Jan 6, 2013

मनमोहनजी और बँगले से खतरा

हर मन को मोहने वाले, हमारे प्रिय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी,
सत् श्री अकाल ।

हमने कोई बीस वर्ष हिंदी पढ़ी और फिर चालीस वर्ष तक बच्चों को हिंदी पढ़ाई । जो हमने झेला उससे दुगुना हमने बच्चों को झिला दिया । आजकल की बात अलग है । बच्चे और अध्यापक दोनों चतुर हो गए हैं सो पता ही नहीं लगता कि कौन किसको झेल रहा है और कौन किसको झिला रहा है । आजकल पता नहीं हिंदी में बच्चों से किस तरह के लेख लिखवाए जाते हैं ? जब हम पढ़ते थे तो कई तरह के निबंध लिखवाए जाते थे जिनमें कुछ ऐसे भी होते थे – ‘मेरा प्रिय कवि’ या ‘मेरा प्रिय लेखक’ आदि । इसके बाद हमने नवें दशक में इसी शृंखला के और भी निबंध लिखवाए जैसे - 'मेरा प्रिय प्रधानमंत्री' । हमारे विद्यार्थी-काल में ऐसे निबंध नहीं हुआ करते थे क्योंकि ले देकर एक ही तो प्रधानमंत्री थे- नेहरू जी । भले ही किसी को प्रिय लगो या अप्रिय ।

अब आपने आकर थोड़ा स्थायित्व प्रदान किया है अन्यथा तो एक ज़माना था जब कभी भी प्रधानमंत्री बदल जाया करते थे । देवेगौड़ा, चरणसिंह, चंद्रशेखर और गुजराल साहब का क्या प्रधानमंत्री बनना और क्या न बनना । हाँ, सरकारी बँगले के उम्मीदवार ज़रूर बढ़ गए । वैसे यदि तिबारा चांस नहीं मिलता तो अटल जी भी इसी श्रेणी में धरे रखे ही थे । तो इस प्रकार गिनती तो बढ़ ही गई । और 'मेरा प्रिय प्रधानमंत्री ' निबंध लिखने वालों को चयन का अवसर मिल गया । सुविधा भी बढ़ गई । चरणसिंह जी को चुन लो या चंद्रशेखर जी या फिर गुजराल साहब या देवेगौड़ा जी - सबकी प्रधानमंत्री के रूप में प्रियता का समय कम होने से सिलेबस भी कम हो गया ।

खैर, अब आपके होते हुए दूर-दूर तक कोई विकल्प नज़र ही नहीं आता । नई सदी में प्रिय या अप्रिय आप ही हो । कई बार लगा कि इस या उस मुद्दे पर अब गए और तब गए, लेकिन साहब मान गई दुनिया कि ‘पीसा की झूलती मीनारें’ भी इतना सस्पेंस पैदा नहीं करती जितना आपको लेकर मचा । लेकिन अब लोगों को विश्वास हो गया है कि भले ही पीसा की मीनारें गिर जाएँ लेकिन भगवान कि दया से या इस देश के सौभाग्य से आपका हिलना और गिरना दोनों ही संभव नहीं लगता । भले ही अडवाणी जी या मुलायम या मायावती कोई भी आशा लगाए लेकिन हमें उनकी मुरादें पूरी होती नहीं लगतीं क्योंकि आप जैसा काबिल और देश का हितचिन्तक प्रधानमंत्री इस देश को मिलने से रहा । किसी न किसी प्रकार आपने देश का हित करके ही छोड़ा, चाहे कोई भी जोड़-तोड़ करके बहुमत जुटाना पड़ा । मुँह न देखने लायक के पाँव देखे, देश के हित के सामने अपने मान-सम्मान की चिंता भी नहीं की, जाने किस-किस के ताने सहे मगर देश का हित करके ही छोड़ा फिर चाहे परमाणु समझौता हो या वालमार्ट के लिए पलकें बिछाना । देश के हित के लिए यह कोई छोटा काम नहीं है । कोई और होता तो इतनी आलोचना के बाद कब का भाग लेता ।

सो हमारे प्रिय प्रधानमंत्री तो आप ही हैं भले ही ब्रिटेन वाले आपको किसी का गुड्डा कहें या अमरीका वाले अंडर-अचीवर । हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता । हम तो जिसके भी होते हैं अंध-भक्त होते है, सच्चे श्रद्धालु होते हैं आपकी तरह ।

आजकल हमारे राजस्थान में भयंकर सर्दी पड़ रही है । वैसे हमारा मानना है कि आजकल के मुकाबले सर्दी पहले अधिक पड़ती थी । आजकल तो प्रदूषणजनित ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण फिर भी ठण्ड काफ़ी कम हो गई है फिर भी बड़े तो बड़े बच्चों तक को घर में बने हुए लेटरिन में जाते हुए भी ठण्ड लगती है । एक हमारा समय था जब आठ बजे तक सूरज के दर्शन नहीं होते थे । बच्चे सुबह होते ही पानी का लोटा लेकर जंगल-दिशा के लिए चल पड़ते थे । उस समय जयराम रमेश जी वाले विभाग को इसी नाम से जाना जाता था । लोटा एक और बच्चे चार-पाँच । हालाँकि राजस्थान में पानी की कमी है लेकिन इतनी भी नहीं कि जलाभाव में चार बच्चे एक ही लोटा पानी से काम चलाएँ । यह तो ठण्ड में लोटा पकड़े रहने की पीड़ा का सभी उम्मीदवारों में सामान वितरण के लिए किया जाता था ।

