प्रिय पाठको!
आज हम आपको बहुत दुखी हृदय से यह सूचना दे रहे हैं कि इंडिया की मृत्यु हो गई है । मृत्यु जीवन की अन्तिम परिणति है । जो पैदा हुआ है वह अवश्य मरेगा । पर हमें तो इसी बात का दुःख हैं कि जहाँ उसकी मृत्यु हुई है वहाँ किसी प्रकार के इलाज़ या अन्य सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी । बड़ा लाड-प्यार और सार-संभाल थी फिर भी मृत्यु हो गई । अब हम क्या कर सकते हैं । अब तो बस श्रद्धांजलि ही दी जा सकती है । दो मिनट का मौन ही रखा जा सकता है । इंडिया को दुनिया के सबसे समर्थ व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त था । जब समय बुरा आता है तो समर्थ से समर्थ व्यक्ति पर कोई अदना सा आदमी जूता तक फ़ेंक देता है और लोग तमाशा देख कर रह जाते हैं ।
इंडिया की मृत्यु की सूचना हमें फॉक्स न्यूज़ से मिली जिसमे व्हाइट हॉउस के लारा बुश के कार्यालय के सेली मेक्डोनो के हवाले से बताया गया कि इंडिया की १८ वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई । तो क्या इंडिया की उमर केवल १८ वर्ष ही थी । अब साहब १८ वर्ष पहले जनम हुआ तो उम्र १८ वर्ष से ज़्यादा कैसे हो सकती है । खुश होने की बात यह है कि इंडिया को लारा बुश ने अपने परिवार के सदस्य के समान बताया है ।
इंडिया को १८ वर्ष होने के कारण वोट का अधिकार भी मिलने वाला था । हो सकता है सुरक्षा परिषद् की सदस्यता भी मिल जाती । अमेरिका चाहे तो क्या नहीं हो सकता । पर क्या किया जाए अब तो इंडिया की मृत्यु ही हो चुकी । आप कहेंगें कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इंडिया मर जाए और हम जिंदा रहें ? ऐसा बहुत बार हुआ है । स्वर्णिम चतुर्भुज के इंजीनीयर पांडे की ठेकेदारों ने हत्या करवा दी और कुछ नहीं हुआ । नेता के जन्म दिन के लिए लाखों का चन्दा नहीं देने पर मनीष गुप्त की हत्या कर दी गई और कुछ नहीं हुआ । ताज़ा उदहारण ही देख लीजिये कि आतंकवादी पाकिस्तान के थे, सारी दुनिया जानती है, पाकिस्तान आँखों-आँखों में हँसता हुआ कह रहा कि आतंकवादी उसके यहाँ के नहीं थे । आगे भी यही कहता रहेगा । आपने सबूत दिए और वह कह रहा है कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं । आगे भी यही कहता रहेगा । दुनिया तमाशा देख रही है । यह मरना नहीं है तो क्या है ?
बने फिरो जगद्गुरु, बने फिरो आर्थिक महाशक्ति ।
अब चलो आपको बता ही देते हैं कि यह इंडिया और कोई नहीं - लारा बुश की प्रिय बिल्ली है जिसको भारत प्रेम के कारण मेडम ने इंडिया नाम दिया था ।
आप में से कुछ ज़्यादा राष्ट्रवादी होने का नाटक करने के कारण कहेंगे कि बिल्ली को इंडिया नाम देने से भारत के सम्मान को ठेस लगी है । अब इसका क्या किया जाए । ऐसा तो होता ही रहता है । अमरीका में तो शिव, गणेश और काली आदि को सेंडिल पर छाप दिया था ।
वैसे बिल्ली, कुत्ते से ज़्यादा निकट होती है मालिक के ।
बिल्ली का नाम इंडिया रखने का किस्सा आज का नहीं बल्कि २४ जुलाई २००१ का है । हमने उस समय अपनी प्रतिक्रिया में दो कुण्डलिया छंद लिखे थे (कुण्डलिया संग्रह 'अपनी-अपनी लंका') जो आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहें हैं ताकि सनद रहे ।
नौकर के होते सदा रामू, भोला नाम ।
भोले शंकर,राम पर ना होते नाराज़ ।
ना होते नाराज़, उड़ेगी काहे खिल्ली ।
कुत्ते से हर तरह श्रेष्ठ होती है बिल्ली ।
जोशी जिनके कुत्ते बन, वे पूँछ हिलाएँ ।
तो उनकी बिल्ली बनकर हम क्यों शरमाएँ ।
बुश की बिल्ली बन गया अगर इंडिया देश ।
तो क्यों होते हो दुखी, क्यों खाते हो तैश ।
क्यों खाते हो तैश, बड़ों के कुत्ते बिल्ली ।
सब सुख भोगें, रहें सदा कलकत्ता, दिल्ली ।
कह जोशी कवि म्याऊँ बोलें उन्हें रिझाएँ ।
तो चूहा क्या, चिकन केन्टकी वाला खाएँ ।
६ जनवरी २००९
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
original article
-----
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.
