Jan 19, 2024

राम रोटी , राम चाय


राम रोटी , राम चाय 


आज ठंड पिछले तीन चार दिनों की बजाय अपेक्षाकृत कम है इसलिए उठने में अतिरिक्त विलंब नहीं किया । पत्नी ने आज लोहड़ी के उपलक्ष्य में चौले की दाल के पकौड़े बनाने का कार्यक्रम रखा हुआ है । चाय के साथ गरम गरम दिए जाएँ इसलिए तोताराम का इंतजार था । तोताराम कोई नेता तो है नहीं । सो कोई इंतजार नहीं करवाया। वैसे भी कुछ अतिरिक्त खाने-पीने का मामला हो तो पता नहीं, उसे कैसे टेलीपैथी हो जाती है कि बचना चाहो तो भी पहुँच ही जाता है । 

आज तोताराम के साथ उसकी पत्नी मैना भी है । हमने छेड़ा- क्या बात है आज जोड़े से ? तुझे कैसे इल्हाम हो गया कि आज चौले की दाल के पकौड़े बन रहे हैं । 

बोला- मैं पकौड़े खाने नहीं आया। आज हम दोनों अनुष्ठान पर निकल रहे हैं तो सोचा तुम लोगों से मिलते हुए निकल जाएँ । 

हमने कहा- तुझे कौनसा राम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा करनी है जो अनुष्ठान कर रहा है । और फिर मैना को ठंड में क्यों परेशान कर रहा है ? मोदी जी ने भी सपत्नीक प्राणप्रतिष्ठा करने का कोई संकेत दिया है ?  

बोला- मोदी जी की बात और है । वे जो करें वही शास्त्र सम्मत होता है ।  लेकिन जब मेरे पास सुविधा है तो मैं मैना को अनुष्ठान में अपने साथ क्यों न ले जाऊँ । 

हमने कहा- तो तू यह अनुष्ठान कहाँ से शुरू कर रहा है ? मोदी जी ने तो नासिक में काला राम मंदिर से शुरू किया है । हो सकता है वे राम के वनवास जीवन से जुड़े अन्य स्थानों पर भी जाएँ लेकिन अभी कुछ घोषित नहीं किया गया । मोदी जी अपने सब कामों में ऐसा ही रोमांच बनाकर रखते हैं । 

बोला- मेरे पास उनकी तरह कौनसा विशेष प्लेन है। मैं तो अधिक से अधिक राजस्थान रोडवेज के फ्री पास से जहां तक संभव हो जा सकता हूँ । मजे की बात देख राम मंदिर निर्माण के लिए राजस्थान से बहुत कुछ जा रहा है लेकिन राजस्थान में एक भी ऐसा राम मंदिर नहीं है जो देश के प्रसिद्ध राम मंदिरों में शामिल होने लायक हो । सो सोचा है कि हम दोनों रोज सीकर के एक दो हनुमान मंदिरों में हो आया करेंगे । आज बस से सालासर हनुमान जी के यहाँ जा रहे हैं । शाम तक लौट आएंगे । 

हमने कहा- तो दोनों चाय तो पी लो । साथ में पकौड़े भी हैं । 

बोला- चाय, पकौड़े सामान्य हैं या विशेष ?

हमने कहा- चाय तो वही रोज वाली है लेकिन पकौड़े जरूर तेज मिर्च और लहसुन डालकर स्पेशल बनाए हैं । 

बोला- प्राणप्रतिष्ठा तक मैं केवल 'राम चाय' और 'राम पकौड़े' का ही प्रसाद ग्रहण करूंगा । 

हमने कहा- चाय पकौड़े में राम कहाँ से आगया । 

बोला- सियाराममय सब जग जानी 

करहुँ प्रणाम जोरि जग पानी 

मेरे लिए सब कुछ राममय है । चाय भी पकौड़े भी, सभी कुछ । कानपुर हृदय रोग संस्थान के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीरज कुमार ने मात्र सात रुपये की एक किट बनाई है जिसमें वे ही तीन दवाइयां हैं एकोस्प्रिन, सोर्बिट्रेट व रोसुवैस 20 टैबलेट जो सामान्य रूप सभी काम में लेते हैं । लेकिन नाम दे दिया 'रामबाण किट' । 