खैर जी, हम भी क्या फालतू ज़िक्र लेकर बैठ गए । आपको कहाँ फुर्सत है ऐसी छोटी-मोटी बातों पर ध्यान देने की । आपके सामने तो और बड़ी-सदी समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं । अब चुनाव में दिन ही कितने रह गए हैं । भले ही मौत का पता नहीं चले लेकिन कुर्सी पर बैठा आदमी पूरे पाँच बरस तक अपने संभावित पतन के बारे में ही चौबीसों घंटे सोच-सोचकर जागता और पैसे जोड़ता रहता है । लेकिन आपकी बात ही और है । आप तो इस मामले में सच्चे निस्पृह संत हैं । न हार आपकी और न जीत आपकी । फ़िक्र तो उनको होनी चाहिए जो आपको मनोनीत करते हैं । चुनाव का झंझट तो आपने कभी पाला ही नहीं । चुनाव लड़ाने वालों को भी एक बार आपको दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़वाने के बाद समझ में आ गया कि अपन कितने लोकप्रिय हैं ।

तो भाई साहब, बात हो रही थी ठण्ड की । जिनके पास ठण्ड से बचने की सुविधा होती है जैसे एयरकंडीशनिंग या फिर सर्दी में खाने को गिज़ा या फिर दारू, वे जानबूझकर बार-बार ठण्ड की अधिकता की चर्चा करते हैं । हमारे पास तो ले दे कर एक बीस साल पुराना, दिल्ली के रीगल सिनेमा के पास रेड़ी लगाने वाले से ख़रीदा हुआ, सेकण्ड-हैंड कोट है । अब तो न उस कोट में गरमी बची और न हमारे सत्तर साल पुराने इस अस्थिपंजर में । इसलिए अपनी हीन भावना को छुपाने के लिए, यदि कोई कहता भी है कि आज सर्दी बहुत है तो हम अकड़ कर उसका विरोध करते हुए कहते हैं- नहीं ,कोई खास नहीं । कुछ खाया-पिया करो । जब कि हम खुद अपनी हालत जानते हैं कि दारू तो दूर, दवा तक के लिए भी कंजूसी करते हैं । आपको तो खैर, भगवान की दया से सभी सुविधाएँ हैं- गिज़ा भी, दवा भी और दारू भी । और फिर ठण्ड तो हम जैसे जमना-जल में खड़े ब्राह्मण को लगेगी, महलों में तो सारे मौसम आशिकाना होते हैं । ये राजभवन भी बड़ी अजीब शै हैं । इनमें घुसते ही पचासी बरस का बूढ़ा भी फुदकने लगता है । आप तो फिर भी हमारी तरह अस्सी से कम ही हैं । वैसे हम तो आपकी तटस्थता और सादगी के कायल हैं ।

तो साहब, हम ठण्ड से बचने के लिए रजाई में घुसे बैठे थे । घर से बाहर निकल कर कहाँ जाएँ । घूमना-फिरना तो उसको सूझता है जिसकी जेब में माल हो-

इशक करे ऊ जिसकी जेब में माल वाह रे बलमू ।
कदर गँवाए जो कड़का कंगाल वाह रे बलमू ॥

सो हमने बाज़ार तो दूर, बिना बात घर से निकलना तक छोड़ दिया है । दोपहर का समय, लेकिन हम रजाई में घुसे-घुसे भी ठिठुर रहे थे । पोती के पास कम्प्यूटर है और वह उस पर कभी-कभी समाचार भी देख लिया करती है । सो पता नहीं क्या पढ़ लिया कि दौड़ी-दौड़ी हमारे पास आई और कहने लगी- बाबा, मनमोहन सिंह जी की रक्षा कीजिए । उसे पता नहीं, जो आदमी ज़रा सी सर्दी से अपनी रक्षा नहीं कर सकता, बढ़ती महँगाई से अपने घर की अर्थव्यवस्था की रक्षा नहीं कर सकता, जो सब्सिडी के छः सिलेंडरों में एक साल खाना नहीं बना सकता - वह किसी की क्या रक्षा कर सकता है ।

फिर भी सुनते ही हमें इस भयंकर सर्दी में भी पसीना आ गया और बच्ची की हिम्मत बढ़ाने के लिए कहा- कहो बेटी, उन पर क्या संकट है ? यदि आँख में कोई खराबी है तो हम अपनी आँख देने को तैयार हैं ।