Jhootha Sach
संस्कृत में एक श्लोक है- 'येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषः भवेत' अर्थात पुरुष को किसी भी प्रकार प्रसिद्ध होना चाहिए । प्रसिद्ध होने पर कई प्रकार के फायदे मिलने लग जाते हैं । और कुछ नहीं तो कोई न कोई पार्टी चुनाव में टिकट ही दे देती है । पत्रकारिता तो गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, बेचन शर्मा 'उग्र' आदि ने भी की पर हमेशा ही 'हैण्ड टू माउथ' रहे । और आज देखिये एक निहायत गुमनाम सा पत्रकार मुन्तज़र अल जैदी सारे संसार में चर्चित हो गया । उसे एक मुस्लिम उद्योगपति ने मर्सडीज कार तोहफे में देने की पेशकश की है, मिस्र के एक पिता ने निकाह के लिए अपनी बेटी प्रस्तुत की है । कंपनियों में उस जूते को अपनी कम्पनी का बताने की होड़ लग गई है । उन कंपनियों ने तो उस जूते को आरामदायक और मज़बूत कहकर बेचा था । उन्हें अपने जूते की मारक क्षमता का पता ही नहीं था । बुश को भी ईराक में व्यापक विनाश के हथियार नहीं मिले और व्यापक विनाश की वह क्षमता पता नहीं इस गंदे और पुराने जूते में कहाँ से प्रकट हो गई । उन जूतों को नष्ट कर दिया गया है पर पता नहीं ऐसे ही और कितने जूते ईराक में छुपे होंगे । इसलिए अमरीका को अपनी सेना ईराक में २०१० तक ही नहीं वरन तब तक रखनी चाहिए जब तक कि वहाँ एक भी जूता कम्पनी, एक भी जूता और यहाँ तक कि एक भी जूता पहनने लायक पैर बाकी है ।
तो बात चर्चित हुए मुन्तज़र की । वास्तव में कई बरसों से ईराक का आहत स्वाभिमान फिर गर्व से सिर उठाने के लिए एक मौके का मुन्तज़र था सो वह मौका पत्रकार मुन्तज़र ने उपलब्ध करवा दिया । उस बन्दे के वे जूते लगभग ५० करोड़ रुपये में खरीदने की बोली लग गयी है । कहते हैं उन्हें नष्ट कर दिया गया है । अच्छा हुआ जो नष्ट कर दिया वरना कोई न कोई उसे खरीदता, उसका स्मारक बनवाता, और फिर कोई पंथ खड़ा हो जाता । मतलब कि विवादास्पद श्रद्धा का एक और अखाड़ा तैयार हो जाता । कट्टर, अतार्किक और कर्महीन केन्द्र ही खुराफातों की जड़ बनते हैं । सभ्यताओं की इस तथाकथित लड़ाई में संसार अन्ध-श्रद्धा की इस विडंबना को भली भाँति अनुभव कर रहा है ।
