने साक्षात विष्णु को ही ढूँढ़ कर मुख्यमंत्री बना दिया । राजस्थान में भी भजन कीर्तन करने वाले संस्कारी को चुना है । अब इनके बारे में कुछ कहने सुनने की कोई  जरूरत नहीं है । 

बोला- फिर भी इस तरह हनुमान जी की मिमिक्री करना क्या ठीक है ? 

हमने कहा- इससे क्या फ़र्क पड़ता है ?पहले रामलीला के दिनों में रामलीला के पात्रों की मिमिक्री करना बच्चों का प्रिय खेल हुआ करता था । ऐसे ही पूंछ लगाकर हनुमान बने घूमा करते थे । इससे क्या होता है ? 

बोला- और अगर रस्सी टूट जाती और हनुमान जी गिर पड़ते तो ? 

हमने कहा- तो क्या हुआ खेल तमाशे में ऐसा हो ही जाता है । हमें याद है आज से साठ-सत्तर साल पहले हनुमान जी का आकाश मार्ग से संजीवनी बूटी लाना रामलीला का एक बहुत रोमांचक प्रसंग हुआ करता था । जिस नोहरे, बाड़े या मैदान में रामलीला होती थी उसके पास की किसी हवेली की छत से एक रस्सा बांध दिया जाता था और हनुमान जी उस पर फिसलते हुए आया करते थे । 

एक बार किसी ने रस्सी काट दी तो हनुमान जी गिर पड़े । खैरियत हुई कि ज्यादा ऊंचाई से नहीं गिरे । 

जैसे ही हनुमान गिरे, रस्से के सिरे के पास बैठे भक्त ने डायलाक मारा- हे हनुमान, इतना विलंब कैसे हुआ ? 

हनुमान जी गुस्से में थे, बोले-साले, विलंब की बात बाद में । पहले यह बता रस्सी किसने काटी? कहते हुए हनुमान जी ने उसे कसकर एक गदा जमा दी । 

तू तो मस्त रह । हनुमान जी की चिंता मत कर ।  ये राजनीतिक हनुमान हैं । आज ये क्रेन से लटक कर माला पहना  रहे हैं और कल को जब स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा तो ये लंका की जगह अयोध्या को फूँक देंगे । 

जब आज की भाजपा और तब की जनसंघ  1977 में जनता पार्टी बनकर सरकार में शामिल हुई थी तब खुद को चरण सिंह का हनुमान कहने वाले राजनारायण ने क्या किया था ?  याद है, ना ? 

जब हम पोरबंदर में थे तो वहाँ के 'रोकड़िया हनुमान' के यहाँ हर मंगलवार को जाया करते थे । लेकिन वह युग और था । उनका इस 'क्रेन लटकिया हनुमान' की तरह 'रोकड़ा' से कोई संबंध नहीं था । उस 'रोकड़' का मतलब था- तत्काल फल देने वाला । नकद । कोई पंद्रह लाख जैसा लटकाऊ, उल्लू बनाऊ वादा नहीं । 


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Jan 4, 2024

अगर मैं सरपंच होता

 अगर मैं सरपंच होता 


आज तोताराम ने आते ही कहा- मास्टर, कितना अच्छा होता अगर मैं सरपंच होता । 

हमने कहा- कौन क्या हो यह जीव के हाथ में नहीं होता । यह तो भगवान के हाथ में होता है । और भगवान के भी  हाथ में क्या ? यह तो धर्म के ठेकेदारों के हाथ में होता है । वे जिसे चाहें, जब चाहें जिस योनि में पटक सकते हैं । वैसे यह भी माना जाता है कि यदि कोई मनुष्य योनि में अच्छे कर्म करता है तो उसकी मोक्ष हो जाती है । फिर बार बार जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो जाता है जैसे कि जब कोई नेता पार्टी अध्यक्ष या प्रधान मंत्री बन जाता है तो फिर उसे बार बार राज्य की राजधानी और दिल्ली के बीच बार बार चक्कर नहीं लगाने पड़ते । 

यदि मनुष्य अच्छे कर्म नहीं करता तो फिर उसका चक्कर शुरू हो जाता है । मक्खी-मच्छर, कुत्ता-बिल्ली से होते हुए 84 लाख योनियों की लंबी भारत-यात्रा । अब तू इस जन्म में तो जो बनना था बन चुका। आगे क्या बनेगा यह कोई तेरे हाथ में थोड़े है ? जो शक्तिशाली होते हैं वे शुरू में ही सीधे मुख्यमंत्री बनते हैं और जब कभी केंद्र में आते हैं तो सीधे प्रधानमंत्री ही बनते हैं । 

