Dec 7, 2008

आपके साथ हमारी पूरी सहानुभूति है मियाँ ज़रदारी



मियाँ ज़रदारी,
भगवान आपको सद्बुद्धिप्रदान करे । भले ही लोग आपकी आलोचना करें पर हमें आप से सहानुभूति है । वैसे आप खानदानी जागीरदार और ज़रदार हैं, तभी तो बेनज़ीर ने आपको चुना । जैसे डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी और मास्टर की पत्नी बिना किसी डिग्री के ही मास्टरनी बन जाती है वैसे ही आप भी बिना चुनाव लड़े ही प्रधान मंत्री क्या, प्रधान मंत्री पति बन गए । हमारे यहाँ महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद महिला सरपंच चुनी जाने लगी हैं और उनका सारा काम उनके पति महोदय चलाते हैं, सील और लेटर पेड उन्ही की जेब में होते हैं । यहाँ तक कि वे सरपंच पति के नाम से जाने भी जाते हैं । नेतागिरी करते घूमते रहते हैं । आपने भी प्रधान मंत्री पति होने का बड़ा सुख लिया है । सेंट पर सेंट खा जाने पर भी आपको कौन पूछ सकता था पर हम आपके संतोष और पारदर्शिता की दाद देते हैं कि आपने केवल दस प्रतिशत ही खाया और पूरी पारदर्शिता से खाया कि लोग आपको मिस्टर दस परसेंट के नाम से ही जानने लगे । अब मिस राईस ने मुम्बई मामले की जाँच पूरी पारदर्शिता से करवाने के लिए कहा है, पर आप ही क्या पूरे पाकिस्तान का ही इतिहास कपड़ों के बावजूद पूरा पारदर्शी रहा है यह अमरीका से ज़्यादा और कौन जानता है? जब आप नवाज़ से गठबंधन कर रहे थे तब भले ही नवाज़ मूर्ख बन रहे थे या मज़बूरी में थे पर हमें तो सब कुछ पूरा साफ-साफ दिख रहा था ।

अगर बेनज़ीर वाला हादसा न होता और वे चुनी जाती तो फिर टेन परसेंट वाला मामला चल निकलता । पर अब क्या किया जाए पूरी हंड्रेड परसेंट की जिम्मेदारी आ गयी । आतंकवादियों को पकड़ें या नहीं पर हिसाब तो पूरा बना कर दिखाना पड़ेगा । और अब बुश की जगह यह ओबामा आ गया । यह हिसाब किताब का कुछ पक्का लगता है । आपसे ज़्यादा अनुभव नवाज़ को है । अच्छा होता आप उनको प्रधान मंत्री बना देते । पर यह साली कुर्सी होती ही बड़ी कुत्ती चीज । अच्छे अच्छों का दिल डोल जाता है । और दिल का क्या ? पालिन को देखते ही जूते खाने वाले डायलाग बोलने लगा । आपने कुर्सी सँभालते ही अच्छी अच्छी बातें बोलना शुरू किया तभी से हमारा माथा ठनकने लगा था । कवियों ने कहा भी है-
बुरो बुराई जो तजे, तो चित खरो सकात ।
ज्यों निकलंक मयंक लखि, गनें लोग उत्पात ॥

अर्थात यदि बुरा आदमी बुराई छोड़ने की बात करता है, तो मन में शंका होती है । जैसे यदि चन्द्रमा में दाग न दिखे तो लोग इसे किसी दुर्घटना की शंका के रूप में देखते हैं ।

अब देख लो मुम्बई वाला मामला हो गया ना ।

अब आप भारत द्वारा वांछित बीस आतंकवादियों के बारे में जो कुछ कह रहें हैं यदि वह आपकी बात है तो दुःख की बात है और यदि आई.एस.आई., कट्टरपंथियों और सेना के दबाव के कारण कह रहे हैं तो और भी भयंकर बात है । फिर क्या फ़ायदा हुआ, ऐसा लोकतंत्र तो पहले भी पाकिस्तान में चल ही रहा था । हमें आपकी हालत पर तरस आता है । कठपुतली राजा की हालत तो गुलाम से भी बुरी होती है । अगर और आतंकवादियों की बात छोड़ भी दें तो दाऊद इब्राहीम तो भारत का नागरिक है उसे सरंक्षण देने का क्या मतलब है ? यदि निर्दोष व्यक्ति को प्राणों का भय हो तो उसको शरण देना शरणागत वत्सलता हो सकती है जैसे राम ने विभीषण को शरण दी थी या राजा शिवि ने कबूतर को शरण दी थी या हम्मीर अलाउद्दीन के एक सेना अधिकारी को शरण दी थी । पर दाऊद इब्राहीम तो मुम्बई बम कांड का अपराधी है । उसे शरण देना तो शत्रुता है जैसे ब्रिटेन का फिजो, जगजीत सिंह चौहान या लाल डेन्गा को शरण देना था ।