बच्ची भी कोई कम नहीं । कहने लगी- बाबा, आपकी आँखें लेकर मनमोहन सिंह जी क्या करेंगे ? क्या आपको देश का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है ? जब देखो तब महँगाई, बेकारी, बीमारी, कुपोषण, महिलाओं की असुरक्षा, धर्म जाति के आधार पर भेदभाव, विदेशी अपसंस्कृति - जाने किस- किस का रोना लेकर बैठे रहते हो । सभी समस्याओं के बावज़ूद मनमोहन जी को देश का जो उज्ज्वल भविष्य नज़र आ रहा है, वह आपकी आँखों से तो नज़र आने से रहा । आपकी आँखे लेकर क्या करेंगे ? न आपके गुर्दे इतने मज़बूत कि बिना स्पष्ट बहुमत के परमाणु समझौता और एफ.डी.आई. पास करवा लें । अभी तो उन्हें जाने कितने कठिन कदम उठाने हैं देश के लिए । आपका कोई भी अंग उनके काम का नहीं है । और फिर क्या वे आपके अंगों के भरोसे देश को चला रहे हैं ? इस पिछड़े देश को विकास की सही दिशा दिखाने के लिए आँखें, और कठोर निर्णय लेने के लिए मजबूत गुर्दे देने के लिए वर्ल्ड बैंक, विश्व व्यापार संगठन, डंकल-बुश-ओबामा जाने कौन-कौन तैयार बैठे हैं । वैसे भगवान की दया से उनके सभी अंग-प्रत्यंग ठीक हैं और फिर यदि कोई खराबी-शराबी होगी तो अमरीका कौन दूर है ? जाएँगे और करवा आएँगे ओवरहालिंग । आप बिना बात मुझे असली बात से भटकाओ मत और ध्यान से सुनो । उनको न तो कोई शारीरिक खतरा है और मानसिक । न किसी आतंकवादी से और न महँगाई और बेकारी से । भगवान की दया से सारी बेटियाँ ब्याह दीं । कमा-खा रही हैं; अपने घर में खुश हैं ।
उन्हें खतरा तो अपने बँगले से है ।

फिर हमारा दिमाग अपने हिसाब से सक्रिय हो गया और पूछा- क्या उनका बंगला टपकता है, क्या वहाँ अपनी गली की तरह बरसात में पानी भरता है, क्या उनके घर के पास स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मोबाइल का टावर लगा हुआ जो उनके हार्ट के लिए खतरनाक हो सकता है , क्या किसी भू-माफिया ने उनके घर पर कब्ज़ा करने का मन बना लिया है , क्या उनके घर में पानी नहीं आता या फिर नए मीटर के कारण बिजली का बिल ज्यादा आता है ? या उनके घर में किसी भूत-प्रेत का प्रकोप है ?

बच्ची जोर से हँस पड़ी और कहने लगी- जूते बनाने वाले की पहुँच कहाँ तक होगी ? वह जूतों से ही आदमी मापता है । अब आप कुछ मत सोचो और कुछ मत बोलो और सुनो- मनमोहन जी का बंगला इतना पुराना हो चुका है कि कभी भी गिर सकता है ।

हमने कहा- तो क्या बात है ? जैसे हम लोग कोई प्राकृतिक आपदा आने पर किसी सरकारी इमारत, स्कूल, धर्मशाला आदि में शरण ले लेते हैं तो वे भी कुछ दिन के लिए राष्ट्रपति भवन में शरण ले लें । और शरण क्या, स्थाई रूप से भी वहाँ रह सकते हैं । तीन सौ कमरे हैं । प्रणव दा क्या तीन सौ कमरों में रहते हैं ? चाहे तो मनमोहन जी ही क्या सारा मंत्रिमंडल राष्ट्रपति भवन में रह सकता है । मंत्रियों के सारे बँगले दिल्ली के प्रोपर्टी डीलरों को नीलाम कर दें । वैसे भी सरकार अच्छे-भले सरकारी उपक्रमों को धूल के भाव निजी क्षेत्रों को बेच ही रही है । वैसे तुमने यह तो बताया ही नहीं कि १९३० में बने अंग्रेजों के बनवाए बँगले अस्सी साल में ही गिरने कैसे लग गए ? यदि आजकल की पी.डब्लू.डी. वालों ने बनाए होते या मनरेगा में बने होते तो बात और थी ।

बच्ची ने कारण बताया कि ये मकान केवल चूने और ईंटों से बने हैं, इनमें स्टील का उपयोग नहीं हुआ है इसलिए इनके गिरने का समय आ गया है । हमने फिर प्रतिवाद किया- अरे, चूने से बनी क़ुतुबमीनार को तो कुछ नहीं हुआ, बिना स्टील के कंस का किला, बनारस का विश्वनाथ मंदिर, वृहदेश्वर का मंदिर, मीनाक्षी मंदिर सभी खड़े हैं । हमें तो लगता है कि ये पी.डब्लू. डी. वाले डरा कर पहले तो इन मकानों को गिरवाने में पैसे कमाएँगे और फिर बनवाने में । इनका क्या, ये चाहें तो कागज पर मकान बना दें, कागज पर कुएँ खुदवा दें और फिर पानी न निकलने पर भरवा दें और दोनों कामों के पैसे खा जाएँ जैसे कि मंत्री जी अपने एन.जी.ओ. में हवाई विकलांगों को व्हील चेयर बँटवा दें । इनकी किसी राय को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ।