तो ईराकी, मुस्लिम और अमरीका-विरोधी गौरव के इस केन्द्र मुन्तज़र की चर्चा पूरी होने से पहले ही इस दीवाने ने माफी माँग ली । पटाखा फुस्स्स हो गया । इसका मतलब है कि यह कृत्य किसी महान दर्शन या विचार से सम्बंधित नहीं था । मुम्बई कांड में गिरफ़्तार कासब भी आतंकवादी वीरता दिखाने के बाद प्राणों की भीख माँग रहा है । भगत सिंह, आजाद, अशफाकुल्ला, राजगुरु, बिस्मिल ने तो माफ़ी तो दूर की बात है, जिस दृढ़ता और गर्व से जेल में रहे उससे अंग्रेज़ प्रभावित ही नहीं भयभीत तक थे । उन्होंने ऐसे अलौकिक संकल्प की कल्पना भी नहीं की थी । असेम्बली में बम विस्फोट के बाद भगतसिंह आसानी से भाग सकते थे पर वे भागने के लिए नहीं जान देने के लिए आए थे । वे चाहते थे कि मुक़दमा चले और वे ब्रिटिश सरकार ही नहीं वरन सारे संसार को बता सकें कि भारत क्या है, क्या चाहता है ? अंग्रेज़ तो चाहते थे कि भगत सिंह ज़रा सा माफी का संकेत दें और वे उन्हें छोड़ दें । जब भगत सिंह को फाँसी के लिए लेने आए तो वे शांत भाव से एक पुस्तक पढ़ रहे थे । हालाँकि अँग्रेजों ने उन्हें आतंकवादी बताने की कोशिश की पर क्या ऐसी शान्ति और दृढ़ता आतंकवादियों में हो सकती है? ऊधम सिंह ने लन्दन जाकर जालियाँवाला बाग के अपराधी को गोली मारी और भागने की बजाय गिरफ्तार हो गए, बोले मैं जो काम करने आया था वह कर दिया, अब तुम्हें जो करना है कर लो । यह है शहादत और वीरता । मुन्तज़र और कसाब के बहाने अपनी कुंठा को सहलाने वालों को अपना गर्व और श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए कोई सकारात्मक सोच और मार्ग अपनाने चाहिए ।
जहाँ तक मुन्तज़र के लिए उचित सलाह की बात है- उसे सबसे पहले जूता-कंपनियों से टेंडर आमंत्रित करने चाहियें कि जो कम्पनी ज़्यादा पैसे देगी वह अपने प्रक्षेपित जूतों को उसी कम्पनी का बता देगा । दूसरे, कार देने की पेशकश करने वाले भक्त को बैंक खाते में मर्सडीज़ की राशिः बैंक में जमा करवाने के लिए पत्र लिख दे । यद्यपि असली जूते नष्ट कर दिए गए हैं तो भी उसे यह प्रचारित करना चाहिए कि उसके पास वैसे जूतों का एक पुराना जोड़ा और है । जब अक्ल का अंधा और गाँठ का पूरा कोई भक्त संपर्क करे तो तत्काल बेच देना चाहिए क्योंकि ऐसी दीवानगी का नशा बहुत ज़ल्दी उतर जाता है । और उस मिस्री लड़की को जेल से छूट कर आने तक इंतजार करने के लिए लिख दे बशर्ते कि वह इंतजार कर सके । ऐसे मामलों में ज़ल्दी करनी चाहिए जैसे मोनिका लेवेंस्की और क्लिंटन ने अपने अपने सत्कर्मों का रोमांच तत्काल बेच लिया । समय निकल जाने के बाद तो पालक की गड्डी की तरह फेंकना ही पड़ता है ।
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
१९ दिसम्बर २००८
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.