बोला- लेकिन कल्पना करने में क्या बुराई है ? हमें बचपन में निबंध भी तो लिखवाए जाते थे- अगर मैं भारत का प्रधानमंत्री होता या अगर मैं अपने विद्यालय का प्रधानाध्यापक होता आदि-आदि । 

हमने कहा- उस समय की बात और थी। तब तो वही बनने की कल्पना करनी पड़ती थी जो मास्टर जी कहते थे लेकिन अब वह बात नहीं है । अब तो कोई भी कल्पना की जा सकती है ।जब नेहरू जी प्रधानमंत्री बने तब तो  मोदी जी का जन्म भी नहीं हुआ था तो कैसे प्रधानमंत्री बन जाते लेकिन पैदा होने के बाद उन्होंने देखा कि नेहरू जी  देश का सत्यानाश कर रहे हैं तो उन्होंने कल्पना ही नहीं की बल्कि निश्चय कर लिया कि वे भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे और अमुक अमुक कम करेंगे । और आज देख वे भारत के प्रधानमंत्री हैं और जो उन्होंने उस समय निश्चय किया था वह सब धड़ाधड़ किये जा रहे हैं । 

तेरी तरह सरपंच की कल्पना करते तो अब तक अधिक से अधिक किसी छोटे मोटे राज्य के पंचायत राज्य मंत्री बन पाते । 

वास्तव में तू बहुत गरीब ही नहीं, सोच से भी बहुत गरीब प्राणी है । कल्पना भी की तो सरपंच बनने की । 

बोला- तूने कभी इस दिशा में सोचा ही नहीं। ज़िंदगी भर कभी डी ए,  तो कभी डी ए के एरियर, कभी मेडिकल अलाउंस, तो कभी इंक्रीमेंट में ही उलझा रहा । और अब दो रोटी और एक चाय में खुद को अंबानी-अदानी समझकर 'मगन गधा' बना हुआ है ।  

हमने कहा- तोताराम, अब तू अपनी सीमा से बाहर जा रहा है । तू इस 'बरामद संसद ' के अध्यक्ष का अपमान आकर रहा है । हम अपने किठाना वाले धनखड़ जी की तरह तुझे पूरे सत्र के लिए निष्कासित कर सकते हैं और तेरी अनुपस्थिति का फायदा उठाकर चाय के साथ तिल के लड्डू और पकौड़े का बिल निर्विरोध पास करवाकर अकेले ही सब खा सकते हैं । 

फिर भी हमें यह जानने की उत्सुकता तो है ही कि तूने कल्पना भी कोई बड़ी न करके सरपंच की ही क्यों की ? 

बोला- मेरी कल्पना की गरीबी की बात तो बाद में । मुझे तो तेरी राजनीतिक समझ पर तरस आता है । तुझे सरपंच की कमाई और हैसियत तक का पता नहीं । क्या किसी को एक बार सरपंच बन जाने के बाद नौकरी, खेती करते देखा है ? भले ही दुबारा सरपंच नहीं चुना जाए लेकिन कभी जीप से नीचे पैर नहीं रखता । हर रोज धोबी के धुले झकाझक सफेद कपड़े पहनता है । हर समय दो चार चमचे साथ रहते हैं।  और तेरे जैसे मास्टर और प्रिंसिपल सौ सौ रुपल्ली की ट्यूशन के लिए चप्पलें चटखाते फिरते हैं । भारत की राजनीति में दो ही सबसे पावरफुल होते हैं । सबसे नीची सीधी पर पंचायत प्रधान सरपंच और सबसे ऊंची पर प्रधानमंत्री । एक गार्ड और दूसरा ड्राइवर । बीच में तो सब डिब्बे होते हैं । हैसियत और अकल दोनों में डिब्बे । 

हमने पूछा- सरपंच बनकर तू अधिक से अधिक क्या कर लेता ?

