
एक औरत को सपना आया कि उसका पति मर गया । उसने सबको बताया । कुछ दिन बाद उसका पति मर गया । जब पड़ोस की औरतें दुःख व्यक्त करने आयीं तो उस औरत ने उत्तर दिया- खसम मरे का दुःख नहीं, सपना सच होना चाहिए । सो एक बार बुश साहब को सपना आया कि ईराक के पास विनाश के व्यापक हथियार हैं । लोग कहते रहे, संयुक्त राष्ट्र संघ के दल ने भी कहा पर बुश साहब को अपने सपने पर विश्वास था कि ईराक के पास व्यापक विनाश के हथियार हैं ।
बुश साहब के तो अब जाने के दिन हैं । २० जनवरी को तो सरकारी मकान खाली कर ही देना है । यह समय कोई घूमने का थोड़े ही होता है । अब तो सरकारी मकान के सोफ़े, पंखे, परदे, ट्यूब लाइट, गमले आदि अपने निजी मकान में पहुँचाने का मौका देखने है । पर बुश साहब ने इस महत्त्वपूर्ण समय का उपयोग सत्य के अनुसन्धान के लिए किया । वे अंत समय तक अपने सपने के सच होने का विश्वास लिए घूमते रहे और रविवार १४ दिसम्बर को यह साबित हो ही गया कि ईराक के पास व्यापक विनाश के हथियार हैं । यह व्यापक विनाश कर सकने वाला प्रक्षेपास्त्र निशाने पर लगा नहीं तो भी विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र की इज्ज़त का कचरा कर दिया । अगर निशाने पर लग गया होता तो । ये तो प्रत्युत्पन्नमति महामहिम संभल गए वरना... ।
ये एशिया, अफ्रीका के पिछड़े हुए लोग पता नहीं कहाँ से आदिम टेक्नोलोजी उठा कर ले आते हैं कि दुनिया देखती रह जाती है । अब किसे पता था कि बिना धातु और बारूद के बनी इस गंदी सी चीज से भी इतना व्यापक विनाश किया जा सकता है । अब लोग पत्रकारों को सम्मलेन में बुलाते समय हो सकता है उनके मुँह पर टेप ही बाँध दें क्या पता कोई सिरफिरा थूक का ही प्रक्षेपास्त्र चला दे । क्या पता कोई सुन्दरी पत्रकारनी अँखियों से ही गोली मार दे । लगता है अब लोग पत्रकारों को नंगा करके ही अन्दर घुसायेंगे । हवाई जहाज में तो अपने साथ कोई भी नेता नहीं ले जाएगा । हे ईराक के जैदी मियां ! तू कोई और रूप धारण करके अपना काम कर लेता पर कम से कम पत्रकारों को तो बदनाम नहीं करता ।
बुश साहब के कार्य काल में तीन घटनाएँ हुईं और तीनों ने ही इस संसार को कूट नीति की तीन महत्वपूर्ण बातें बतायीं हैं-
१. अविश्वसनीय लोगों की मदद कभी मत लो चाहे अपने शत्रु का ही विनाश क्यों न करना हो क्योंकि ग़लत आदमी ग़लत ही होता है ।
२. फिजूल खर्ची ज़्यादा मत करो नहीं तो अच्छे-अच्छों का बजा बज जाएगा ।
३. व्यापक विनाश ही नहीं, किसी भी विनाश का हथियार भी, बाहर नहीं बल्कि आदमी के दिमाग में होता है ।
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१७ दिसम्बर २००८
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Jhootha Sach