बच्ची ने कहा- नहीं बाबा, ये लोग तो बेचारे बहुत ईमानदार हैं । एक इंजीनीयर ने तो यहाँ तक कहा है कि यह तो पी.डब्लू. डी. वालों की समय-समय पर की गई मरम्मत का चमत्कार है कि ये इतने दिन भी चल गए वरना तो इन्हें कभी का गिर जाना चाहिए था ।

अब हमने कहा- बेटा, अब हम तुम्हें कैसे समझाएँ कि पी.डब्लू.डी., एम.ई.एस., कस्टम-एक्साइज, पुलिस और इनकम टेक्स विभाग को कमाऊ विभाग क्यों कहा जाता है । बस, यह समझ लो कि मिस्र के पिरामिड यदि इन्होंने बनाए होते तो कब के ढेर हो गए होते या साँची और सारनाथ के स्तूपों का ठेका इन्होंने लिया होता तो जाने कितने भिक्षु दब कर मर गए होते ।

पर खैर, कोई बात नहीं । हम और तो कुछ कर नहीं सकते । तू इनको लिख दे कि यदि और कोई व्यवस्था नहीं हो तब तक अपने यहाँ आ जाएँ । पास में कृषिमंडी का हेलीपेड है । रोजाना सरकारी हेलीकोप्टर से अप-डाउन कर लेंगे । कौन सा अपनी कार और अपना पेट्रोल लगाना है । वैसे कुछ भगवान पर भी विश्वास करना चाहिए । ‘जाको राखे साइयां मार सके ना कोय’ और फिर जिसकी मौत आ ही गई उसे कोई बचा भी नहीं सकता । चारपाई से गिर कर भी आदमी मर सकता है और प्रह्लाद भक्त की तरह पहाड़ पर से लुढ़काया जाकर भी बच जाता है । अरे, और कुछ नहीं तो बिजली ही गिर पड़े उसे कौन कमांडो और सिक्योरिटी रोक लेगी । राजा परीक्षित को तो फल में से निकल कर एक कीड़े ने काट लिया था । और फिर रहीम जी ने भी कहा है-

रहिमन बहु भेषज करत ब्याधि न छांडत साथ ।
खग मृग बसत अरोग बन हरि अनाथ के नाथ ॥

बच्ची भी हिंदी पढ़ती है । उसने भी व्यंजना निकाली- कहने लगी । यही तो समस्या है । वे अनाथ भी तो नहीं कि भगवान उनकी जिम्मेदारी लें । वे तो पहले से ही ‘भारत माता’ की शरण में हैं ।

हमने कहा- तो फिर हम क्यों उनकी फ़िक्र करें । जिसने प्रधानमंत्री बनाया है वही उनकी रक्षा भी करेगा । हमारे पास तो जो विकल्प थे सो तुम्हें बता दिए । और हम फिर रजाई में घुस गए ।

तो भाईजान, हमारा तो यही लिखना है कि आप हमारे भरोसे नहीं रहें ।
जै राम जी की ।

05-01-2013

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Dec 7, 2012

एफ डी.आई. स्तुति - आओ मल्टीनेशनल आओ


मित्रो,
१९९६ में लिखित और १९९८ में मेरे संकलन 'राम धुन' में प्रकाशित 'मल्टीनेशनल-स्तुति' आपकी सेवा में प्रस्तुत है । आज के सन्दर्भ में चाहें तो आप इसे 'एफ डी.आई.-स्तुति' या जो भी नाम आपको पसंद हो, से पढ़ सकते हैं और अपने और देश के दुर्भाग्य पर हँस, चिढ़ या रो सकते हैं ।

मल्टीनेशनल-स्तुति
( बतर्ज़ : 'झंडा ऊँचा रहे हमारा' )

आओ मल्टीनेशनल आओ ।
भारत के सिर पर चढ़ जाओ ॥

आप पाँच सौ प्रतिशत खाओ
दस परसेंट हमें दिलवाओ
यहाँ हमें कुछ नहीं चाहिए
अपने वहीं जमा करवाओ ।

आओ मल्टीनेशनल आओ..

हमें राष्ट्र अभिमान नहीं है
इज्ज़त का कुछ ध्यान नहीं है
देश हमारा मोटी मुर्गी
हम भी खाएँ, तुम भी खाओ ।

आओ मल्टीनेशनल आओ...

बड़े-बड़े उद्योग लगाओ
भुजिया औ' चटनी बनवाओ
नहीं मुनाफे की कुछ चिंता
काउंटर गारंटी पाओ ।