बोला- क्या कर लेता ? प्लेन में बैठकर पंचायत की फ़ाइलें निबटाता । अपने राजस्थान के नए नए बने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की तरह ।  । 

हम तो हतप्रभ, कहा- प्लेन में फाइल ? हमारे पास तो साइकल भी नहीं है । प्लेन में पहली बार 1985 में बैठे थे जब कलकत्ता से पोर्ट ब्लेयर का शिप छूट गया था ।रेल में एक दो बार फर्स्ट क्लास में बैठे लेकिन ए सी फर्स्ट क्लास में  कभी नहीं । बाद में दस-बीस बार प्लेन में बैठने का मौका तो जरूर मिला लेकिन कभी बिजनेस क्लास में नहीं बैठे । 

वैसे एक प्लेन तो हजारों करोड़ का आता है। मोदी जी ने भी तो पिछले दिनों खरीदा था । 

बोला- मुझे मोदी जी जैसे प्लेन की कोई जरूरत नहीं । वैसे मोदी जी जैसे प्लेन की जरूरत तो नेहरू जी से लेकर देवेगौड़ा तक किसी को नहीं पड़ी । चंद्रशेखर तो एक बार भी लाल किले पर तिरंगा भी नहीं फहरा सके । चौधरी चरण सिंह तो मेरठ से दिल्ली तक के अलावा दूसरे देश, यहाँ तक कि नेपाल भी नहीं गए।

मोदी जी की बात अलग है । वे तो अब विश्वगुरु बन गए हैं। सारी दुनिया की समस्याएं उनके सिर आ पड़ी हैं । देश से ज्यादा विदेश में रहना पड़ता है । और जब देश में रहते हैं तो भी चुनाव के चक्कर में दिल्ली से बाहर ही रहना होता है । आराम के लिए एक मिनट का समय नहीं । ऐसे में सोना, नहाना-धोना, नाश्ता पानी सब प्लेन में । ऐसे में ऐसा तीन बी एच जितना बड़ा प्लेन तो चाहिए ही । 

हमने पूछा- तो फिर तू कैसा और कौनसा प्लेन खरीदेगा ? 

बोला- वैसा ही जैसा किसी आसाम वाले कबाड़ के व्यापारी ने खरीदा था। पुराना प्लेन । जो मुंबई से ट्रक पर वाया बिहार आसाम जा रहा था और रास्ते में मोतिहरी में फ्लाईओवर के नीचे फंस गया था । एक बार पहले भी ऐसा ही हुआ था जब हैदराबाद के किसी व्यापारी द्वारा खरीद गया और सड़क मार्ग से लाया जा रहा प्लेन कोच्चि में फंस गया था ।

हमने कहा- लेकिन जब तुझे कहीं जाना ही नहीं है तो प्लेन की जरूरत ही क्या है ? और फिर जो प्लेन मुंबई से आसाम तक खुद नहीं जा सकता । जिसे खुद को ट्रक पर लाद कर ले जाया जाए वह है किस काम का ?  

बोला- काम का क्यों नहीं है ? एक तो मैं प्लेन में बैठकर पंचायत का काम निबटाने वाला दुनिया का पहला सरपंच होऊँगा । दूसरे यदि किसी नए नए मुख्यमंत्री, विधायक को प्लेन में काम करते हुए फ़ोटो खिंचवाना होगा तो उसे ऑबलाइज कर दूंगा । गाँव में आज भी बहुत से लोगों ने अंदर से प्लेन नहीं देखा। उन्हें दिखाकर मुझे ही वोट देने की सौगंध ले लूँगा । जैसे भाजपा राम मंदिर में राम लला के दर्शन करवाकर अगला लोकसभा चुनाव जीतना चाहती है ।

एक बार अंदर से दिखाने की दस-बीस रुपए की टिकट लगा दूंगा । 

परमानेंट धंधा, पीढ़ियों के लिए । 





 


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Jan 2, 2024

तोता 'राम मंदिर'


तोता 'राम मंदिर'  


आज तोताराम ने आते ही फिर प्रश्न उछाला- तो अंततः क्या तय हुआ  ? 

हमने कहा- किस बारे में ?

बोला- किस बारे में क्या ? राम लला के गृह-प्रवेश वाले कार्यक्रम का ?