हमने कहा- वैसे हमने राम से जुड़े कई नाम सुने हैं जैसे राम तुलसी, रामनामी, रामबाण, राम रक्षा स्तोत्र,  वैष्णव लोग एक प्रकार की पीली मिट्टी से तिलक लगाते हैं जिसे वे 'रामरज' कहते हैं । लोग अपने सुख दुख को 'राम कहानी' कह देते हैं।गांधी जी एक अच्छे शासन की कल्पना 'रामराज' के रूप में करते थे । कुछ लोग नमक को 'रामरस' कहते हैं। आडवाणी जी ने टोयोटा को एक सुविधाजनक वेनिटी वैन के रूप में बनवाया था और सोमनाथ से अयोध्या के लिए निकले थे जिसे उन्होंने 'रामरथ' का नाम दिया था ।देश में बहुत से रामनगर, रामगढ़, रामपुर हैं । और मजे की बात देखो कि रामपुर के नवाब को 'रामपुर' नाम से कोई तकलीफ नहीं हुई । वरना उन्हें भी योगी जी की तरह नाम बदलने से कौन रोक सकता था ।  किसी एक कीटनाशक का नाम भी 'रामबाण' मिलता है । 

लेकिन यह क्या तमाशा है कि तुम राम चाय, राम पकौड़े बना रहे हो। कल को राम पानी, रामरोटी, राम छाछ, राम सब्जी, राम जूते, राम चप्पल, राम अगरबत्ती कुछ भी बना लोगे। राम का तमाशा क्यों बनाते हो । हो सकता है कल को कोई राम कबाब, राम बिरयानी बना लेगा तो ? तब तुम्हारी भावना आहत हो जाएगी । एफ आई आर कराते फिरोगे ।  

बोला- बिल्कुल नहीं चलेगा । जब राम मांस खाते ही नहीं थे तो राम कबाब, राम टिक्का आदि कैसे हो सकते हैं । 

हमने कहा- जब क्षत्रिय ही मांस नहीं खाते थे तो फिर इस देश में माँस खाता कौन है ? ब्राह्मण, बनिए ? फिर ये अश्वमेध, गौमेध आदि यज्ञों के नाम क्यों हैं ? फिर अधिकतर बूचड़खाने हिन्दू मालिकों के क्यों हैं ? यदि राम के मांसाहारी होने से इतनी ही तकलीफ़ है तो हमें इस देश में मांस खाने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए । मांस खाने वाले देशों से संबंध विच्छेद कर लेने चाहियें । 

बोला- क्यों बिना बात की रामायण करता है । कोई बात नहीं 'राम पकौड़े' नहीं हैं तो न सही । ले आ लहसुन मिर्च के पकौड़े । संक्रांति का प्रसाद मानकर खा लेंगे । अन्न भगवान का अपमान ठीक नहीं । भोजन भी तो एक प्रकार का अनुष्ठान ही होता है । तभी तो हमारे यहाँ 'पेट पूजा' को भी एक प्रकार की पूजा ही कहा गया है । 


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Jan 17, 2024

मोदी नहीं तो कौन ?


मोदी नहीं तो कौन ?



हमारे यहाँ हमेशा चहल-पहल रहती है ।सुबह से ही स्कूल बसों, बिल्डिंग मेटीरियल ढोते ट्रेक्टरों और सुबह सुबह की अजान और मंदिरों के फिल्मी धुनों पर बजते भजनों की आवाजें आने लग जाती हैं ।  आज तो खैर मकर संक्रांति है । मोदी जी की कृपा से सुना है बिना झंडी दिखाए ही सूर्य भगवान उत्तरायण हो गए । वैसे इस उत्तरायण में भारतीय पतंगों, चीनी मंजे और छतों पर जोर जोर से बज रहे लाउडस्पीकरों का योगदान भी कम नहीं है । 

इसी शोरगुल नहीं, पवित्र ध्वनियों के बीच आज जैसे ही तोताराम का पदार्पण हुआ, हमने कहा- तो तोताराम, 22 को मोदी जी प्राणप्रतिष्ठा कर ही रहे हैं । 

बोला- क्या तुझे कोई शक है ?