आओ मल्टीनेशनल आओ ।
भारत के सिर पर चढ़ जाओ ॥


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Nov 24, 2012

भाई साहब का भटकना


तोताराम से सत्संग हुए कोई छः महिने हो गए । हालाँकि ऐसा नहीं है कि यह दुनिया स्वर्ग हो गई है और इसमें निन्दा-स्तुति के योग्य कुछ नहीं बचा । हाँ, यह बात ज़रूर है कि क्या देश और क्या दुनिया हालत यह हो गई है कि 'पंचों का कहना सिर माथे लेकिन पतनाला वहीं गिरेगा' । और जब ससुर पतनाले को वहीं गिरना है तो काहे को मगजपच्ची करें । मगर जैसे सरकार कुपोषित जनता का भी तेल निकाल सकती है तो तोताराम बात करने के लिए कुछ न कुछ निकाल ही लेता है । बस, कारण रहा कि हम छः महिने से अमरीका गए हुए थे । आजकल भले ही आदमी को पूरी रोटी और शुद्ध पानी नहीं मिल रहे हों लेकिन संचार के इतने साधन हो गए हैं कि कहीं भी बैठकर दुनिया से संपर्क बनाए रखा जा सकता है मगर जो बात आमने-सामने मिलकर होती है, जो आनंद गले मिलकर आता है वह आनंन्द फोन और मेसेज या स्काइप में कहाँ? यदि टी.वी. पर मिठाइयाँ और फल देखकर ही तृप्ति हो जाती तो फिर बात ही क्या थी? सो पिछले छः महिने से तोताराम से कभी कभार बातें तो होती रहीं, अखबार भी इंटरनेट पर पढ़ते रहे लेकिन वह बात कहाँ? मेले का समाचार देख-सुनकर वह मज़ा कैसे आ सकता है जो वहाँ जाकर भीड़ में धक्के खाने या भगदड़ में हाथ-पैर तुड़वाकर आता है ।

तो साहब, आज तोताराम पधारे । जैसा कि आप जानते हैं पिछले पचास वर्षों से, जब भी वे या हम गाँव में मौजूद रहे, चाय और अखबार का सेवन उन्होंने हमारे यहीं करके हमें कृतार्थ किया । आज आशा के विपरीत वे अखबार अपने साथ लाए और एक नहीं दो-दो - एक हिंदी का और एक अंग्रेजी का ।

हमारे सामने अखबार पटकते हुए बोला- मास्टर, भाभी से कह सोनिया जी को फ़ोन लगाने की कोशिश करे, तब तक मेरी बात ध्यान से सुन- अपने भाई साहब मनमोहन सिंह जी किसी एसीअन (ASEAN) की मीटिंग में भाग लेने गए थे । अब यह क्या मीटिंग है और जगह कहाँ है मुझे तो पता नहीं? हिंदी वाले अखबार में जगह का नाम 'नोम पेन्ह' लिखा है और अंग्रेजी वाले 'फ्नोम पेन्ह' लिखा है ।

हमने उसे समझाया कि यह कोई मीटिंग है जिसमें दक्षिण एशिया के कोई दसेक देश भाग लेंगें और अमरीका न तो एशिया में है और न ही दक्षिण में लेकिन वह भी भाग लेता है क्योंकि अमरीका के बिना न तो कहीं लोकतंत्र हो सकता है और न ही व्यापार । और यह ‘नोम पेन्ह’ और ‘फ्नोम पेन्ह’ एक ही है । यह कोई अपनी लिपि देवनागरी तो है नहीं कि जो लिखो सो पढ़ो । यह तो रोमन लिपि है जिसमें कोई भी ध्वनि, कभी भी, समझदार नेता की तरह साइलेंट मोड़ में चली जाती है । मगर इसमें सोनिया जी को फ़ोन लगाने की क्या बात है? वे तो वैसे भी संसद के अधिवेशन की तैयारी में व्यस्त होंगीं । और फिर मनमोहन जी कोई बच्चे थोड़े ही हैं जो रास्ता भूल जाएँगे? आ जाएँगे ।




तोताराम हमारे सामने २० नवंबर २०१२ के हिंदी और अंग्रेजी के दोनों अखबार रखते हुए बोला- समझने की कोशिश कर । देख, इस सम्मलेन में दस देश भाग लेने वाले हैं । हिंदी के अखबार में अपने भाई साहब मनमोहन जी चीनी नेता के साथ खड़े हैं और लिखा है- गहरे दोस्त जैसे मिले मन-वेन । अंग्रेजी वाले अखबार में भाई साहब अपने चिर परिचित जोधपुरी सूट या कुर्ता-पायजामा और जेकेट की बजाय एक सस्ती सी चमकीली सी लाल रंग की बुशशर्ट पहने सावधान की मुद्रा में सहमे हुए से जुलिया गिलार्ड के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं । फोटो भाई साहब की ही है क्योंकि इतना शालीन और कोई हो ही नहीं सकता । और, किसी अन्य के फोटो के साथ भाई साहब का सिर चिपका कर ट्रिक करने की हिमाकत कोई भारतीय अखबार नहीं कर सकता क्योंकि तू जानता है कि यहाँ तो किसी नेता की शव-यात्रा से लगे जाम से परेशान होकर यदि कोई फेस बुक पर भी कुछ लिख दे तो पुलिस पकड़ लेती है । अंग्रेजी के इसी अखबार में एक पेज पर ओबामा की के साथ हाथों को दाएँ-बाएँ करके पकड़े हुए एक चेन सी बनाते हुए चार नेताओं का फोटो है लेकिन उसमें चीनी नेता, अपने भाई साहब और आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री जूलिया गिलार्ड तीनों ही नहीं हैं । मेरा तो कलेजा मुँह को आ रहा है । बेचारे झिक-झिक से पीछा छुड़ाकर दो दिन कहीं घूमने गए थे और पता नहीं कहाँ पहुँच गए?