आपकी वर्तमान स्थिति के बारे में हम आपको एक कहानी सुनाते हैं । एक बार एक गीदड़ ने देखा कि एक शेर दहाड़ा, उसकी पूँछ खड़ी हो गई, आँखें लाल हो गईं फिर वह शिकार पर टूट पड़ा और जानवर को मार लिया । गीदड़ को यह तरीका बड़ा सरल लगा । घर आकर उसने अपनी पत्नी से कहा अब मैं शिकार करूँगा । उसने ज़ोर से हुआं-हुआं की आवाज़ निकाली और पत्नी से पूछा- बता मेरी आँखें लाल हुई कि नहीं, पूँछ खडी हुई कि नहीं । पत्नीके मना करने पर उसने डाँट पिलायी । पत्नी ने डरकर हाँ कर दी । उत्साहित होकर गीदड़ पास ही एक छोटी झाड़ी में से पत्तियाँ खा रहे ऊँट की गर्दन पर टूट पड़ा । ज्यों ही ऊँट ने गरदन ऊँची उठाई, गीदड़ ज़मीन से आठ फुट ऊँचा उठ गया । गीदड़ी ने डर कर कहा- हे हठीले! शिकार करने का हठ छोड़ दे । तो गीदड़ ने एक दोहा कहा-
सुंदर का बोल मेरे मन भावे ।
पर धरती पर पैर मंडण नहीं पावे ॥

अर्थात हे सुन्दरी ! मुझे तुम्हारी बात अच्छी लगती है पर क्या करूँ मेरे पैर ही धरती पर नहीं टिक पा रहे हैं ।

यदि आप वास्तव में ही पाकिस्तान में लोकतंत्र को बचाना और मज़बूत करना चाहते हैं तो नवाज़ के साथ मिलकर
ईमानदारी से काम करिए । शुरू में इन आतंकवादियों को पालने वाला अमरीका ही है पर अब अपनी फटी में ही सही, मदद करने के लिए तैयार है सो अच्छा मौका है पाकिस्तान को कट्टरपंथियों से मुक्त कराने का । इतिहास में नाम दर्ज करवाने के मौके बहुत ही कम लोगों के जीवन में आते हैं । अब मौका है हिम्मत करने का वरना इतिहास का कूड़ेदान बहुत बड़ा है उसमें आप जैसे जाने कितने पड़े होंगे ।

आपका शुभचिंतक ,
रमेश जोशी

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४ दिसम्बर २००८



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Jhootha Sach

Dec 4, 2008

चिदंबरम का मार्ग-दर्शन और गृह मंत्री की भाषा




चिदंबरम जी ,
वणक्कम । आप गृह मंत्री बन गए । दुविधा में हैं कि आपको बधाई दें या संवेदना प्रकट करें ? वित्त मंत्रालय अच्छा था । आराम से वातानुकूलित संसद में चार घंटे अंग्रेज़ी में सुन्दरकाण्ड का पाठ कर दिया और पाँच साल की छुट्टी । आधे से ज़्यादा सांसदों को अंग्रेजी समझ में नहीं आती । जिनको टेक्स चोरी करनी है उनकी सेवा में अंग्रेज़ी जानने वाले चार्टर्ड अकौन्टेन्ट मौजूद हैं और जो टेक्स से बच नहीं सकते उन्हें समझ कर करना ही क्या है ।