१४ दिसम्बर को ईराक में एक पत्रकार सम्मलेन में एक पत्रकार मंजूर अल जैदी ने बुश को कुत्ता संबोधित करते हुए एक-एक कर के अपने दोनों जूते उन पर प्रक्षेपित कर दिए । अगर हम उसकी जगह होते और यदि निहायत ही ज़रूरी होता तो पत्थर फेंकते । अब दोनों जूते फ़ेंक कर पछता रहा होगा, बच्चू । अरे, ज़्यादा नहीं तो हज़ार डेढ़ हज़ार के तो होंगे ही । ठीक है दो-चार दिन अख़बार में चर्चा होगी पर कोई उसके लिए जूतों का इंतज़ाम करने के लिए चंदा नहीं देगा । ठीक है, अमेरिका विरोधी ईराकियों का सीना गर्व से फूल रहा होगा पर जैदी के पैर तो जेल में ठण्ड के मारे सिकुड़ रहे होंगे । भले आदमी ने दोनों ही जूते फ़ेंक दिए । अगर एक ही फेंका होता तो देर-सबेर दूसरे के आने की भी उम्मीद रहती पर अब तो दोनों ही दूसरे पक्ष के पास चले गए अब वह उनका सदुपयोग करने के लिए स्वतंत्र है ।
एक बार एक सेल्समैन ने एक अनजान आदमी को जूते उधार दे दिए । पता चला तो मालिक बड़ा नाराज़ हुआ, बोला- बेवकूफ, क्या तू सोचता है कि वह पैसे देने वापिस आएगा । ऐसा सतयुग नहीं है । नौकर बोला- साहब, वह ज़रूर आयेगा क्योंकि मैंने उसे दोनों जूते एक ही पैर के दिए हैं । समझदारी से काम करने से आगे भी इसी तरह व्यवहार बने रहने की संभावना रहती है । एक ही फेंका होता तो या तो अपना जूता माँगने जैदी जाता या दूसरा माँगने बुश आते ।
अब आगे से पत्रकार सम्मेलन में घुसने से पहले बाहर ही जूते उतरवा लिए जायेंगे । फिर कल को कोई थूक देगा तो फिर पत्रकारों के मुँह पर टेप लगा कर अन्दर घुसायेंगे । आदमी की खुराफ़ात का कुछ पता नहीं, अच्छा हो टेलेकान्फ़्रेन्सिन्ग से ही पत्रकार सम्मेलन कर लें । वैसे इस लोकतांत्रिक नाटक की कोई ज़रूरत भी नहीं क्योंकि पंचों के कहने के बावजूद पतनाला तो वहीं गिरना है । भविष्य में ध्यान रखेंगे । पर अब तो जो होना था सो हो गया।
जिस टी.वी.का वह पत्रकार था उसके प्रबंधकों ने कहा है कि बुश ने ईराक के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वादा किया था सो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है इसलिए जैदी को तुंरत छोड़ दिया जाना चाहिए । सभी मनुष्य एक जैसे नहीं होते इसलिए उनके अभिव्यक्ति के रूप भी अलग अलग होंगे । ९/११ अलकायदा की अभिव्यक्ति थी तो इराक पर हमला अमरीका की । भारत में मूर्तियाँ और मन्दिर तोड़ना आतताइयों की अभिव्यक्ति थी तो गांधार (कंधार) में बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ना तालिबानों का अभिव्यक्ति का तरीका । गधा दुलत्ती से अपने आप को अभिव्यक्त करता है तो कुत्ते के पास पूँछ हिलाने, टांगों के बीच पूँछ दबाने, गुर्राने या टाँग उठाकर पेशाब कर देने के अलावा अभिव्यक्ति का और कोई तरीका नहीं है ।
गांधी, बुद्ध और ईसा ने भी अपने को व्यक्त किया था और लोगों को समझ भी आगया था पर पता नहीं आज आदमी की भाषा क्यों बदल गयी है । हमें तो इस मामले में कुत्ते के अवमूल्यन का दुःख है । अपमान करने के लिए कुत्ते शब्द का प्रयोग किया गया जबकि किसी घटिया आदमी के लिए कुत्ते शब्द का प्रयोग करने से कुत्ते का अपमान होता है ।
