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Jan 23, 2012

तोताराम का विज्ञान प्रधान देश

भारत एक 'प्रधान' देश है इसलिए वह जब चाहे, जिस क्षेत्र में चाहे प्रधान बन जाता है । पहले वह एक कृषि प्रधान देश था । उस समय देश में भुखमरी थी । अनाज विदेशों से आता था । किसी तरह कृषि विश्वविद्यालय खुले, खाद के कारखाने खुले, बीजों में भी सुधार हुआ और कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भरता आई । मगर उसे तो एक विकसित देश बनना था सो इतना विकसित हुआ कि अनाज निर्यात किया जाने लगा और इतना निर्यात किया गया कि फिर से उसी अनाज को, उन्हीं देशों से महँगे भावों पर फिर आयात करना पड़ा । अब हालत यह है अनाज गोदामों में सड़ रहा है और लोग भूखे मर रहे हैं । अब उसे यंत्रीकरण में उन्नति करनी थी सो यंत्रीकरण शुरु हुआ और हालत यह हो गई कि कारें बढ़ गईं और सड़कें कम पड़ गईं । कान कम पड़ गए और मोबाइल ज्यादा हो गए । मोबाइल कानों को ढूँढते फिर रहे हैं ।

उसके बाद यह देश एक लोकतंत्र-प्रधान देश बन गया । उसके सारे निर्णय लोकतंत्र के अनुसार लिए जाने लगे- चाहे वह रोटी का प्रश्न हो या फिर रोजी का । अब तो हालत यह है कि भगवान के बारे में भी और यहाँ तक कि न्याय संबंधी निर्णय भी लोकतंत्र अर्थात वोट बैंक के आधार पर लिए जाने लगे हैं । अब इस देश को विज्ञान प्रधान बनाने की जी तोड़ कोशिशें हो रही हैं हालाँकि केमेस्ट्री, भौतिकी आदि किसी के साथ भी विज्ञान नहीं लगा हुआ है जब कि विज्ञान लगा हुआ होने पर भी राजनीति विज्ञान, गृह विज्ञान, भाषा विज्ञान को कोई विज्ञान मानने के लिए तैयार नहीं । अजीब विडंबना है ।

जब से तोताराम ने न्यूटन के गुरुत्त्वाकर्षण के सिद्धांत को झूठ सिद्ध किया है तब से हमने उसे अपने छाया-मंत्रीमंडल में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त कर लिया है और विज्ञान के बारे में हम हर मामले में उसी से सलाह करते हैं । अभी कोई आठ-दस दिनों पहले कलाम साहब ने कहा कि हमारे देश में शोध और आविष्कार कम होते हैं । सो आज जैसे ही तोताराम आया हमने तोताराम के सामने समस्या रखी तो कहने लगा- कलाम साहब को देश में हो रहे आविष्कारों और खोजों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है, यदि होती तो वे ऐसा नहीं कहते ।

हमने कहा- तोताराम, कलाम साहब तो बहुत अपडेट रहने वाले व्यक्ति हैं । यदि ऐसा कुछ होता तो उनसे क्या छुपा रहता ?

तोताराम ने कहा- कलाम साहब बहुत ऊँची बातें सोचते हैं । बड़ी-बड़ी जगहों पर जाते हैं इसलिए उन्हें सामान्य लोगों द्वारा किए जा रहे आविष्कारों की जानकारी नहीं है । वैसे जब कोयले की खानों का राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ था तब भी लोगों ने अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का चमत्कार दिखाया था । तब कागजों में जितने कोयले का उत्पादन हुआ उससे ज्यादा निर्यात कर दिया गया । यह किसी बहुत बड़े वैज्ञानिक चमत्कार से कम है क्या ?
सरकार के बैंकों में, पोस्ट आफिस में जमा करवाने पर रुपया रो-रो कर कोई आठ साल में दुगुना होता है जब कि राजस्थान में एक 'स्वर्ण-सुख' नामक कंपनी ने एक साल में रुपया पन्द्रह गुना करने का वादा किया तो क्या यह मनमोहन जी के अर्थ-विज्ञान से कम है ?