अब यह गृह मंत्रालय मिल गया । बड़ा सूगला विभाग है । जब शान्ति हो तो कोई धन्यवाद नहीं देता पर जब कोई दुष्ट चुपके से कहीं कुछ कर जाता है तो गृहमंत्री की गर्दन पकड़ो । चाय की रहदी लगाने वाला भी इस्तीफा माँगने लग जाता है । वित्त मंत्रालय में तो आराम से गाड़ी पर बैठे, कान में कलम घुसेड़े करते रहो कागज़ काले । सेंसेक्स, मुद्रास्फीति, रिसेशन, मेल्ट-डाउन किसी के समझ में नहीं आता तो बोलेगा कौन? खैर! अपने गृह मंत्री बनते ही अपने वक्तव्य में सबसे सहायता की अपेक्षा की थी सो हम आपकी सहायता के लिए ही यह पत्र लिख रहे हैं ।

वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय या किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में तो केवल अच्छी अंग्रेज़ी जानने मात्र से ही नौकरी और पदोन्नति मिल सकती पर इस भारत में हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों जाने बिना न तो प्रधान मंत्री और न ही गृह मंत्री मंत्री के रूप में सफल हुआ जा सकता है । अगर देवीलालजी अंग्रेज़ी जानते होते या देवेगौड़ा जी हिन्दी जानते होते तो टर्म पूरा कर जाते । आप तमिल और अंग्रेजी तो बढ़िया जानते हैं , हिंदी भी थोड़ी-थोड़ी समझ लेते हैं पर गृहमंत्री के लायक नहीं । अगर ग़लत सन्दर्भ में नानी याद दिला दी तो लोग और सब बातें छोड़ कर केवल भाषा की टाँग तोड़ने लग जायेंगे ।

गृह मंत्रालय के अन्दर में मुख्य रूप से पुलिस आती है और पुलिस की भाषा सबसे अलग होती है । पुलिस की भाषा किसी स्कूल में नहीं सीखी जा सकती है यह तो पुलिस और आम जनता के बीच सार्थक संवाद में चौकियों और थानों में विकसित होती है । इसे सीखने के लिए आपको ८ पी.एम. के बाद किसी पुलिस चौकी के पिछवाड़े छुप कर खड़े होना होगा । पर सावधान रहिएगा कि कहीं आम आदमी समझ कर कोई कानून का रखवाला आपका स्टेटमेंट न ले ले ।

गृह मंत्री खैर ! मंच पर तो पुलिस वाली संसदीय भाषा नहीं बोल सकता पर यह तो तय है कि उसका काम वित्तमंत्री वाली भाषा से भी नहीं चल सकता । और मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल वाली भाषा से तो बिल्कुल भी नहीं । इनकी भाषा इतनी करुण होती है कि सुनकर आदमी का दिल मेल्ट डाउन हो जाए और बन्दूक चलाने की बजाय अपना सर पीटने लग जाए पर क्या किया जाए आतंकवादियों के दिल होता ही नहीं । सो हम गृह मंत्री के लिए उपयुक्त हिन्दी भाषण के बारे में आपको कुछ जानकारी देना चाहते हैं ।

संकट के समय गृह मंत्री को माइक सामने होते हुए भी चिल्ला-चिल्ला कर बोलना चाहिए भले ही आवाज़ फट जाए या मुँह से झाग नकलने लग जायें । आपको धीरे-धीरे स्टाइल वाली अंग्रेजी बोलने की आदत है , पर चिल्लाते-चिल्लाते अभ्यास हो जाएगा जैसे माँगते-माँगते आदमी एक अच्छा फकीर हो जाता है । प्रत्येक भाषा में कुछ शब्द और मुहावरे ऐसे हटे हैं जिन से जोश, बहादुरी और दृढ़ता टपकती है । इनका बीच-बीच में प्रयोग करने से सुनने वालों को लगता है कि बन्दा ज़रूर कुछ न कुछ करेगा । जैसे ईंट से ईंट बजा देंगे, नानी याद दिला देंगे, नाकों चने चबवा देंगे, धूल चटा देंगे, दाँत खट्टे कर देंगे, छठी का दूध याद करा देंगे, खून की नदियाँ बहा देंगे, मर जायेंगे, मिट जायेंगे आदि-आदि ।

यदि अंग्रेजी बोलनी ही तो 'नो स्टोन अन टर्न्ड' जैसे मुहावरों का ही प्रयोग करें । अंग्रेजी का छौंक लगाने से हिन्दी का स्वाद और बढ़ जाता है । बीच-बीच में 'भारत माता की जय' चिल्लाते रहना चाहिए । यदि वोट बैंक को खतरा नहीं हो तो 'वन्दे मातरम' भी चिल्लाया जा सकता है ।