कबीर ने अपने को राम का कुत्ता कहकर गर्व का अनुभव किया था । और एक ये हैं जो कभी अमरीका के कुत्ते बनते हैं तो कभी किसी अज़हर के तो कभी किसी लखवी के । तो फिर ऐसे ही करम करेंगे ।भक्त भगवान को समर्पित होता है पर कुत्ता किसी आदमी को समर्पित होता है और यह नहीं देख पाता कि वह आदमी उसे जो रोटी खिलाता है वह कैसी कमाई की है या वह उसके इशारे पर किसे काट रहा है ? इन कुत्तों के लिए कुत्तों वाली ही भाषा काम आएगी । डंडा ।
यह भाषा आपद्धर्म हो सकता है पर कामना तो यही है कि आदमी आदमी से आदमी की बोली में बात करे ।
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१६ दिसम्बर २००८
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Jhootha Sach

( यूँ तो भारत की राजनीति में चारण-काल कभी समाप्त नहीं हुआ पर लोकतंत्र में इसके नए नए रूप मिलते हैं । अटल चालीसा से लेकर राबड़ी चालीसा तक आ चुके हैं । राजस्थान में वसुंधरा राजे को चमचों ने महारानी ही नहीं बल्कि देवी, दुर्गा तक के रूप में चित्रित किया । एक मंत्री तो बाकायदा दुर्गा रूप में फोटो रखकर धूप बत्ती और पूजा आरती किया करते थे । वसुंधरा ने कभी इस नाटक को नकारना तो दूर वरन उसका आनंद लिया । एक महंत हनुमान दास जी ने तो एक सौ दोहों की एक पुस्तक ही जून २००४ वसुंधरा की स्तुति में लिख मारी । उसीकी प्रतिक्रिया में हमारा जून २००४ में ही एक लेख प्रकाशित हुआ था । पाठकों के कल्याणार्थ उसे फिर से प्रस्तुत कर रहें हैं । )
श्री हनुमानदास वैष्णव उर्फ़ हनुमान किन्करजी महाराज, जय श्रीराम ।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक बार किसी सांसारिक व्यक्ति की प्रशंसा में कुछ लिख दिया था पर इस भूल के लिए वे जीवन भर पछताते रहे और इसीलिए रामचरित मानस में लिखा है-
कीन्हे प्राकृत जन गुन गाना ।
सिर धुनि गिरा लागि पछिताना ।
आपने तो एक सौ दोहों का एक संकलन ही राजस्थान की मुख्य-मंत्री वसुंधरा राजे की स्तुति में लिख डाला । यदि आपने नाम के अनुरूप सच्चे हनुमान भक्त हैं, और सच्चे कवि भी तो अगर कभी आत्मा जग गई तो वास्तव में बहुत पछताना पड़ेगा । एक और संत थे । अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी के पास रहते थे । अकबर ने सुना कि वे अच्छा गाते हैं तो बुला लिया, दरबार में गाना गाने के लिए । संतजी दुखी । रास्ते भर सोचते जा रहे थे । अच्छे कवि भी थे । दरबार में सुनाया :-
संतन को सीकरी सों का काम ।
आवत जात पनहियाँ टूटें, बिसर जात हरि नाम ।
अकबर की अक्ल ठिकाने आगयी । क्षमा माँग कर विदा लिया । आपके नाम के साथ संत लगा हुआ है । यदि आप महंत होते तो कोई बात नहीं थी । महंतों की बड़ी लम्बी चौड़ी जागीर होती है । बंदूक भी रखते हैं । हाथी-घोड़े - पूरा ठाठ होता है । उन्हें यदि सत्ता का सरंक्षण चाहिए तो कोई बात नहीं । उनका सत्ता गुण-गान उचित है । पर आप तो संत हैं । संत तो भगवान के संरक्षण में रहते हैं । उन्हें कुर्सी- अर्चना की क्या आवश्यकता ? वैसे आप की उम्र भी वानप्रस्थ के करीब होगी फिर क्यों अगले लोक की फिक्र नहीं करते ?