हमने प्रतिवाद किया- मगर रुपया पन्द्रह गुना कहाँ हुआ ?

तोताराम ने उत्तर दिया- पन्द्रह गुना क्या, पन्द्रह लाख गुना हो गया । पता है, कंपनी बनाने वालों ने जितना विज्ञापन और कार्यालय खोलने में खर्च किया और जितना जनता के धन की सुरक्षा करने वालों को दिया उससे तो पन्द्रह लाख गुना से भी ज्यादा हो गया । अब उससे कौन बहस करे ?

हमने विषय का एक और आयाम निकाला- कहा, यह तो धोखाधड़ी है । कोई ऐसा आविष्कार बता जिससे कोई खाने-पीने की चीज़ बढ़ी हो ।

निरुत्तर हो जाने वाला तोताराम नहीं है । कहने लगा- जिस समय देश स्वतंत्र हुआ था उस समय जितना दूध का उत्पादन होता था उससे जाने कितना गुना बढ़ गया है जब कि हमारा देश सबसे ज्यादा चमड़े का निर्यात करता है । गाएँ सड़कों पर धक्के खाती फिरती हैं, गौशालाओं में अनुदान मिलने पर भी भूखी मरती हैं । फिर भी जब कभी कोई त्यौहार आता है तो मावे और दूध की निर्बाध सप्लाई हो जाती है । जितना चाहो पनीर, बटर और घी ले लो । ऐसी घी-दूध की नदियाँ तो कृष्ण के समय में भी नहीं बहती थीं ।

हमारे पास कोई उत्तर नहीं था सो हमने कहा- बंधु, तुम्हारी इन सूचनाओं से हमारा अत्यंत ज्ञानवर्धन हुआ है और कलाम साहब का तो पता नहीं, पर विज्ञान में देश के कम उन्नति करने के कारण हमारे मन में व्याप्त हीन-भावना समाप्त हो गई है और हमें लग रहा है कि गर्व से हमारी छाती कुछ-कुछ चौड़ी भी हो रही है ।

तोताराम ने देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में आगे बताया कि एक ही स्थान पर दो तरह के गुरुत्त्वाकर्षण बनाए जा सकते हैं । आज भी देश में ऐसे चमत्कारी लोग मिल जाएँगे जो सामान खरीदते समय बाट वाले पलड़े में गुरुत्त्वाकर्षण की मात्रा इतनी बढ़ा देते हैं कि पाँच किलो की जगह सात किलो सामान आ जाता है और बेचते समय सामान वाले पलड़े का गुरुत्त्वाकर्षण इतना बढ़ा देते हैं कि पाँच किलो की जगह तीन किलो सामान की ग्राहक के पल्ले पड़ता है ।

इस देश में वैज्ञानिकों ने ऐसी क्रीम बना ली है जो केवल पाँच रुपए में मिल जाती है और उपयोग करने वाली को चौदह दिन में ही इतना गोरा बना देती है कि उसे तत्काल दूल्हा मिल जाता है या किसी विमानन कंपनी में एयर होस्टेस की नौकरी मिल जाती है । आज तक कोई भी गोरा देश ऐसी क्रीम नहीं बना सका जिससे यह चमत्कार हो सके अन्यथा वे सरलता से सभी अफ्रीकियों को गोरा बना देते और जो एकता ईसाई बनाने पर भी नहीं आ सकी वह आ जाती और फिर सभी काले अफ्रीकी उन्हें अपना ही भाई समझते और गोरों को अफ्रीका से नहीं जाना पड़ता और न ही उन पर रंग भेद का आरोप लगता ।

और फिर यह तो तुम्हें मालूम ही होगा कि बिहार में पशु-पालन विभाग के कर्मचारियों ने नेताओं के निर्देशन में ऐसा स्कूटर बनाया था जिस पर बैठकर भैंस हरियाणा से बिहार जा सकती थीं । उसी काल में ऐसी क्षुधावर्द्धक दवा बना ली थी जिसे खाकर एक मुर्गी आठ सौ रुपए का चारा खा सकती थी । अब यह बात और है कि दो-चार दिन पहले ही बिहार के पशुपालन विभाग के कोई चालीस से अधिक कर्मचारियों को इस आविष्कार के लिए पुरस्कृत किया गया मगर पता नहीं बेचारे लालू जी और जगन्नाथ मिश्र को इस गौरव से क्यों वंचित कर दिया ?