आप सोच रहेंगे होंगे कि क्या इस तरह भाषण देने या चिल्लाने से आतंकवादी डरकर भाग जायेंगे या आने का साहस नहीं करेंगे । ऐसी बात नहीं है । पर हाँ, इससे जनता का गुस्सा निकल जाएगा । मनोवैज्ञानिकों का मत है कि चिल्लाने से हीन भावना दूर होती है । वैसे जनता कब तक निराश और हताश रह सकती है । आखिर तो झख मार कर पेट के लिए दिहाड़ी पर जाना ही पड़ेगा । थोड़े दिनों में भूल जायेगी । बस अगले चुनावों तक माहौल बनाकर रखिये । और अगर अगले बरस जनता ने पाटिया पलट ही दिया फिर अडवानी जी जानें या तोगडिया जी जानें या आतंकवादी जी जानें ।

आपका शुभचिंतक,
रमेश जोशी

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२ दिसम्बर २००८




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Jhootha Sach

Dec 1, 2008

अब तो पड़ गयी ठण्ड ? पाटिल का इस्तीफा



गृह मंत्री का पद क्या हो गया, आफ़त हो गई । घर में एक मंत्री होती है घर वाली । सब उस पर सवार । चाय अभी तक क्यों नहीं बनी, क्या झाड़ू लगाती हो, यहाँ कूड़ा पड़ा है, दाल में नमक ज़्यादा क्यों पड़ गया, बच्चा क्यों रो रहा है, मेरे मोजे कहाँ हैं, चुन्नू आज लंच-बोक्स भूल गया । गृहिणी एक और प्राण खाने वाले हज़ार । सास, ननद, ससुर, देवर, पति सबके अपने-अपने नखरे । अगर यही अपना चंडी वाला रूप दिखा दे तो सबकी जूँएं सो जायें । पाटिल बेचारे भले आदमी । किसी की जेब कट गई तो पाटिल की गलती, लल्लू की मुर्गी कल्लू का कुत्ता ले भगा तो पाटिल पर गुस्सा, किसी के घर में मच्छर घुस गया तो पाटिल को पकड़ो, किसी की दाल में मक्खी गिर गई तो पाटिल की लापरवाही । गृह मंत्री क्या बन गए सारे देश के गुलाम हो गए! अरे इतना बड़ा देश, हजारों किलोमीटर की स्थल और जल सीमा, रखवाली करने वाला एक आदमी और घुसने वाले अरबों लोग । लोगों को ख़ुद को तो अपने दो बच्चों की पूरी सी ख़बर नहीं रहती कि होम वर्क किया नहीं, स्कूल का नाम लेकर होटल में दारू तो नहीं पी रहा । करोड़ों बंगालादेसी आ घुसे तो क्या अकेले पाटिल के ही टाइम में ही आ घुसे? चालीस साल में और भी तो गृह मंत्री हुए है । पर ठीकरा पाटिल के सर । जिसे देखो पाटिल पर पिला पड़ रहा है ।

और आरोपों का आधार देखिये? बन्दे के सूट । उनका समयानुकूल साफ-सुथरे कपड़े पहनना । जिनके पास एक निक्कर और कमीज़ के अलावा और कुछ नहीं वे भुने जा रहे हैं । पाटिल दिन में तीन-तीन सूट बदलते हैं । अरे भाई जब हैं तो क्या ट्रंक में बंद करके रखने के लिए हैं क्या? क्या चड्डी-बनियान पहने ही किसी जेबकतरे के पीछे भाग लें? तब इनकी आत्मा को शान्ति मिलेगी । विष्णुजी के पास तो एरिया कम था । एक हाथी को बचाने के लिए नंगे पाँव दौड़ पड़े तो उसके चर्चे आज तक गाये जा रहे हैं । अगर पूरे भारत का चार्ज दे दिया जाए तो पता चले । फिल्मों में एक नाचने वाली तीन मिनट में तीस ड्रेसें बदल लेती है तो किसी को कोई एतराज़ नहीं । ये तो चाहते हैं कि गृह मंत्री पाँच साल तक न तो नहाये, न कपड़े बदले, न बाल ठीक करे । हो सकता है आतंकवादी गृह मंत्री के पसीने की बदबू से भागते हों ।