आप कहेंगें कि हम परेशान क्यों हो रहे हैं । और लोग भी तो नेताओं की प्रशंसा और स्तुति करते हैं । ग्वालियर के एक वकीलजी ने तो अटलजी का मन्दिर बनाने का ही प्रचार कर दिया । तेरह मई को अटलजी के शपथ ग्रहण की तिथि से एक दो दिन पहले अटलजी की प्रतिमा को नदी में स्नान करवाते हुए लोगों का फोटो भी हमने अखबार में देखा था । इसके बाद फील गुड उल्टा हो गया तो पता नहीं वकीलजी की मन्दिर की योजना चालू है या बंद हो गई ? उधर बिहार में भी लालू चालीसा लिखा गया । दिल्ली के एक मुसलमान कवि हैं जो अटल जी के प्रधानमन्त्रित्व काल में रोज़ अटलजी पर एक कविता लिखा करते थे । अब पता नहीं बंद कर दी या मनमोहन जी पर लिखने लगे क्या ?
राजाओं के दरबार में भी ऐसे कवि हुआ करते थे जो राजाओं से बख्शीश पाने के लिए उनकी झूठी प्रशंसा किया करते थे । गधे को बाप और मतलब न होने पर बाप को भी गधा मानने वाली महान संवेदनशील संस्कृति से तो आप परिचित होंगे ही ? वैसे आपको कब पता चला कि वसुंधरा राजे के रूप में अम्बा और चंडी का अवतार हो चुका है ? वैसे उनका जन्म तो आधी सदी पूर्व ही हो चुका था पर उनके अम्बा रूप का पता आपको शायद उनके मुख्य मंत्री बनने के बाद लगा ? शिवजी को तो राम का अवतार होते ही पता चल गया था और वे उनके दर्शन करने अयोध्या भी पहुँच गए । महान प्रगतिवादी लेखक राजेंद्र यादव को भी अपने यादव होने का पता तब चला जब लालू यादव और मुलायम सिंह यादव भारत की राजनीति में स्थापित हो गए ।
मैं किसी साधारण व्यक्ति द्वारा फायदेवाले व्यक्ति का गुणगान करने के खिलाफ नहीं हूँ । पर आपके लिए मैं विशेष रूप से इसलिए सोच रहा हूँ कि हम भी हनुमान जी के भक्त हैं और आप भी हनुमान किंकर अर्थात हनुमान जी के चाकर हैं अतः हम धर्म भाई हो गए और एक भाई के पतन पर दूसरे भाई का दुखी होना उचित ही है ।
राजतिलक के समय हनुमान जी को सीता जी ने मोतियों की एक माला दी । हनुमान जी उन मोतियों को तोड़ कर उनमें राम और सीता की छवि तलाशने लगे पर आप तो भक्ति में भगवान के स्थान पर मोतियों की माला तलाशने लगे । यह क्या कर रहे हैं भक्तराज ! वैसे वसुंधरा का अर्थ पृथ्वी भी होता है । तभी ऋषि ने कहा है- माता पृथिव्या, पुत्रोहम । पृथ्वी से हम सबका माता और पुत्र का नाता है । इस सम्बन्ध को और दृढ़ करें और इस पृथ्वी को और अधिक सुंदर बनने का प्रयत्न करें । आपके नाम के साथ वैष्णव भी जुड़ा हुआ है । 'वैष्णव जन' पद के रचयिता भक्त कवि नरसी मेहता गुजरात के थे । उन्होंने घोर दरिद्रता में भी भगवान से कुछ नहीं माँगा । भगवान तो स्वयं उनका भात भरने आए थे । सो भगवान पर भरोसा रखिये । वे आवश्यकता होने पर अवश्य आपकी सहायता करेंगे ।
आपने पुस्तक का प्रकाशन स्वयं किया । अच्छी बात है । वरना आपकी इस महान और कमाऊ कृति को कोई भी प्रकाशक आराम से मिल सकता था । संसद और विधायकों के शुभकामना संदेश तो मिलने ही थे वे तो तैयार रहते हैं कि कोई संदेश माँगे और वे भेजें । वैसे आपकी यह कृति बिकेगी अवश्य, हो सकता है सरकारी खरीद भी हो जाए ।
