Jan 24, 2024

प्राण, प्रतिष्ठा और प्रतिष्ठित


प्राण, प्रतिष्ठा और प्रतिष्ठित   


अब दांतों ने जवाब देना शुरू कर दिया है । जहां नीचे की दाढ़ है वहाँ ऊपर वाली गायब और जहां ऊपर वाली सलामत है तो नीचे वाली पलायन कर चुकी । मतलब सेटिंग बिगड़ गई । अब चक्की के एक पाट से तो पिसाई नहीं हो सकती । ऐसे में चावल, खिचड़ी और दलिया का ही सहारा है । रात को चावल थोड़े ज्यादा बन गए सो पत्नी ने उन्हीं को छौंक कर चाय के साथ दे दिया । एक चम्मच भर ही मुँह में डाला था कि तोताराम ने टोक दिया । ऐसी भी क्या गरीबी आ गई जो राममंदिर प्राणप्रतिष्ठा के निमंत्रण के अक्षत ही खाने लगा । 

हमने कहा- हम तो रात के बचे हुए चावल खा रहे हैं । अक्षत खाए थोड़े जाते हैं, वे सगुन के होते हैं । कुछ बेरोजगार युवक लेकर तो आए थे लेकिन हमने शंकराचार्य जी की तरह कह दिया- हमें तो अपूर्ण मंदिर में नहीं जाना है  जीसे  जाना हो उसे दे दो । वैसे भी राम हमारे लिए नए नहीं हैं । 1949 में आधी रात को दीवार फांदकर चबूतरे पर राम लला को विराजमान करने के पहले से ही हम तो राम के  भरोसे हैं और हनुमान जी की कृपा से भूत-पिशाचों से बचते-बचाते 82 वें वर्ष में चल रहे हैं । 

कल खाटू श्याम जी के पास के अपने पलसाना नामक कस्बे से महंत गोपालदास शेखावाटी की मिट्टी लेकर गए बताए । आज तुझे आने में देर हो गई तो हमने सोचा, लगता है तोताराम कहीं उनके साथ लटककर अयोध्या तो नहीं चला गया । अगर चल गया होगा तो बिना बात परेशान होगा क्योंकि अभी हमने अखबार के पहले पन्ने पर विज्ञापन देखा जिसमें बताया गया है कि भारत की सभी विधाओं के 2500 श्रेष्ठ पुरुषों की उपस्थिति में 22 जनवरी को रामलला प्राण-प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होगा । शेष पुरुष अपने निकट के मंदिर में स्वच्छता अभियान चलाएं, निकट के मंदिर में कीर्तन करें, प्रसाद वितरित करें, पाँच-पाँच दीये जलाएं । समारोह के बाद दर्शन हेतु अनुकूल समयानुसार अयोध्या पधारें । 

इस हिसाब से क्या तो तेरे प्राण और क्या तेरी प्रतिष्ठा । क्या करेगा प्राणप्रतिष्ठा में जाकर । जो प्रतिष्ठित हैं वे जा ही  रहे हैं । 

बोला- इसका मतलब इनके अलावा शेष सब निकृष्ट पुरुष हैं ? लगता है यह सब चंपत राय की चालाकी है। वही यह सब कर रहा है । उसीने शंकराचार्यों को नहीं बुलाया । वही अब कह रहा है कि रामलला की पूजा रामानंदी पद्धति से होगी । 

तुझे पता होना चाहिए कि रामानंद तो ब्राह्मणवादी सनातन व्यवस्था के विरुद्ध थे । उन्होंने तो सवर्ण, दलित सभी को अपना शिष्य बनाया । यहाँ तक कि उनके शिष्य मुसलमान भी थे । कबीर तो उनके सबसे प्रसिद्ध शिष्य हैं जो सभी प्रकार के कर्मकांडियों, मूर्तिपूजकों को लताड़ते हैं । वे तो कहते हैं पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पुजूँ पहार । 

मैं किसी चंपत राय को कुछ नहीं समझता । मैं तो उस राम को मानता हूँ जो शबरी के जूठे बेर खा सकता है, जो पिता का राज बटाऊ की तरह सहजता से छोड़ सकता है । ये हजारों करोड़ के खजांची मेरे किस काम के । वैसे मेरे न जाने का कारण चंपत राय का निमंत्रण न मिलना नहीं है । उसका क्या, उसने तो आडवाणी जी को कैसा अपमानजनक निमंत्रण भेजा था । शंकराचार्यों को तो उलटे मन से भी नहीं बुलाया । 

मुझे तो मोदी की करबद्ध प्रार्थना ने विवश कर दिया । 

हमने पूछा- मोदी जी तो आजकल भूखे-प्यासे एक एक दिन में चार चार मंदिरों में चक्कर लगा रहे हैं । उन्हें तुझसे प्रार्थना करने का समय कैसे मिल गया ? उन्हें तो नौ महिने हो गए मणिपुर जाने और अपने परिवार के जैसी महिला पहलवान बेटियों तक से मिलने का समय नहीं मिला।

बोला- व्यक्तिगत रूप से मिलन नहीं हुआ लेकिन उन्होंने एक रैली में कहा है - अयोध्या में सबका पहुंचना बहुत मुश्किल है, इसलिए देश भर के राम भक्तों को, विशेषकर उत्तर प्रदेश के राम भक्तों से हाथ जोड़कर प्रणाम के साथ प्रार्थना है, आग्रह है कि 22 जनवरी को विधि पूर्वक कार्यक्रम हो जाने के बाद 23 जनवरी के बाद अपनी सुविधा के अनुसार अयोध्या आएं ।  अयोध्या आने का मन 22 जनवरी को न बनाएं ।  प्रभु राम जी को तकलीफ हो, ऐसा हम भक्त कर नहीं सकते ।  प्रभु श्री राम जी पधार रहे हैं तो हम भी कुछ दिन इंतजार करें. साढ़े पांच सौ साल इंतजार किया है तो कुछ दिन और इंतजार करें । इसलिए सुरक्षा और व्यवस्था के लिहाज से मेरी आप सबसे बार-बार प्रार्थना है कि कृपा करके आप प्रभु राम के दर्शन, अयोध्या का नव्‍य, भव्य, दिव्य मंदिर आने वाले सदियों तक दर्शन के लिए उपलब्ध है ।

अब उनकी बात भी तो नहीं टाल सकता ना ।  

न सही अयोध्या, जहां मर्यादा वहीं राम । तुलसी ने तो बहुत पहले ही कह दिया था- सियाराममय सब जग जानी । जल्दी से ये अक्षत,  नहीं सॉरी चावल समाप्त कर और चाय बनवा । साथ में न सही कोई विशिष्ट प्रसाद; संक्रांति का  बचा हुआ कोई तिल का लड्डू या घेवर का टुकड़ा ही ले आ । 



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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

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