इन आम आदमियों को क्या पता कि कपड़े अवसर के अनुकूल पहनने चाहियें । अगर मान लीजिये पहन रखा है हरा सूट और जाने की ज़रूरत पड़ गयी गमी में तो सोचिये क्या अच्छा लगेगा? मौका देखना पड़ता है उसके अनुसार रंग चुनना पड़ता है । भले मरने वाले को लोग जला कर आ जायें और आप काला या सफ़ेद सूट खोजते रह जायें, कोई बात नहीं । डेकोरम भी तो कोई चीज़ होती है । पत्रकारों से क्या लालू जी की तरह लुंगी में ही मिललें?

भगवान की कृपा से मंत्री बन गए तो कपड़े पहनने का मौका मिला है वरना तो वकील थे तो वही काला कोट, सरदी, गरमी बरसात सभी मौसमों में । लोग समझते है कि भाडू (वकील) के पास एक ही कोट है । और ये मंत्री कोई ज़बरदस्ती बन गए क्या? बना दिया तो बन गए, हटा दिया तो हट गए । 'लायी हयात आए, कजा ले चली चले । न अपनी खुशी से आये, न अपनी खुशी चले ।' अब किसी और को बनाया तो वह बन गया । अब आप सोचते होंगे कि नया गृह मंत्री चड्डी बनियान और जूते पहन कर खड़ा रहेगा और सीटी बजाते ही दौड़ पड़ेगा । यह हो सकता है कि ये पेंट पहनते और वह लुंगी बाँधेगा पर थोड़ा बहुत टाइम तो उसमे भी लगेगा ही । लुंगी में दौड़ना थोड़ा मुश्किल तो होता ।

वैस हमें तो इस बात पर आश्चर्य है कि जब लोगों को आतंकवाद समाप्त करने इतना सरल उपाय मालूम था तो समय रहते बताया क्यों नहीं? पाटिल को हटा देते, मुम्बई पर हमला होता ही नहीं । अच्छा हो, पाटिल को हटवाने वाले ख़ुद ही गृहमंत्री बन जायें और दो चार दिन में हटा दें आतंकवाद को । हम उसके नाम की सिफ़ारिश कर देंगें । पर फिर भी न मिटा तो?

पंडित होने के नाते हम पाटिल साहब को ग्रह शान्ति का एक नुस्खा बताते हैं- वे अपने उन काले, सफ़ेद और हरे रंग वाले कुख्यात सूटों को किसी विपक्षी पार्टी वाले या पत्रकार को दान में दे दें और हर मंगलवार को ब्रह्म मुहूर्त में कच्छा बनियान पहन कर नंगे पैर कनाट प्लेस वाले हनुमान जी के दर्शन करने जाएँ । अवश्य दिन फिरेंगे । रही बात चिदंबरम की तो उनके पास तो सीधा सा उपाय है कि आतंकवादियों के आयात पर इतना टेक्स लगा देंगे कि बच्चू को लाख बार सोचना पड़ेगा कि आतंकवाद के धंधे में रहूँ या कोई और धंधा करूँ?

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१ दिसम्बर २००८




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Jhootha Sach

डरता कौन है - ईश्वर या ठेकेदार ?



१९६५ में मेकार्टनी नामक बीटल गायक के इजराइल में होने वाले कार्यक्रम पर यह कह कर प्रतिबन्ध लगा दिया गया कि इससे युवकों के भ्रष्ट हो जाने का भय है । लेबनान में रह रहे एक इस्लामी उपदेशक उमर बकरी मोहम्मद ने घोषित कर दिया कि मेकार्टनी सब मुसलमानों का शत्रु है । अक्टूबर २००८ में अमरीका में न्यूयार्क के मेसेना सेन्ट्रल हाई स्कूल के अभिभावकों ने वहाँ चलने वाली योग कक्षाओं को यह कह कर बंद करवा दिया कि उनके अनुसार इससे उनके बच्चों को हिंदू कर्म कांडों में दीक्षित किया जा रहा है । अभी नवम्बर २००८ में मलेशिया में एक इस्लामी संगठन ने योग करने पर यह कह कर फतवा ज़ारी कर दिया कि यह प्राचीन व्यायाम वर्जित है और इस्लाम के अनुसार हराम है । उनकी राय में योग करने से लोगों का इस्लाम में विश्वास ख़त्म हो जाएगा ।