हमने कहा- हमें कोई शक कैसे हो सकता है ? हम तो उनके अब तक के कामों से यही समझे हैं कि मोदी जी कुछ भी कर सकते हैं । नोटबंदी, तालाबंदी, संसद में एंट्रीबन्दी । लेकिन चर्चा है कि शंकराचार्यों ने इसे ठीक नहीं माना है । वे प्राणप्रतिष्ठा समारोह में नहीं जा रहे हैं । 

बोला- शंकराचार्य तो बिना बात बिफर रहे हैं ।  अगस्त 2020 में शिलापूजन के समय 36 परंपराओं के संतों महंतों को बुलाया गया था, यहाँ तक कि दो मुसलमानों को भी बुलाया गया था लेकिन शंकराचार्यों, तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द और विपक्षी पार्टियों के किसी नेता को, यहाँ तक कि आडवाणी जी को भी  नहीं बुलाया गया था ।  तब ये लोग क्यों चुप रहे ? असली आयोजक, संयोजक तो आर एस एस, हिन्दू महासभा, विश्व हिन्दू परिषद आदि हैं। आज भी वे ही हैं । 

हमने कहा- लेकिन अब तो बहुत से लोगों को बुलाया गया है, विपक्ष वालों को भी । 

बोला- वह तो उन्हें दुविधा में डालने के लिए बुलाया गया है । जाएँ तो भाजपा के मंदिर एजेंडा पर सहमति की मोहर, न जाएँ तो राम द्रोही । दोनों तरह फायदा भाजपा को । ऐसी किस्त मात फँसाई है कि न निगलते बने और न उगलते । यह तो विपक्षियों को शंकराचार्यों की आड़ मिल गई अन्यथा कोई रास्ता नहीं था । 

हमने कहा- लेकिन काम पूरा तो हो जाने देते । अपूर्ण मंदिर की जो बात बहुत से लोग कह रहे हैं उसमें भी दम तो है । और फिर कहते हैं ये काम सपत्नीक होने चाहियें । 

बोला- तो क्या मोदी जी ने शिलापूजन के रूप में 5 अगस्त 2020 को जो अकेले शिलान्यास किया था वह गलत था ? यदि था तो तब ये क्यों नहीं बोले ?  क्या रामसेतु बनाने से पहले राम ने रामेश्वरम की स्थापना अकेले नहीं की थी ? और फिर शस्त्रों में यह भी तो कहा गया है- महाजनो येन गतः सः पन्थाः । सो मोदी जी 'महाजन' हैं । 140 करोड़ भारतीयों ही नहीं बल्कि विश्व के 8 करोड़ लोगों के नेता और मार्गदर्शक । उनसे बड़ा 'महाजन' और कौन हो सकता है ? और फिर मोदी नहीं तो कौन ? 

हमने कहा- तो जब मोदीजी का जन्म नहीं हुआ था तब यह सृष्टि कैसे चल रही थी ?

बोला- चल क्या रही थी, घिसट रही थी 2014 से पहले । और फिर जिस काम को जो व्यक्ति सही ढंग से कर सकता हो उसी से करवाना चाहिए । स्पेशियलाइज़ेशन का युग है ।  कहा भी है-

जिसका काम उसी को साजे 

और   करे   तो  डंडा   बाजे 

जिसे देश के रेलमंत्री को झंडी तक दिखानी नहीं आती उस देश के शंकराचार्य क्या शिलापूजन करवाएंगे और क्या उद्घाटन करेंगे ? एक भले आदमी के सिर सब आ पड़ा । दस साल से 20-20 घंटे काम करना पड़ रहा है । लगता है अब वह दो-चार घंटे का सोना भी बंद । 

कोई बात नहीं । कहा भी है समझवार की मौत ।

हमने कहा- लेकिन अभी तो मंदिर अधूरा है । पूरा होने पर प्राणप्रतिष्ठा और गृहप्रवेश करवा देते ।  लोग कहते हैं चुनावों में फायदा लेने के लिए यह सब किया जा रहा है । 

बोला- लोगों का काम है कहना । बात वचन और वादे की है । 

रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्राण जाइ पर वचन न जाई ।।

इस टर्म के लिए तीन तलाक और धारा 370 के बाद यही वचन बचा था । अगर राममंदिर का वचन पूरा नहीं करते तो तुम लोग वादाखिलाफी का आरोप लगाते । 

