28-07-2026
पत्रिका बनाम पादुका
वह भी क्या ज़माना था जब दस-बीस पैसे में अखबार सुरक्षित पहुँच जाता करता था । दो पाँच रुपए में 400 ग्राम की पत्रिका बुक पोस्ट से भेजी मँगवाई जा सकती थी । आज बुक पोस्ट और सामान्य पत्र का पहुंचना आश्चर्य और किसी 15 लाख के जुमले के सत्य सिद्ध होने जैसा है । अब तो रजिस्टर्ड बुक पोस्ट भी बंद ।अब ज्ञान पोस्ट शुरू हुई है जो पता नहीं किस अज्ञान से बचाने का उपक्रम है । पत्रिका भेजना पत्रिका की कीमत से अधिक।
हम एक पत्रिका का संपादन करते हैं । लेखकों को ज्ञान पोस्ट से भेजी जाती है कोई 40-42 रुपये लगते हैं । इतने पर भी अगर पहुँच जाए तो हम भगवान से पहले मोदी का शुक्रिया करते हैं क्योंकि नहीं पहुँचने पर भी किसी का क्या बिगाड़ लेंगे । ज्यादा चूँ चपड़ करेंगे तो कहीं कोई एफआईआर हो जाएगी या कोई देशद्रोह का मुकदमा ।
आज फैजाबाद से एक लेखक मित्र का फोन आया कि उन्हें पत्रिका नहीं मिली । दुखी थे । पत्रिका भी गई और गांठ से 42 रुपये भी ।
जैसे ही तोताराम आया, हमने कहा- तोताराम, सरकार का एक भरोसा हुआ करता था ।आदमी आँख मीचकर नोट ले लेता है, डाक के डिब्बे में पत्र डाल देता है यह सोचकर कि किसी बनिए का थोड़े है, सरकारी है पहुँच ही जाएगा लिया पर अब वह भी खत्म ।
बोला- तो क्या हो गया ? एक पत्रिका ही तो है । और पढ़कर ही क्या कोई फाड़कर एक की दो कर लेगा । लाखों नकली डिग्रियाँ लिए घूम रहे हैं, करोड़ों असली डिग्री लेकर नौकरी के इंतजार में बूढ़े हो गए । तू अपनी पत्रिका को रो रहा है वहाँ अयोध्या में भगवान राम का गर्भगृह टपक रहा है, पादुका पता नहीं कौन उठाकर ले गया ? आस्था आहत हो गई, धर्म की चूलें हिल गई ।
हमने कहा- लेकिन वह तो संघ और सरकार का निजी मामला है । किसे दोष दें । दूर दूर तक कोई विधर्मी और नास्तिक नहीं । सब के सब संस्कारी और परिवार वाले ।
बोला- लेकिन तू इस बारे में कुछ नहीं बोल सकता है । योगी जी ने साफ चेतावनी दे दी है कि अफवाहें फैलाकर धर्म का अपमान न करें । और फिर तूने कौन चन्दा दिया है जो बातें बना रहा है । पता नहीं किसे 1990 में 5 रुपये का चन्दा दिया था । ज्यादा की शुचिता की फिक्र है तो ये पकड़ तेरे पाँच रुपए और बंद कर सनातन को बदनाम करना ।
हमने कहा- बात पाँच रुपये की नहीं है । बात राम जी की है ।वैसे तो जो राम को लाए हैं वे ज़िंदगी भर राम को नाबालिग और निरक्षर रखेंगे । क्या पता पढ़ लिखकर राम लला कोई प्रश्न न उठाया दें । फिर भी अगर कभी राम लला को मंदिर के परिसर में ही थोड़ा बहुत घूमने का मन हुआ तो बिना पादुका के उनके पैर नहीं जल जाएंगे ?
बोला- कोई भी मूर्ति कितनी भी प्राण प्रतिष्ठित की गई हो लेकिन न तो खाती है, न पीती है। अगर ऐसा होता तो गर्भगृह में अटेच टॉइलेट जरूर होता । बहुत सी बातें भक्तों के मनोरंजन और शिक्षा के लिए भी होती हैं लेकिन उनका रूप थोड़ा भिन्न होता है । जैसे जगन्नाथ भगवान का हर साल गरमियों में ठंडे जल से ज्यादा स्नान करने पर सर्द गरम होकर बुखार हो जाता है और 15 दिन तक चिकित्सा चलती है । हाँ, अगर इसे एक शिक्षा और याद दिलाने के रूप में लिया जाए तो शायद जनता का कल्याण हो और वह मौसमी बीमारियों के बारे में सजग रहे ।
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
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