यदि आप हमें समीक्षा लिखने के योग्य समझते हैं तो कृपया दो प्रतियाँ भिजवादें । वो धाँसू समीक्षा लिखेंगें कि क्या बात है । हमारे देश में सरकारें बदलते ही सड़क, जिला, और पाठ्य पुस्तकें तक बदलने लग जाते हैं क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है । सरकार बदलने से पहले ही इस महान, लोक कल्याणकारी, शिक्षाप्रद और जन्म सुधारने वाली कृति को किसी बी.ए., एम.ए. के कोर्स में लगवा लीजिये ।
आपका धर्मभाई,
रमेश जोशी
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१० दिसम्बर २००८
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Jhootha Sach
राजस्थान के चुनावों के विस्तृत परिणाम अखबार में पढ़ ही रहे थे कि तोताराम प्रकट हुआ, बोला- भाई साहब, चाय मँगवाइए, आपका लघु भ्राता बसंती की इज्ज़त बचा कर सकुशल लौट आया है । हमने कहा- तोताराम, राज्य में ३२ जिले हैं और दिगंबर सिंह उर्फ़ बसंती की इज्ज़त ३५२४ वोटों से बच गयी । हर जिले से समझ ले कि तेरे जैसे ५-५ मर्द भी डीग-कुम्हेर गए होंगे तो हर एक ने २०-२२ वोटों का योगदान दिया होगा । अगर अपने जिले से ५ आदमी न भी जाते तो भी दिगंबर सिंह उर्फ़ बसंती की इज्ज़त आराम से बच जाती । वैसे दिगंबर का अर्थ निर्वस्त्र भी होता है सो अगर कुछ ऐसा वैसा हो भी जाता तो भी क्या फ़र्क पड़ता था पर देख यहाँ तो ज़रा से सहारे के अभाव में चीर-हरण ही हो गया -भरी सभा में । कांग्रेस अध्यक्ष सी.पी. जोशी मात्र एक वोट से इज्ज़त उतरवा बैठे । यदि तू ही नाथद्वारा चला जाता तो दिगंबर का तो कुछ बिगड़ता नहीं पर हाँ, जोशीजी की यूँ मिट्टी पलीद नहीं होती । नीरज ने जो कहा वही हो गया- एक तार की दूरी है बस दामन और कफ़न में । और फिर एक दूसरे जोशीजी और हैं लक्षमण गढ़ वाले, जो मात्र ३४ वोटों से मात खा गए । दो आदमी इधर भी चले जाते तो इस पंछी की नैया भी पार हो जाती ।
तोताराम बोला- देख मास्टर! मुझे राजनीति में कोई रुचि नहीं है । और फिर तुम्हारे कांग्रेस अध्यक्ष के घर में ही तो थे श्रीनाथजी । सारे राज्य में घूमते फिरे मगर श्रीनाथ जी के एक बार से ज्यादा धोक नहीं लगाई वरना एक वोट का क्या श्रीनाथजी ख़ुद ही डाल आते एक वोट तो । वैसे ठीक भी रहा, सबको पता चल जाएगा कि एक वोट की भी कीमत होती है । इससे यह भी शिक्षा मिलती है कि अपने एक वोट को पटाने की बजाय दूसरे के दो वोट बिगाड़ना अधिक महत्वपूर्ण है । इस सिद्धांत को ख़ुद की नाक कटवाकर दूसरे के सगुन बिगाड़ना कहते हैं । और फिर जोशीजी ओवर कोंफिडेंस में भी तो मार खा गए । एक बार पुकारा भी तो नहीं हमें । यदि पुकारते तो क्या हम नहीं जाते ? डूबते गजराज को बचाने के लिए तो भगवान नंगे पैरों दौड़े चले गए थे ।
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८ दिसम्बर २००८
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