आँगनबाड़ियों में सभी बच्चों को दो-पाँच रुपए में पौष्टिक भोजन खिला कर भी संचालक लोग स्वयं लखपति बन गए हैं । यह क्या किसी चमत्कारिक आविष्कार से कम है ? इतना तो द्रौपदी की अन्नपूर्णा वाली हंडिया से भी संभव नहीं था । कलाम साहब ने तो इतने वर्षों तक दिमाग खपाकर कुछ मिसाइलें बनाईं मगर अपने यहाँ तो ऐसे-ऐसे महापुरुष पड़े हैं जो हजारों किलोमीटर दूर बैठकर शब्दों से ही ऐसे-ऐसे गोले दागते हैं कि सामने वाले का मरण हो जाता है । बाजार ने ऐसे-ऐसे आविष्कार कर लिए हैं कि कोल्हू में डालने की ज़रूरत ही नहीं, दूर से ही चलते फिरते आदमी का तेल निकाल लेते हैं ।

हमने फिर भी पीछा नहीं छोड़ा और कहा- तो फिर तोताराम, हमारे इन वैज्ञानिकों को नोबल पुरस्कार क्यों नहीं मिलता ?

तोताराम ने कहा- अरे, हम ज्ञान के पुजारी हैं । न तो हम किसी पुरस्कार के पीछे भागते हैं और न ही पेटेंट लेकर किसी आविष्कार से पैसे कमाना चाहते हैं । हम तो सर्वजन-हिताय काम करते हैं ।

अब आप ही बताइए कि ऐसे ज्ञानी और तार्किक व्यक्ति से कोई कैसे जीत सकता है ? वैसे हम भी जीत कर तोताराम का मुँह बंद नहीं करना चाहते ।

१९-१-२०१२


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Dec 27, 2011

तोताराम और विज्ञान


तोताराम और हमारा विज्ञान से संबंध कुछ वैसा ही रहा जैसा कि मायावती और ब्राह्मणों का या कुत्ते और ईंट का या अबदुल्ला और राम मंदिर का या करुणानिधि और रामसेतु का ।

पहले आठवीं के बाद ही वैकल्पिक विषय शुरु हो जाते थे । हम दोनों ने ही गणित के डर से नवीं में साइंस नहीं ली, कोमर्स ली । किसी तरह पास होने लायक नंबर आ गए । उसी दौरान पता चला कि हम दोनों की ही बेलेंस शीट के दोनों तरफ से टोटल नहीं मिलते थे हालाँकि गुरु जी ने बता दिया था कि ऐसी स्थिति में सस्पेंस अकाउंट खोल देना । पढ़ाई में तो ठीक है मगर यदि वास्तव में ही कहीं नौकरी करते हुए ऐसा किया तो जेल तक हो सकती है । हम दोनों ने ही आर्ट्स में जाना ठीक समझा । वहाँ बड़ी सुविधा है कि हिंदी में भीम में दस हजार की जगह नौ हजार हाथियों का बल लिखने पर एक दो नंबर कटने से अधिक कुछ खतरा नहीं, या दोहे में चौबीस की जगह तीस मात्राएँ लिखने पर भी कोई फाँसी लगने वाली नहीं थी । सो इस तरह से हिंदी ने हमारा या हमने हिन्दी का उद्धार किया ।