इस विचार पर तो शायद संसार के सारे धर्म एकमत हैं कि ईश्वर एक है । जब ईश्वर एक है तो वह सनातन धर्म, यहूदी, बौद्ध, जैन, ईसाई और इस्लाम धर्म से पहले भी एक ही था और भविष्य में भी एक ही रहेगा । इन धर्मों के उदय से पूर्व भी, उन क्षेत्रों में जहाँ इन धर्मों का जन्म हुआ, कोई न कोई धर्म प्रचलित रहा होगा और नए धर्म के अनुयायी पूर्व में किसी अन्य धर्म के अनुयायी रहे होंगे । जब ये धर्म पुराने धर्म के स्थान पर नए धर्म की स्थापना कर सकते हैं तो फिर धर्मों में परिवर्तन या नए धर्मों के प्रवर्तन की संभावनाएँ हमेशा बनी रहेंगी । अर्थात् न कोई धर्म अन्तिम है और न कोई धर्म अपरिवर्तनीय । इसीलिए तो नए धर्म बनते रहते हैं या पुराने धर्मों में विभाजन होते हैं और होते रहेंगे । किसी को किसी भी धर्म में ज़बरदस्ती बाँधे रखना या अपने विश्वास के अनुसार ईश्वर की कल्पना व आराधना से वंचित करना उचित नहीं है । यही धार्मिक स्वतंत्रता है । इसी शाश्वत सत्य को ध्यान में रखकर गाँधी जी के कहा था कि संसार में जितने मनुष्य हैं उतने ही धर्म हैं । इसीलिए गाँधी जी किसी के भी धर्म परिवर्तन करने या करवाने के ख़िलाफ़ थे ।

यहाँ यह उल्लेख करना ग़लत नहीं होगा कि एक पाकिस्तानी जर्मनी चला गया वहाँ वह ईसाई बन गया । जब वह लौट कर पाकिस्तान आया तो उसे बताया गया कि यदि वह पाकिस्तान में जीवित रहना चाहता है तो उसे इस्लाम में वापिस आना पड़ेगा । इसके बाद जर्मनी ने हस्तक्षेप किया तो वह किसी तरह वापिस जर्मनी जा सका । अपने धर्म के एक आदमी के लिए इतनी हायतौबा । ध्यान रहे कि भारत में मुसलमानों या यूरोपियन के आने से पहले एक भी ईसाई या मुसलमान नहीं था । सबको भय या लालच से धर्म परिवर्तन करवाया गया । अभी दो दिन पहले ही जापान के उन १८८ लोगों को रोमन केथोलिक चर्च ने संत का दर्जा दिया है जिन्होंने १६०३ से १६३९ के बीच धर्म छोड़ने की बजाय मौत की सज़ा को पसंद किया । नागासाकी में पॉप बेनेडिक्ट १६ वें की तरफ़ से होज़े सारिवा मार्टिन ने ब्लेसिंग की रस्म अदा की । यदि धर्म इतना ही महत्वपूर्ण है तो फिर सेवा के बहाने संसार के दूरस्थ आदिवासी इलाकों में जाकर भोले-भले आदिवासियों का ज़रा सी सेवा के बदले धर्म परिवर्तन करवाने की क्या ज़रूरत है । क्या धर्म बदलवाए बिना सेवा नहीं की जा सकती? बड़ा क्रूर और महँगा सौदा है । यह सेवा नहीं बल्कि धर्म, धन और राजनीति का कुटिल षडयंत्र है । जब कहीं भी थोड़ा सा भी विरोध होता है तो मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की दुहाई दी जाती है । यह धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ में धर्म परिवर्तन करवाने की चाल है । धर्म बदलने से ही अगर कल्याण होना होता तो आज अफ्रीकी ईसाई भूखे क्यों मर रहे हैं? स्वतंत्रता के काबे अमरीका में ईसाई ओबामा में अफ्रीकी मूल दीखने लगा । मतलब कि ईसाई बनकर भी ओबामा पूरी तरह अपना नहीं बन पाया ।