हमने कहा- हमारे अनुसार तो राम, मर्यादा, धर्म आदि का कोई तयशुदा विग्रह, स्वरूप नहीं होता । वह देश, काल, भक्त और फैशन के अनुसार बदलता रहता है । किसी फिल्म के नायक को अपनी प्रेमिका में रब दिखाई देने लग जाता है तो किसी चंपत राय को मोदी जी में विष्णु  नजर आने लगते हैं । कुछ स्वार्थी लोगों का स्वार्थ जब कीस गधे से सिद्ध होने वाला लगता है तो उसे गधे में अपना आराध्य और बाप दिखाई देने लग जाता है । कोई बाई अपने भगवान को खिचड़ी खाने के लिए विवश कर देती है । तो कहीं कोई भगवान किसी भगत का खेत जोतने के लिए विवश हो जाते हैं । 

राम तो एक भाव है जो आपको कुछ बड़ा करने की प्रेरणा देते हैं । अब यह बात और है कि कुछ अहंकारी लोग इस बढ़ती चुनावी ठंड में आधे-अधूरे बने घर (राम मंदिर) में  राम को बसाने का दंभ भरते हैं । 

लेकिन तुझे अब राम लला के गृहप्रवेश के बारे में और क्या तय करना शेष रह गया ?

बोला- वही, उस गीत की तरह- वो झरोखे से जो झाँके तो इतना पूछूँ । मैं रुकूँ या चला जाऊँ । मैं अयोध्या जाऊँ या नहीं । 

हमने कहा- आडवाणी जी और मुरली मनोहर जोशी को न आने वाला निमंत्रण दे दिया। बजरंग दल के संस्थापक कटियार को काट दिया, ठाकरे को ठुकरा दिया तो फिर तू कौनसा अनुपम खेर, माधुरी दीक्षित और विराट कोहली की तरह  सच्चा रामभक्त है कि तेरे बिना रामलला गृहप्रवेश से मना कर देंगे ।  

   
 बोला- लेकिन मुझे तो दो दिन पहले ही कुछ लोग पीले चावल दे गए हैं निमंत्रण स्वरूप । 

हमने कहा- यह तो बीजेपी का राम मंदिर के बहाने 2024 का चुनाव जीतने का एजेंडा है । और फिर यह भी तो तय नहीं है कि तू राम का भक्त है या नहीं ?

बोला- यह कौन तय करेगा कि मैं राम भक्त हूँ या नहीं ? और क्या आधिकारिक रूप से बुलाए गए 7000 हजार लोग ही राम भक्त हैं ? किसने दिया सर्टिफिकेट ?

हमने कहा- हम बहुत अधिक तो नहीं जानते लेकिन श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा है कि निमंत्रण सिर्फ़ उन्हें भेजा गया है जो ‘भगवान राम के भक्त हैं.’

बोला- इनमें से कितने राम और रामचारित को जानते समझते हैं । हमने तो सैंकड़ों बार रामचरितमानस पढ़ा है, मर्यादाओं का खयाल रखा है । और अब क्या खुद को राम भक्त सिद्ध करने के लिए किसी मुसलमान का लिंचिंग करें, किसी मस्जिद पर चढ़कर उस पर भगवा झण्डा फहराएं । क्या घूँघट का समर्थन और हिजाब का विरोध करें । क्या कोट के ऊपर जनेऊ पहने फिरें, क्या सड़क पर बैठकर संध्या वंदन करें, क्या हर बात का उत्तर 'जय श्री राम' से दें , क्या मुसलमानों को हाथ पैर बांधकर पाकिस्तान पटक आयें । क्या राम से प्रेम का प्रमाण अल्ला, गॉड, खुदा को गाली निकालना है ?

और फिर इन्होंने तो दो दिन में 'मर्यादा पुरुषोत्तम राम अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा' का नाम 'महर्षि वाल्मीकि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा' कर दिया । 

हमने कहा- एक बात साफ समझ ले और हमेशा के लिए समझ ले कि इन्हें न राम से मतलब है, न कृष्ण से। न मंदिर से मतलब है, न मस्जिद से । ये  हमेशा, हर चुनाव में पूर्ण बहुमत वाला नुस्खा चाहते हैं । यदि तू  इसकी गारंटी देता है तो हवाई अड्डे का नाम, अयोध्या और उसके रेलवे स्टेशन का नाम, देश का नाम, सेंट्रल विष्ठा का नाम और तो और  'राम मंदिर' का नाम  'तोता राम मंदिर' रखवा देते हैं ।   



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Jan 1, 2024

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू


निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू 


तोताराम की बातों में कोई न कोई लॉजिक होता तो जरूर है लेकिन हम उसे बहुत सीरियसली नहीं लेते क्योंकि वह लॉजिक उसके अपने हिसाब से होता है । जैसे सकारात्मक सोच वाले कहते हैं कि रुपया कमजोर नहीं हुआ बल्कि डालर मजबूत हो गया । अब गलती डालर की है तो फिर दोष रुपए को क्यों । 

वैसे तो आजकल जैसा माहौल चल रहा है उसके हिसाब से कोई किसी को सीरियसली नहीं लेता । कोई सबके खाते में 15 लाख आने की बात करता है तो नेताजी हंसने लग जाते हैं । कोई नेता कुछ भी फ्री में देता है तो लोग न तो उसे  सीरियसली लेते हैं और तभी बाद में कोई समझदार आदमी शिकायत करता ।

आज जब तोताराम आया तो उसने बहुत सीरियसली पूछा- मास्टर, मुझे अयोध्या जाना चाहिए या नहीं ?