आजकल विज्ञान का युग है । होता तो पहले भी था मगर आज उसके अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता फिर भले ही उस विज्ञान को पढ़ने वाला डाक्टर किसी को कमीशन के लालच में घटिया दवाएँ ही क्यों न लिख दे या इंजीनीयर उद्घाटन से पहले ही गिर जाने वाला पुल ही क्यों न बनाए । आज कोई भाषा और साहित्य की बात नहीं करता । संवेदना तो खैर, एक प्रगति विरोधी गुण मान ही लिया गया है ।

सो हम भी लोगों की देखादेखी विज्ञान शिक्षा के गिरते स्तर के लिए चिंतिति थे । तभी तोताराम आ गया । हमने कहा- तोताराम आजकल विज्ञान का स्तर बहुत गिर गया है । लोग केवल डिग्री लेने के लिए और फिर नौकरी पाने के लिए विज्ञान पढ़ते हैं इसीलिए हमारे यहाँ दूसरे देशों की तरह कोई खोज और आविष्कार नहीं होते ।

तोताराम ने अपना मौलिक तर्क दिया । इसका एक कारण तो यह है कि स्कूलों में विज्ञान की प्रयोगशालाएँ होती हैं । इससे भी विज्ञान का स्तर गिर रहा है । हमारे लिए यह एक नया ही तर्क था । हमने कहा- विज्ञान का तो आधार ही प्रयोग है । यदि बच्चा प्रयोग नहीं करेगा तो विज्ञान को समझेगा कैसे ? और नंबर भी कैसे मिलेंगे ।

वह कहने लगा- नंबरों के लिए तो विज्ञान के टीचर से ट्यूशन पढ़ना ज़रूरी है । यदि बच्चा ट्यूशन पढ़ता है तो टीचर अच्छे नंबर दिलवा ही देगा । और फिर प्रयोगशालाएँ दिखाने के लिए होती हैं या फिर उसके उपकरणों की खरीद में पैसा खाने के लिए होती हैं । उनका विज्ञान से कोई संबंध नहीं होता ।


यह फिर आश्चर्य में डालने वाली स्थापना । हमारे आग्रह किए बिना ही तोताराम ने बताया कि दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक हुआ है आइंस्टाइन जिसने कभी प्रयोगशाला का मुँह नहीं देखा । और न्यूटन के लोग गुण गा रहे हैं उसके भी बहुत से सिद्धांत झूठे सिद्ध हो चुके हैं । मैंने कहीं पढ़ा है कि न्यूटन ने कहा था कि यदि किसी कारण से अचानक सूर्य समाप्त हो जाए तो उसी क्षण पृथ्वी अपने परिक्रमा मार्ग से विचलित हो जाएगी मगर आइंस्टाइन ने सिद्ध कर दिया कि नहीं, पृथ्वी को अपने मार्ग से विचलित होने में आठ मिनट लगेंगे क्योंकि सूर्य का प्रकाश भी पृथ्वी तक आठ मिनट में पहुँचता है और इससे तीव्र कोई प्रभाव नहीं हो सकता । अर्थात न्यूटन गलत । और सुन, न्यूटन ने पेड़ के नीचे अपनी प्रयोगशाला में सेब को ज़मीन पर गिरते हुए देखकर गुरुत्त्वाकर्षण का जो सिद्धांत दिया था वह भी झूठा सिद्ध हो गया है ।

अब तो हमारे आश्चर्य की सीमा नहीं रही । हमने कहा- हमने ऐसा कहीं नहीं पढ़ा । यह तो सर्वमान्य और सर्वसिद्ध सिद्धांत है । तोताराम ने कहा- यदि गुरुत्त्वाकर्षण के सिद्धांत को गलत सिद्ध कर दिया तो क्या देगा । हमने कहा- और तो क्या बताएँ मगर आज चाय के साथ पकौड़ी और गज़क भी खिलाएँगे ।

तो तोताराम ने कहा- देख, दिल्ली से जो साधन हमारे तक आने के लिए टपकते हैं वे हमारे तक न आकर बीच में ही कहाँ अटक जाते हैं ? हमने कहा- वे तो बंधु, पंचों, सरपंचों, एम.एल.ए., एम.पी., अधिकारियों और व्यापारियों तक ही रह जाते हैं ।