और फिर आजकल ठंड कितनी पड़ रही है । बालक रामलला 500 साल से ठंड में बाहर बैठा है । अगर ठंड लगकर निमोनिया हो गया तो ? और फिर कब्जा पक्का करने के लिए रंग-रोगन का इंतजार नहीं किया जाता । जितनी जल्दी अंदर घुसकर बाहर नेमप्लेट लगा दो उतना अच्छा । 


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Jan 16, 2024

हार्ड वर्क बनाम हार्वर्ड


हार्ड वर्क बनाम हार्वर्ड 


आज तोताराम एकदम नए नए चुने मुख्यमंत्री /एम एल ए की तरह व्यवहार कर रहा था जो अपनी सदस्यता की शपथ लेने से पहले ही अपने मोहल्ले के अंडे के ठेले वालों को कराची भेजने की धमकी देने लगता है या सीएम बनने के बाद पहला आदेश यही जारी करता है कि धार्मिक स्थलों पर तेज आवाज में लाउड स्पीकर न बजाए जाएँ । और यह तो सब जानते हैं कि किस धर्म के कार्यक्रमों की आवाज तेज और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है । 

बोला- मास्टर, तू कितने घंटे काम करता है ? 

हमने कहा- काम करने के समय हमने भी खूब काम किया है । अब अस्सी के हो गए, क्या अब भी काम करते रहेंगे ?  वैसे अब भी कुछ न कुछ काम करते ही हैं लेकिन किसी के दबाव में नहीं । अब हम जो भी करेंगे अपने मन से करेंगे । मन करेगा तो दिन में दो बार स्नान करेंगे, मन नहीं करेगा तो चार दिन नहीं नहायेंगे । मन होगा तो रात को 12 बजे तक जागेंगे और मन नहीं होगा तो दस बजे तक सोते रहेंगे । 

बोला- अभी तो तेरे हाथ-पैर चल रहे हैं । कुछ बड़ा सोच, कुछ सार्थक और परमार्थ का सोच, देश-दुनिया का सोच ।इन्फोसिस वाले नारायण मूर्ति को देख । कहते हैं उन्होंने सप्ताह में नब्बे नब्बे घंटे काम किया है ।उन्होंने देश के युवाओं को सप्ताह में 70 घंटे काम करने की सलाह दी है । उनके अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान और जर्मनी ने भी ऐसा करके ही विकास की बुलंदियों को छुआ है । इस संदर्भ में उन्होंने मोदी जी का भी उदाहरण दिया है । 

हमने कहा- बनिया अपनी दुकान पर सुबह-सुबह आकर बैठ जाता है और ग्राहक के इंतजार में देर रात तक बैठा रहता है । किसान भी दिन रात काम करता है । उत्तर प्रदेश के किसानों को देख, रात रात जागकर खेतों से सांड भगाते हैं । अगर मूर्ति जी ने नब्बे घंटे काम किया है तो उन्हें उसका लाभ मिला है लेकिन अपने कर्मचारियों से इतने काम की आशा क्यों ? और अगर आशा करें तो उसे देश के विकास के नाम पर भावनात्मक शोषण से क्यों जोड़ते हैं ? कर्मचारी से अधिक काम की आशा करें तो उसे अधिक वेतन और सुविधाओं से जोड़ें । 

बोला- लेकिन देश के लिए निस्वार्थ कर्म करने से एक गर्व की अनुभूति तो होती ही है । क्या सब कुछ पैसे के लिए ही होता है ? 

हमने कहा- ये नेता और उद्योगपति क्या देश की सेवा करने के लिए लड़-मर रहे हैं ? यह मारामारी शुद्ध पद, पावर, यश और मनमानी का अवसर पाने के लिए है ।  कोई भी वित्तमंत्री देश प्रतिव्यक्ति औसत ये में दो महिने जिंदा रहकर दिखा दे तो माँ लेंगे। 

बोला- फिर भी इतने बड़े और पिछड़े देश को दस-पाँच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए ज्यादा काम करने की जरूरत तो है ही । इसीलिए तो मूर्ति जी 70-80 घंटे प्रति सप्ताह काम करने के लिए कह रहे हैं । मोदी जी खुद 20-20 घंटे काम करते । उनके एक प्रशंसक चंद्रकांत पाटील ने तो कहा है कि वे केवल दो घंटे ही सोते हैं ।अब तो वे यह प्रयोग कर रहे हैं कि बिना सोये ही काम चल जाए और वे दिन-रात चौबीसों घंटे देश की सेवा कर सकें ।  