Jhootha Sach

एक औरत को सपना आया कि उसका पति मर गया । उसने सबको बताया । कुछ दिन बाद उसका पति मर गया । जब पड़ोस की औरतें दुःख व्यक्त करने आयीं तो उस औरत ने उत्तर दिया- खसम मरे का दुःख नहीं, सपना सच होना चाहिए । सो एक बार बुश साहब को सपना आया कि ईराक के पास विनाश के व्यापक हथियार हैं । लोग कहते रहे, संयुक्त राष्ट्र संघ के दल ने भी कहा पर बुश साहब को अपने सपने पर विश्वास था कि ईराक के पास व्यापक विनाश के हथियार हैं ।
बुश साहब के तो अब जाने के दिन हैं । २० जनवरी को तो सरकारी मकान खाली कर ही देना है । यह समय कोई घूमने का थोड़े ही होता है । अब तो सरकारी मकान के सोफ़े, पंखे, परदे, ट्यूब लाइट, गमले आदि अपने निजी मकान में पहुँचाने का मौका देखने है । पर बुश साहब ने इस महत्त्वपूर्ण समय का उपयोग सत्य के अनुसन्धान के लिए किया । वे अंत समय तक अपने सपने के सच होने का विश्वास लिए घूमते रहे और रविवार १४ दिसम्बर को यह साबित हो ही गया कि ईराक के पास व्यापक विनाश के हथियार हैं । यह व्यापक विनाश कर सकने वाला प्रक्षेपास्त्र निशाने पर लगा नहीं तो भी विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र की इज्ज़त का कचरा कर दिया । अगर निशाने पर लग गया होता तो । ये तो प्रत्युत्पन्नमति महामहिम संभल गए वरना... ।
ये एशिया, अफ्रीका के पिछड़े हुए लोग पता नहीं कहाँ से आदिम टेक्नोलोजी उठा कर ले आते हैं कि दुनिया देखती रह जाती है । अब किसे पता था कि बिना धातु और बारूद के बनी इस गंदी सी चीज से भी इतना व्यापक विनाश किया जा सकता है । अब लोग पत्रकारों को सम्मलेन में बुलाते समय हो सकता है उनके मुँह पर टेप ही बाँध दें क्या पता कोई सिरफिरा थूक का ही प्रक्षेपास्त्र चला दे । क्या पता कोई सुन्दरी पत्रकारनी अँखियों से ही गोली मार दे । लगता है अब लोग पत्रकारों को नंगा करके ही अन्दर घुसायेंगे । हवाई जहाज में तो अपने साथ कोई भी नेता नहीं ले जाएगा । हे ईराक के जैदी मियां ! तू कोई और रूप धारण करके अपना काम कर लेता पर कम से कम पत्रकारों को तो बदनाम नहीं करता ।
बुश साहब के कार्य काल में तीन घटनाएँ हुईं और तीनों ने ही इस संसार को कूट नीति की तीन महत्वपूर्ण बातें बतायीं हैं-
१. अविश्वसनीय लोगों की मदद कभी मत लो चाहे अपने शत्रु का ही विनाश क्यों न करना हो क्योंकि ग़लत आदमी ग़लत ही होता है ।
२. फिजूल खर्ची ज़्यादा मत करो नहीं तो अच्छे-अच्छों का बजा बज जाएगा ।
३. व्यापक विनाश ही नहीं, किसी भी विनाश का हथियार भी, बाहर नहीं बल्कि आदमी के दिमाग में होता है ।
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
१७ दिसम्बर २००८
-----
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.