पत्नी ने बताया कि फ़ोन नहीं मिल रहा है और कोई बोल रही है कि जिस नंबर से आप बात करना चाहते हैं वह अभी व्यस्त है । कृपया होल्ड रखें या थोड़ी देर बाद फिर कोशिश करें । इसके बाद कई बार कोशिश की लेकिन बात नहीं हो सकी ।

तोताराम ने निराश होकर कहा- ठीक है मास्टर, चलता हूँ । वैसे सारी बात का पता चल जाता तो तसल्ली हो जाती । मुझे तो लगता है भाई साहब कहीं और तो नहीं चले गए हैं । भले आदमी हैं । बेचारे किसी से कुछ नहीं कहते फिर भी लोग हैं कि जीने ही नहीं देते । लोगों में ज़रा भी रहम नहीं है । एक तो बेचारे अस्सी साल के होने को आ रहे हैं ऊपर से हार्ट के मेज़र ऑपरेशन करवाए हुए तिस पर पौरुष-ग्रंथि अलग निकलवा चुके हैं । कभी किसी चुनाव के चक्कर में नहीं पड़े । भटकते-भटकते हुए दिल्ली पहुँचे तो लोगों ने ज़बरदस्ती पकड़ कर प्रधान मंत्री बना दिया । अब न कोई दूसरा मिले और न इनका पीछा छूटे ।

हमने तोताराम को तसल्ली दी- चिंता मत कर । भाई साहब दुनिया घूमे हैं । दिल्ली विश्वविद्यालय और रिज़र्व बैंक ही क्या, वर्ल्ड बैंक तक चक्कर लगा चुके हैं । कहीं नहीं खोएँगे । लौट आएँगे एक दो दिन में । और फिर चुप रहने मात्र से ही क्या कोई कमजोर हो जाता है? अरे, चुप रहने वाले ज्यादा शक्तिशाली होते हैं । कहा भी है- ‘थोथा चना बाजे घना’ या ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ । अपने भाई साहब चुप रहकर भी वह कर गुजरते हैं जो बड़े-बड़े गरजने वाले नहीं कर पाए । दस साल पहले अपनी पेंशन चार हजार रुपए थी और आज पन्द्रह हजार है पर क्या तुझे पता चला कि कब भाई साहब ने अपने रुपए की क्रय शक्ति उस चार हजार से भी कम कर दी या कब बीस साल में रुपया डालर के मुकाबले एक तिहाई रह गया या कब पेट्रोल, गैस, घी, फल और सब्जियाँ लोगों की पहुँच से बाहर हो गए? किस दिन २५ रुपए वाला स्पीड-पोस्ट चुपचाप ४० रुपए का हो गया? चिंता मत कर ऐसा ही कोई महान काम करके लौटेंगे अपने भाई साहब ।

तोताराम चला गया लेकिन अगले ही दिन फिर लौट आया । बहुत खुश था और हमारे सामने २१ नवंबर का अखबार रखते हुए बोला- मिल गए भाई साहब । देख, जोधपुरी सूट में ओबामा से हाथ मिलाते अपने भाई साहब । वही बाल-सुलभ सकुचाई सी मुस्कान और वही गद्गद् भाव । और तो और इसी दौरे में जापान के प्रधान मंत्री से २.२६ अरब डालर का कर्ज़ा कबाड़ लिया सो अलग ।


हमने कहा- ठीक है मिल गए भाई साहब । लेकिन क़र्ज़ लेने में खुश होने की क्या बात है? साठ बरस हो गए कभी दो पैसे बचाकर किसी को क़र्ज़ देने लायक भी तो बनो । जापान १९४५ में ध्वस्त हो गया था और तुम १९४७ में आज़ाद हुए थे । एक प्रकार से दोनों ने एक साथ ही शुरुआत की लेकिन अब देख कहाँ जापान और कहाँ हम?

तोताराम कहाँ हार मानने वाला था, बोला- अरे कर्ज भी तो उन्हें ही मिलता है जिनकी कोई साख होती है । बता क्या किसी बैंक ने तुझे बेटी की पढ़ाई के लिए लोन दिया? और फिर इन्हें कौन हजार बरस जीना है । अभी तो 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्'; बाद की बाद में आने वाली पीढ़ी जाने ।

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Nov 3, 2012

थरूर थ्रिल्लर बनाम गर्ल फ्रेंड की कीमत


अब वह पहले वाली बात कहाँ रही जब चीजें अमूल्य हुआ करती थीं । मीरा जैसे प्रेम करने वाले बिना मोल बिका करते थे- 'मैं तो गिरधर हाथ बिकानी' । बिकीं, मगर ५० करोड़ का प्राइस टैग लगाकर नहीं, बल्कि बिन मोल; तभी तो वह गोविन्द को अमोलक मोल में खरीद सकती थी- 'माई री मैं तो लियो गोविन्दो मोल । कोई कहे महँगो कोई कहे सस्तो, लियो री अमोलक मोल' । लोग दाम के लिए नहीं बल्कि बात के लिए मरा करते थे ।