हमने कहा- ज्यादा समय तक काम करने से कोई विशेष फायदा नहीं होता बल्कि काम की गुणवत्ता कम हो जाती है ।  पहले मजदूरों से अमानवीय तरीके से 20-20 घंटे काम लिया जाता था ।पिछली शताब्दी के शुरू में एक दिन में आठ घंटे काम करने का नियम बनाने के लिए आंदोलन किया जिसमें किसी ने बम विस्फोट कर दिया और पुलिस ने गोली चल दी जिससे 7 मजदूर मारे गए । उसके बाद से दुनिया में 8 घंटे प्रतिदिन काम का नियम बना । इसी उपलक्ष्य में 1 मई को 'मई दिवस' मनाया जाता है । 8 घंटे के इस नियम को सबसे पहले फोर्ड ने अपनी कंपनी में लागू किया और उसके बहुत अच्छे परिणाम मिले । मजदूरों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य ही अच्छा नहीं हुआ बल्कि कारखाने की उत्पादकता भी बढ़ी । 

बोला- फिर भी हमें सेवाभाववश  20-20 घंटे काम करने वाले अवतारी पुरुषों का आभार तो मानना ही चाहिए । 

हमने कहा- विष्णु जो सृष्टि के पालनकर्ता है और राम-कृष्ण सब जिनके अवतार है, वे भी साल में चार महिने सोते हैं जिसे देवशयन के नाम से जाना जाता है ।  मतलब जिस पर सृष्टि की जिम्मेदारी है वह भी 16 घंटे प्रतिदिन से अधिक काम नहीं करता । तिस पर शौच, खाना, नहाना, तरह-तरह के वस्त्र बदलना, साज-शृंगार, भक्तों के कीर्तन-जागरण अटेंड करना आदि आदि । ईसाई भी अपने भगवान को सप्ताह में एक दिन की छुट्टी भी देते हैं । डाक्टरों का मानना है कि कम सोने से आदमी की निर्णय लेने की क्षमता दुष्प्रभावित होती है । कुछ का कुछ दिखाई देने लगता है। टेलिप्रॉम्प्टर देखकर भी ढंग से नहीं पढ़ सकता । 

बोला- तो फिर यह हार्ड वर्क और हार्वर्ड वाले जुमले का क्या मतलब है ? 

हमने कहा- जो हार्वर्ड तो बहुत दूर, यहाँ भी संदेहास्पद डिग्री से काम चला रहे हैं वे ही अपनी झेंप मिटाने के लिए ऐसी चंडूखाने की बातें करते हैं । 


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Jan 15, 2024

वैसी पीड़ा मुझे देना दाता


वैसी पीड़ा मुझे देना दाता  


चाय में थोड़ा विलंब था । समय बिताने के लिए भरे पेट वाले आजकल अंत्याक्षरी खेलते हैं । सामान्य आदमी की तो दो जून की रोटी जुगाड़ने में ही सांस फूल जाती है । बेकारी में भी वह अंत्याक्षरी नहीं खेलता । भजन करता है कि अच्छे दिन आयें । यह बात और है कि दो आरजू में और दो इंतजार में कट जाते हैं । ऐसे ही भूखा ब्राह्मण भी ज्यादा भजन करता है । सो चाय के इंतजार में तोताराम ने गुनगुनाने लगा, जो कुछ इस तरह था- 

वैसी पीड़ा हमें देना दाता ------ । 

हमने कहा- तू कौनसा ईसा है जो सबके पाप अपने सिर लेता है । कमर और घुटनों में दर्द रहता है । पेंशन की रजाई इस ठंड में लगातार छोटी पड़ती जा रही है । अब कौनसी पीड़ा शेष है जिसके लिए गुहार लगा रहा है । 

बोला- जब दर्द-पीड़ा हद से गुजर जाएंगे तो अपने आप ही दवा बन जाएंगे । लोग पता नहीं क्यों आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री जनऔषधि योजना और मोहल्ला क्लीनिक के चक्कर में पड़े है । बढ़ने दे मर्ज को, अपने आप दवा हो जाएगा । गालिब क्या झूठ कहते हैं- दर्द का हद गुजर जाना है दवा होना । 