तोताराम ने जोर से ताली बजाई- तो बस, हो गया ना सिद्ध कि ऊपर से गिरने वाली चीजें धरती तक नहीं आतीं क्योंकि गुरुत्त्वाकर्षण का सिद्धांत गलत है । वैसे और भी बहुत सी चीजें ऊपर की तरफ ही जाती हैं जैसे कि तेल लगाने वाला अपने से ऊपर वाले को तेल लगाता है या नीचे की ली हुई रिश्वत या कमीशन ऊपर और बहुत ऊपर तक जाता है ।

हमारे पास कोई उत्तर नहीं था सो हमें चाय के साथ पकौड़ी बनवानी पड़ीं और गज़क बाज़ार से मँगवानी क्योंकि गज़क घर में नहीं थी । हमें अपने शर्त न हारने का विश्वास था इसलिए वैसे ही ताव में आ गए थे । खैर!

२२-१२-२०११

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Aug 25, 2010

बिहार के वैज्ञानिक पेटेंट

लालू जी,
जय विज्ञान । वैसे तो यह नारा, नेहरू जी और शास्त्री जी के नारों 'आराम है हराम' और 'जय जवान, जय किसान' की तर्ज पर अटल जी ने दिया था मगर अधिक लोकप्रिय नहीं हो सका क्योंकि उन्होंने कविताएँ अधिक सुनाई, कोई वैज्ञानिक काम नहीं किया । कहने को कहा जा सकता है कि उन्होंने परमाणु परीक्षण करवाया पर वह बम तो कांग्रेस के समय में बन गया था । अटल जी ने तो केवन माचिस दिखाई थी । पर आप बहुत प्रेक्टिकल व्यक्ति हैं । बम भी खुद ही बनाएँगे और माचिस भी खुद ही लगाएँगे । इसलिए हमें विश्वास है कि विज्ञान की उन्नति अवश्य होगी । हमें तो उन्नति से मतलब है, इससे क्या कि नारा किसने दिया ।

लोग कह सकते हैं कि आप तो कला वर्ग के विद्यार्थी रहे हैं, विज्ञान के बारे में क्या जानें ? वे यह भूल जाते हैं कि विज्ञान वर्ग में कोई विज्ञान नहीं है । जितने भी विज्ञान है सारे कला वर्ग में ही हैं जैसे राजनीति विज्ञान, गृह विज्ञान, भाषा विज्ञान आदि । विज्ञान में कोई भी विज्ञान नहीं है, हैं तो क्या- फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलोजी आदि । वैसे भी आपकी रुचियों का विस्तार घास से आकाश तक है तो विज्ञान कैसे छूट जाएगा । अभी छः अगस्त को आपने कहा कि हमारे यहाँ नई दवाओं में शोध कार्य नहीं हो रहे हैं और गोमूत्र और स्वमूत्र का पेटेंट होना चाहिए ।

इस संबंध में हम आपको बताना चाहते हैं कि निराशा जैसी कोई बात नहीं है । दवा ही क्या और भी बहुत से क्षेत्र हैं जिनमें बड़े-बड़े आविष्कार हुए हैं । कई आविष्कारों में तो आपका भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है मगर आप भूल गए । आपका तो सिद्धांत है कि 'नेकी कर दरिया में डाल' । इसलिए आपकी जानकारी के लिए विगत दो दशकों में और विशेष रूप से बिहार में हुए अनुसंधानों से आपको अवगत कराना चाहते हैं ।