ईश्वर को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई उसे पूजता है या नहीं या कैसे पूजता है । ईश्वर और व्यक्ति का रिश्ता नितांत व्यक्तिगत है । उनके बीच में कोई तीसरी शक्ति नहीं है और न उनके बीच में किसी को टाँग फँसाने का अधिकार है । आज सारे संसार में स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की बात होती है पर कोई भी शक्ति चाहे वह राजनीति हो या धर्म, उसे मुक्त नहीं होने देना चाहती क्योंकि अपने अनुयायियों के बल पर ही वे अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए शक्ति प्राप्त करते हैं । धर्म से लाभ कमाने वाले ये लोग आदमी और भगवान के बीच एजेंट, दलाल, गेटकीपर या दादा बने हुए हैं । धर्म के नाम पे कोई भी अनुचित काम कर और करवा सकते हैं । ये ही कभी तलवार और कभी सेवा का स्वांग लेकर दूसरे धर्म की भेड़ों के गले में अपना पट्टा बाँधने के लिए निकलते हैं । उन्हें मानव के कल्याण और स्वतंत्रता की कोई चिंता नहीं है । तहाँ तक कि अपने धर्मानुयायियों का कल्याण भी उनका लक्ष्य नहीं है । उन्हें भी वे भय, अज्ञान, लोभ-किसी भी प्रकार अपने पीछे खड़े रखना चाहते हैं क्योंकि इन्हीं के तन, मन और धन के बल पर इनके ठाठ कायम हैं । धर्म एक नितांत व्यक्तिगत भाव, आस्था, शान्ति प्राप्त करने का विधान है । जब व्यक्ति समाज में आता है तो समाज का भला, अपने साथ समाज का विकास अनुशासन, व्यवस्था ही उससे अपेक्षित हैं । इसलिए समाज में सबके लिए समान नियम, कानून होनें चाहियें जिससे सबको मानव होने के नाते समानता का अनुभव हो ।

सच्चा धर्म व्यक्ति और समष्टि के सामंजस्य का विधान है । व्यष्टि समष्टि से अलग नहीं है । दोनों एक दूसरे से पुष्टि प्राप्त करते हैं । ऐसे धर्म का किसी नाम, जाती, नस्ल, भाषा, खान-पान, पूजा पद्धति से कोई संघर्ष नहीं है । संघर्ष तो धर्म की ठेकेदारी करके शक्ति-संचय और स्वार्थ सिद्धि करने वाले भड़काते हैं । सामान्य व्यक्ति तो अपनी मेहनत करके, शान्ति से दो रोटी खाकर, परिवार-पड़ोस में सुख-दुःख बाँटकर खुश है । वह मन से न कट्टर है और न स्वार्थी । उसका तो धर्म के स्वार्थी ठेकेदार डराकर, बहकाकर दुरुपयोग करते हैं । सामान्य जीवन में तो संकट के समय, दंगों के दौरान हिंदू-मुसलमान अपनी जान पर खेल कर एक दूसरे की जान बचाते हैं ।

किसी व्यक्ति धर्म, पूजा-पद्धति, पूजा-स्थल, आस्था, गाने, बजाने, पहनावे अदि से भगवान को न तो कोई फ़र्क पड़ता है और न उसे कोई डर लगता है । डर तो धर्म का धंधा करने वालों को लगता है । इसलिए वे अपने धर्म वालों को भड़का कर अपनी रक्षा करते हैं । इसमें सहायक होते हैं धर्म के शक्ति केन्द्रों के धन से पलने वाले गुंडे जो जघन्य से जघन्य अपराध कर सकते हैं । ये ही लालच या भय से धर्मपरिवर्तन करवाते और लड़वाते हैं ।

मानव की सच्ची स्वतंत्रता का समर्थक कोई कबीर ही हिन्दू और मुसलमान दोनों को उनकी कमियों के लिए डाँट सकता है, गांधी ही ईश्वर अल्लाह तेरे नाम गा सकता है,कोई सच्चा शायर ही कह सकता है-
भगवान भी उर्दू समझता है ।
अल्लाह भी हिन्दी जानता है ।

नहीं तो लोग नोट और वोट के लिए लोगों के घर, मन्दिर, मस्जिद और चर्च फूँकने के लिए घूम ही रहे हैं ।

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