यदि मीरा दाम के लिए बिकती तो पूरी संभावना थी कि उसे उसका देवर बनबीर खरीद लेता । आज जब सांसद और यहाँ तक कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी बिकाऊ हैं तो बेचारी गर्ल फ्रेंड की क्या औकात ? सुनते हैं कि एक ब्राजीलियन लड़की ने अपना कौमार्य कुछ करोड़ में नीलाम किया और गर्व की बात है कि बोली लगाने वालों में भारत का भी एक सपूत था । और मज़े की बात यह है कि वह लकड़ी उस पैसे से कोई समाज सेवा का काम करेगी मतलब कि स्वयंसेवक भी निःशुल्क नहीं मिलते ।



खैर, तो बात गर्ल फ्रेंड की कीमत की । ठीक है, समय रहते अपनी कुछ कीमत ले ले अन्यथा पालक की सब्जी की तरह शाम को मुरझाकर मंडी में घूमने वाले सांडों के आगे फिंकना है या किसी होटल वाले के हाथ धूल के भाव बिकना है । गर्ल फ्रेंड की भी अपनी परिस्थिति होती है । ज्यादा भाव खाने से उस फिल्मी हीरोइन की सी हालत होती है जो फ़िल्में मिलते रहने पर शादी के बारे में सोचती नहीं और जब सोचती है तो उसके साथी दादा बन चुके होते हैं फिर तो कोई सेकण्ड या थर्ड हैंड मिलता है । कभी-कभी गर्ल फ्रेंड चालाक होती है तो ५० करोड़ क्या, प्रेमी के कपड़े तक उतरवा देती है, जूते पड़वाना तो खैर, कोई बात ही नहीं । हमारे गाँव में एक बड़े सेठ के सुपुत्र थे । वे अपने को बड़ा प्रेमी मानते थे यह बात और है कि लोग उन्हें लम्पट कहते थे । उनके पिताजी ने आज से कोई सौ साल पहले करोड़ों रुपए के धर्मार्थ काम किए थे लेकिन पुत्र ऐसे प्रेमी निकले कि अपनी गर्ल फ्रेंड के चक्कर में अपनी सारी संपत्ति गँवा दी और अंतिम साँस कलकत्ता में अपनी ससुराल वालों के घर में ली ।

आजकल गर्ल फ्रेंड्स बैंक बेलेंस देखकर प्रेम करती हैं और जैसे ही बैंक बेलेंस खत्म हुआ कि कोई और सच्चा प्रेमी ढूँढ़ लेती हैं । एक चुटकला है- एक प्रेमी ने अपनी नई गर्ल फ्रेंड को बताया कि उसकी भूतपूर्व प्रेमिका अब उसकी चाची है क्योंकि उसने उसे कह दिया था कि उसका चाचा करोड़पति है और वह अपने चाचा का इकलौता वारिस है । एक मदिरा के मसीहा को कैलेण्डर के लिए फोटो खिंचवाने वाली लड़कियों ने ४९वीं सीढ़ी से ७९वीं सीढ़ी पर ला पटका । 

आज ही एक गर्ल फ्रेंड के बारे में सुना । एक कुँवारे ने उसकी कीमत ५० करोड़ बताई तो प्रेमी ने तत्काल प्रतिवाद किया- नहीं, मेरी प्रेमिका की कीमत ५० करोड़ से ज्यादा है । अब पचास करोड़ हो या सौ करोड़, चीज तो बिकाऊ ही हुई ना ? अब एक नायक या महानायक या कोई बादशाह किसी पार्टी में नाचने या किसी चीज का विज्ञापन करने के करोड़ों ले या अरबों, इससे क्या फर्क पड़ता है ? जब बात कीमत की है तो फिर कोई सोचना-विचारना ही क्या । एक व्यक्ति को जज ने किसी को थप्पड़ मारने के अपराध में पचास रुपए के जुर्माने की सज़ा सुनाई । अपराधी ने जज साहब से कहा- 'सर, मेरे पास पचास रुपए छुट्टे नहीं है । बस, यह सौ रुपए का नोट है, दो थप्पड़ का जुर्माना । रख लीजिए' । और इतना कहकर उसने फरियादी को एक थप्पड़ और मार दिया ।

आजकल के युवकों को शायद पता नहीं हो लेकिन आज से कोई साठ बरस पहले बीड़ी का विज्ञापन करने वाले आया करते थे । वे गाँव-गाँव घूमा करते थे । उनकी प्रायः चार आदमियों की टीम हुआ करती थी । जिनमें एक स्त्री वेश में नाचने वाला लड़का, एक हारमोनियम बजाने वाला, एक ढोलक वाला और एक उनका मैनेजर जो उस मज़मे में कमेंट्री करता था, बीड़ी के बण्डल बेचा करता था और सेम्पल की बीडियाँ बाँटता था । आजकल के नायकों, महानायकों या नायिकाओं का यही काम किसी स्टूडियो में या कहीं विदेशी लोकेशन पर होता है ।

यह बात मंडी नामक स्थान से आई है । वैसे मंडी कहीं भी हो सकती है । जहाँ भी बाज़ी लगाने वाले दो जुआरी मिल जाएँ वहीं लास वेगास है । जहाँ भी खरीदने और बेचने वाले मिल जाएँ वहीं मंडी है । फिर वहाँ क्या मोल और क्या भाव ? अपनी-अपनी गरज़ और गाँठ की बात । कभी टके में हाथी बिक जाता है और कभी थैला भरकर रुपए लेकर घूमते रहो, हाथी क्या चूहा तक नहीं मिलता । एक विज्ञापन देखा था जिसमें एक लड़की चिक्लेट नामक मीठी गोली को खाकर पट जाती है और एक लड़की किसी खुशबू विशेष (डियोडरेंट) को सूँघ कर ही पट गई । पचास करोड़ तो बहुत होते हैं ।