Jhootha Sach

१४ दिसम्बर को ईराक में एक पत्रकार सम्मलेन में एक पत्रकार मंजूर अल जैदी ने बुश को कुत्ता संबोधित करते हुए एक-एक कर के अपने दोनों जूते उन पर प्रक्षेपित कर दिए । अगर हम उसकी जगह होते और यदि निहायत ही ज़रूरी होता तो पत्थर फेंकते । अब दोनों जूते फ़ेंक कर पछता रहा होगा, बच्चू । अरे, ज़्यादा नहीं तो हज़ार डेढ़ हज़ार के तो होंगे ही । ठीक है दो-चार दिन अख़बार में चर्चा होगी पर कोई उसके लिए जूतों का इंतज़ाम करने के लिए चंदा नहीं देगा । ठीक है, अमेरिका विरोधी ईराकियों का सीना गर्व से फूल रहा होगा पर जैदी के पैर तो जेल में ठण्ड के मारे सिकुड़ रहे होंगे । भले आदमी ने दोनों ही जूते फ़ेंक दिए । अगर एक ही फेंका होता तो देर-सबेर दूसरे के आने की भी उम्मीद रहती पर अब तो दोनों ही दूसरे पक्ष के पास चले गए अब वह उनका सदुपयोग करने के लिए स्वतंत्र है ।
एक बार एक सेल्समैन ने एक अनजान आदमी को जूते उधार दे दिए । पता चला तो मालिक बड़ा नाराज़ हुआ, बोला- बेवकूफ, क्या तू सोचता है कि वह पैसे देने वापिस आएगा । ऐसा सतयुग नहीं है । नौकर बोला- साहब, वह ज़रूर आयेगा क्योंकि मैंने उसे दोनों जूते एक ही पैर के दिए हैं । समझदारी से काम करने से आगे भी इसी तरह व्यवहार बने रहने की संभावना रहती है । एक ही फेंका होता तो या तो अपना जूता माँगने जैदी जाता या दूसरा माँगने बुश आते ।
अब आगे से पत्रकार सम्मेलन में घुसने से पहले बाहर ही जूते उतरवा लिए जायेंगे । फिर कल को कोई थूक देगा तो फिर पत्रकारों के मुँह पर टेप लगा कर अन्दर घुसायेंगे । आदमी की खुराफ़ात का कुछ पता नहीं, अच्छा हो टेलेकान्फ़्रेन्सिन्ग से ही पत्रकार सम्मेलन कर लें । वैसे इस लोकतांत्रिक नाटक की कोई ज़रूरत भी नहीं क्योंकि पंचों के कहने के बावजूद पतनाला तो वहीं गिरना है । भविष्य में ध्यान रखेंगे । पर अब तो जो होना था सो हो गया।
जिस टी.वी.का वह पत्रकार था उसके प्रबंधकों ने कहा है कि बुश ने ईराक के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वादा किया था सो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है इसलिए जैदी को तुंरत छोड़ दिया जाना चाहिए । सभी मनुष्य एक जैसे नहीं होते इसलिए उनके अभिव्यक्ति के रूप भी अलग अलग होंगे । ९/११ अलकायदा की अभिव्यक्ति थी तो इराक पर हमला अमरीका की । भारत में मूर्तियाँ और मन्दिर तोड़ना आतताइयों की अभिव्यक्ति थी तो गांधार (कंधार) में बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ना तालिबानों का अभिव्यक्ति का तरीका । गधा दुलत्ती से अपने आप को अभिव्यक्त करता है तो कुत्ते के पास पूँछ हिलाने, टांगों के बीच पूँछ दबाने, गुर्राने या टाँग उठाकर पेशाब कर देने के अलावा अभिव्यक्ति का और कोई तरीका नहीं है ।
गांधी, बुद्ध और ईसा ने भी अपने को व्यक्त किया था और लोगों को समझ भी आगया था पर पता नहीं आज आदमी की भाषा क्यों बदल गयी है । हमें तो इस मामले में कुत्ते के अवमूल्यन का दुःख है । अपमान करने के लिए कुत्ते शब्द का प्रयोग किया गया जबकि किसी घटिया आदमी के लिए कुत्ते शब्द का प्रयोग करने से कुत्ते का अपमान होता है ।
कबीर ने अपने को राम का कुत्ता कहकर गर्व का अनुभव किया था । और एक ये हैं जो कभी अमरीका के कुत्ते बनते हैं तो कभी किसी अज़हर के तो कभी किसी लखवी के । तो फिर ऐसे ही करम करेंगे ।भक्त भगवान को समर्पित होता है पर कुत्ता किसी आदमी को समर्पित होता है और यह नहीं देख पाता कि वह आदमी उसे जो रोटी खिलाता है वह कैसी कमाई की है या वह उसके इशारे पर किसे काट रहा है ? इन कुत्तों के लिए कुत्तों वाली ही भाषा काम आएगी । डंडा ।
यह भाषा आपद्धर्म हो सकता है पर कामना तो यही है कि आदमी आदमी से आदमी की बोली में बात करे ।
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)
१६ दिसम्बर २००८
-----
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.
Jhootha Sach