हमने कहा- यदि तुम्हारी पोजीशन मोदी जी जैसी है तो तभी जाना जब भगवान राम खुद बुलाएं। निमंत्रण पत्र भेजें । और दो चार दिन बाद फोन भी करें कि तोताराम जी, याद है ना; 22 जनवरी को मेरे गृहप्रवेश में आना है ।आप ही अंगुली पकड़कर मुझे गर्भगृह तक लेकर चलेंगे । वे बनारस भी तब गए थे जब माँ गंगा पीछे ही पड़ गईं । सामान्य आदमी को राम के बुलावे मतलब होता है- ऊपर जाना, मर जाना, राम नाम सत्य है । और वह उस बुलावे से बच भी नहीं सकता । वह तो कोरोना तक के बुलावे को नहीं टाल सकता, राम के बुलावे की बात तो बहुत बड़ी है । 

वैसे तुझे बुलावा 'राम' ने भेजा है या 'चंपत राम' ने ? राम वाले को टाला नहीं जा सकता और चंपत राम वाले का कोई भरोसा नहीं। वह निमंत्रण होते हुए भी न आने का निर्देश होता है । 

देखा नहीं, आडवाणी जी और जोशी जी को कैसा निमंत्रण भेजा है ? न जाते बने, न घर बैठे बने । बिना बात बुढ़ापे में भद्द पिटी सो अलग । 

बोला- लेकिन अब तो विश्व हिन्दू परिषद वाले उनके घर जाकर निमंत्रण दे तो आए हैं । सोनिया, सीताराम येचुरी आदि को भी निमंत्रण भेजा है । 

हमने कहा- इन सभी निमंत्रणों में शुद्ध राजनीति है । आयें तो भाजपा के एजेंडे पर मुहर, और न आयें तो राम-द्रोही । जिन्हें न आडवाणी जी वाला न आने का निमंत्रण भेजा है वे,  और जिन्हें कूटनीति के तहत निमंत्रण भेजा है वे, सब दुविधा में हैं । जो किसी श्रेणी में नहीं आते हैं वे कहते हैं- हमें चाहे बुलाओ या नहीं, हम तो जाएंगे । तू इनमें से किसी श्रेणी में नहीं आता। इसलिए तू कहीं मत जा । 

  अब तू जा, अपने घर ।


 

बोला- चाय पिए बिना कैसे जा सकता हूँ । 

हमने कहा- ठीक है, चाय पी ले, फिर घर चले जाना ।  लेकिन अयोध्या मत जाना ।

बोला- लेकिन क्यों ?

हमने कहा- यह चंपत राय जी नहीं चाहते और भगवान राम का भी यही मत था । 

बोला- कोई तो कारण होगा ?

हमने कहा- तुम लोग राजनीति के बंदर भालू हो । जैसे पुल बनाने के लिए, लड़ने के लिए तुम्हारी जरूरत थी वैसे ही मस्जिद ढहाने के लिए, आंदोलन खड़ा करने के लिए तुम्हारी जरूरत थी । अब काम हो गया है । अब उस आंदोलन का सुफल भोगने वाले भोगेंगे । तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है । अप्प दीपो भव । अपने दीये खुद बनो । तेल खरीदो, दीये जलाओ । गर्व से भर जाओ ।  

रामचरितमानस में रावण विजय के बाद राम खुद बंदर-भालुओं से कहते हैं-

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू 

सुमिरेहु मोही डरपहु जनि काहू 

इसलिए हे शाखामृग तोताराम, तू चाय पीकर प्रस्थान कर। अब राम अयोध्या में गृह प्रवेश करके राज करेंगे । तू भी अपने आसपास की किसी शाखा पर उछल-कूद कर ।और यदि यह संभव नहीं है तो चमगादड़ की तरह उलटा लटककर मंत्र-जाप कर ।  



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