बिहार के पशु पालन विभाग के डाक्टरों ने एक भूख बढ़ाने वाली दवा का आविष्कार किया जिसके कारण एक मुर्गी एक दिन में आठ सौ रुपए का खाना खाने लगी । वैसे साधारण मुर्गी सारे दिन में रुपए-आठ आने का अनाज खाती होगी मगर दवा का प्रभाव ही कुछ ऐसा था । हमारे कई मित्र पूछते हैं कि आठ सौ रुपए में तो उस ज़माने में आठ किलो घी या तीन किलो बादाम आ जाते थे । क्या एक मुर्गी इतना खा सकती ? क्या तुम तीन किलो बादाम एक दिन में खा सकते हो ? उन अज्ञानियों को दवा की शक्ति का पता नहीं । मगर पेटेंट देने वाले विदेशी लोगों ने बदमशी की और बिहार की इस उपलब्धि को नज़रअंदाज कर दिया । जब कि उसका सारा रिकार्ड अभी भी फाइलों में मौजूद है । आप चाहें तो पेटेंट के लिए आगे बढ़ा सकते हैं ।

इसी तरह से उन्हीं दिनों में एक और उपलब्धि हासिल की गई थी कि एक स्कूटर चालक अपने स्कूटर पर चार भैंसों को पीछे बैठाकर हरियाणा से पटना तक ले गया । स्कूटर की क्षमता वृद्धि के लिए उस चालक को कोई भी पुरस्कार नहीं मिला और न ही उन भैंसों को बी.बी.ए. (बैचलर आफ बिजनेस मैनेजमेंट नहीं, भैंस बेलेंसिंग अवार्ड) दिया गया । आज तक ऐसा चमत्कार कहीं नहीं हुआ मगर बात मान्यता की है । बिना पेटेंट के ये उपलब्धियाँ भी इतिहास के गर्भ में समा जाएँगी ।

आप चाहें तो अब नीतीश जी कार्यकाल में भी कई नई उपलब्धियाँ हासिल हुईं हैं, जिन्हें कि पेटेंट की दरकार है । हमें विश्वास है कि आप पार्टी पोलिटिक्स से ऊपर उठ कर उन उपलब्धियों को भी मान्यता दिलवाएँगे । पहली उपलब्धि है नालंदा के एक प्राथमिक स्वास्थ्य की जिसमें एक महिला ने दो महीने में चार बार डिलीवरी हुई । भले ही दुनिया के सारे डाक्टर अपना माथा फोड़ें पर यह भी सच है । महिला का फोटो, डाक्टर का इलाज, कैशियर का रजिस्टर सब मौजूद हैं । क्या ये सब झूठ हो सकते हैं ? इस तकनीक का भी पेटेंट होना चाहिए । बहुत सी महिलाएँ हैं जिन्हें डाक्टरों की हजार कोशिशों के बावजूद एक भी बच्चा नहीं होता । बहुत से देश हैं जिनकी जनसंख्या घटती जा रही है । वे तो इस तकनीक को लपक कर लेंगे । देश मालामाल हो जाएगा पर पहले इसका पेटेंट तो हो । जल्दी की जानी चाहिए । पिछली बार कोसी नदी में आई बाढ़ के समय वक्त की नजाकत को देखते हुए राहत सामग्री पहुँचाने के लिए कुछ साहसी लोगों ने एक ऐसी तकनीक लगाईं कि एक स्कूटर पर ही ९२५० किलो राहत सामग्री लाद कर ले गए । कुछ लोग इसमें भी भ्रष्टाचार देखते हैं जब कि उस स्कूटर ड्राइवर और सम्बंधित अधिकारियों की, पीड़ित लोगो को राहत पहुँचाने की, ललक नहीं देखते । भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो वालों की हठधर्मिता और दादागीरी के चलते कहीं यह तकनीक दब न जाए उससे पहले ही पता किया जाना चाहिए कि स्कूटर की इतनी क्षमता बढ़ाने की वह तकनीक क्या थी । और फिर उसका पेटेंट करवा लिया जाना चाहिए ।

आपने अनुसन्धान करने और पेटेंट करवाने के संदर्भ में ही स्वमूत्र और गोमूत्र के पेटेंट की भी बात कही थी किन्तु वह एक महत्वपूर्ण और विस्तृत विषय है उसके बारे में भी हम आपसे चर्चा करना चाहेंगे मगर अभी नहीं । वह अगले पत्र में । तब तक आप इन पेटेंटों के बारे में कार्यवाही शुरू कर दें ।

२३-८-२०१०

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