और फिर पीड़ा का अपना एक मज़ा है । इसी बहाने सही, चार लोग पूछने तोआते हैं । 

हमने कहा- कोई नहीं आता । तुझे पता होना चाहिए जब नवाब साहब की कुतिया बीमार पड़ी तो हजार लोग पूछने आए लेकिन जब नवाब साहब मरे तो जनाजे में चार जन भी नहीं जुटे । कितने लोग हैं जो आडवाणी जी को मंदिर उद्घाटन में न आने का निमंत्रण मिलने पर उनके घावों पर मरहम लगाने या उनके आँसू पोंछने गए ।   

वैसे पीड़ा तो पीड़ा होती है, ऐसी वैसी क्या ? फिर भी तू भगवान से 'वैसी' कैसी पीड़ा मांग रहा है ? 

बोला- वैसे तो इस गीत के तीन चरण है लेकिन 'मुखड़ा' सुन-

वैसी पीड़ा मुझे देना दाता 

जैसी धनखड़ औ' मोदी को दी है 

हमने कहा- तो तू धनखड़ और मोदी जी जैसी पीड़ा चाहता है । उन्हें क्या पीड़ा है ? धनखड़ जी का केवल भाजपा के एजेंडे के तहत बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को परेशान करने के अतिरिक्त देश की राजनीति में ऐसा कौन सा योगदान है जिसके लिए उन्हें उपराष्ट्रपति बनाया गया । राजाओं वाली ज़िंदगी जीते हैं। कोई जिम्मेदारी नहीं। सरकारी खर्चे पर तीर्थयात्रा करते फिरो । और मोदी जी को भी मन की बात करने, विदेश यात्रा करने, नेहरू जी को गाली देने और दिन में दस बार कपड़े बदलने के अलावा कौन सा काम है ? 

अगर धनखड़ जी के लिए लोकसभा की ऊंची कुर्सी पर बैठना और मोदी जी के लिए कपड़े बदलना ही पीड़ा है तो हमें तो इस पीड़ा से बहुत ईर्ष्या है । भगवान ऐसी पीड़ा सबको दे । 

बोला- तू यहाँ आडवाणी जी की तरह मजे से बरामदा निर्देशक मण्डल में बैठकर चाय पेलता रहता है । तुझे क्या पता अपमान की पीड़ा क्या होती है । वह भी अपना नहीं  जाट जाति का, लोकसभा अध्यक्ष के पद का अपमान !कैसे धनखड़ साहब चार दिन में ही सूखकर मात्र एक सौ किलो के रह गए । ऊपर से लोग मिमिक्री और करने लगे । 

हमने कहा- अब धनखड़ साहब को और क्या चाहिए ? जो मोदी जी मणिपुर की महिलाओं पर वीभत्स अत्याचारों के बावजूद एक शब्द नहीं बोले, एक दिन के लिए मणिपुर नहीं गए, जो मोदी जी अपने घर की पहलवान बेटियों के यौन शोषण और सड़क पर घसीटे जाने पर भी मौन रहे, कुश्ती संघ के अध्यक्ष को बचाते रहे वे मोदी जी धनखड़ साहब की पीड़ा से इतने द्रवित हो गए कि ट्वीट कर आँसू पोंछने लगे । इससे ही कल्पना की जा सकती है कि धनखड़ साहब की पीड़ा कितनी दारुण और राष्ट्रीय महत्व की है । 

ठीक भी है घायल की गति गति घायल जाने । मोदी जी को भी ओ बी सी होने के कारण पिछले बीस वर्षों में जाने कितना अपमान सहना पड़ा है ?  सुना है गालियां खा खाकर पोषण प्राप्त करते रहे हैं ।  

बोला- इसीलिए मैं धनखड़ साहब और मोदी जी जैसी पीड़ा चाहता हूँ जिससे मेरा वजन भी एक सौ नहीं तो कम से कम पचास किलो तो हो जाए और मोदी जी की तरह चेहरे से नूर टपकने लगे । 

हमने पूछा- तोताराम, धनखड़ साहब की इस पीड़ादायक दशा की अब क्या दिशा होगी ? 

बोला- यदि मोदी जी को ऐसी पीड़ाओं का पिछले दस वर्षों की तरह पुरस्कार मिलता रहा तो वे फिर प्रधानमंत्री होंगे और धनखड़ साहब की दिशा उपराष्ट्रपति भवन से राष्ट्रपति भवन की तरफ होगी ।  


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