५० करोड़ जैसी कम कीमत पर ऐतराज़ करने वाले सच्चे प्रेमी ने प्रेमिका की असली कीमत नहीं बताई । हम तो कीमती चीज को, चाहे फिर वह कीमत कितनी भी हो, बिकाऊ ही मानते हैं । रामचन्द्र शुक्ल जी का एक निबंध है- लोभ और प्रेम । जिसमें वे कहते हैं कि लड्डू का प्रेमी लड्डू ही खाएगा फिर भले ही उसके सामने हज़ार रुपए किलो की पिस्ते की बरफी ही क्यों न रख दी जाए । प्रेम एकनिष्ठता का नाम है । वानप्रस्थ की उम्र में, पच्चीस बरस तक साथ निभा चुकी अपनी पत्नी को छोड़कर एक गोरी मेम के पीछे भगाने वाले और फिर उसे भी तलाक दे देने वाले को, भले ही आप किसी लिहाज में आकर, आप लम्पट भले ही न कहें लेकिन हम उसे प्रेमी तो नहीं ही मान सकते । भले ही दुनिया प्रचार के चक्कर में आकर शाहजहाँ को महान प्रेमी कहती है लेकिन पता होना चाहिए कि उसने पाँच हजार बेगमों का रेवड़ भर रखा था और मुमताज के मरने के बाद भी उसने और कई जवान बेगमों का जुगाड़ किया था ।

मज़े की बात यह है कि यह कीमत बताने वाला एक ऐसा व्यक्ति है जिसे प्रेमिका खरीदने का कोई अनुभव नहीं है । और कहा गया है कि उसने कभी प्रेम किया ही नहीं । बार-बार प्रेम का नाटक करने वाला शायद प्रेम की कीमत नहीं जानता क्योंकि वह तो बाजार भाव के हिसाब से खरीद-बिक्री करता है । पानी की कीमत तो प्यासा ही जानता है । भरे पेट वाले को रोटी का स्वाद नहीं पता । विदुरजी कहते हैं कि भोजन का असली स्वाद तो गरीब को ही आता है ।

लैला के दर्शन के लालच में मजनू उसके घर से थोड़ी ही दूर पर एक पेड के नीचे बैठा रहता था । लैला अपनी नौकरानी से मजनू के लिए कुछ भिजवा दिया करती थी लेकिन मजनू खाने की तरफ देखता ही नहीं था । एक दिन मजनू उस स्थान से उठ कर चला गया । उसकी जगह एक ढोंगी आदमी आकर बैठ गया और लैला के भेजे भोजन पर सेहत बनाने लगा । एक दिन लैला ने नौकरानी से पूछा कि मजनू का क्या हाल है तो नौकरानी ने ज़वाब दिया कि वह तो खा-खाकर बहुत हट्टा-कट्टा हो गया है । दूसरे दिन लैला ने नौकरानी से कहा कि वह मजनू से कहे कि लैला बीमार है । हकीम ने कहा है कि लैला के इलाज के लिए के लिए आपका एक कटोरा खून चाहिए । सुनते ही दो नंबर के मजनू ने कहा- मोहतरमा, हम तो दूध पीने वाले मजनू हैं । खून देने वाला मजनू चाहिए तो देखो वह उस पेड़ के नीचे बैठा है ।

ऐसे दूध पीने वाले मजनुओं को लोग सम्मान नहीं देते ।

यह बात सभी को याद रखनी चाहिए कि सारी लम्पटताओं और सेक्स के खुलेपन का आदी होने के बावज़ूद योरप और अमरीका का सामान्य आदमी आज भी एक पतिव्रत और एक पत्नीव्रत को ही आदर्श मानता है । अमरीका में हर राष्ट्रपति चुनाव में अपनी पत्नी को साथ लेकर घूमता है जिससे वह यह सिद्ध कर सके कि वह पारिवारिक मूल्यों में विश्वास करता है । यदि क्लिंटन अपने मोनिका प्रसंग के बाद भी चुनाव लड़ सकते तो बहुत बुरी तरह से हारते । अमरीका में प्रकट में अपनी पत्नी से बेवफाई करने वाला, रसिकता के चक्कर में तलाक आदि का चक्कर चला चुका कोई भी व्यक्ति अब तक राष्ट्रपति नहीं चुना गया है । इटली के बर्लुस्कोनी का पतन इसी लम्पटता के चलते हुआ । सारकोजी को भी किसी ने भले ही प्रकट में कुछ नहीं कहा हो लेकिन उसकी और उसकी पत्नी-प्रेमिका की हरकतों को जनता ने कभी पसंद नहीं किया ।

इसलिए हो सके तो प्यार कीजिए अन्यथा जो चाहें करें लेकिन इस शब्द का अवमूल्यन न करें ।

2012-10-30


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