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Feb 9, 2010

वेलेंटाइन डे उर्फ़ वेल हटाइन डे

मिस्टर सार्कोजी
बधाई हो । आपने जून २००९ में कहा था- फ़्रांस में बुर्का स्वागत योग्य नहीं है । इसके बाद १३ नवम्बर २००९ को 'फ़्रांस की राष्ट्रीय पहचान' पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि फ़्रांस में सिर और बदन ढँकने वाले परिधान बुर्के के लिए कोई जगह नहीं है । फिर जनवरी २०१० के प्रथम सप्ताह में कहा कि बुर्का पहनने पर सात सौ पोंड का और बुर्का पहनने के लिए बाध्य करने वाले पर दुगुना जुर्माना लगाया जायेगा । इसके बाद संसद ने आपके इस प्रस्ताव का समर्थन भी कर दिया । मतलब कि आप एक निश्चित योजना के अनुसार बढ़ रहे हैं । वैसे अपनी किसी भी योजना को राष्ट्रहित और किसी बड़े आदर्श से जोड़ देना चाहिए । जब ज़मीन घेरनी हो तो उस पर कोई धार्मिक स्थान बनाना चाहिये । किसी दूसरे धर्म वाले से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालनी हो तो अपने धर्म की बेइज़्ज़ती का मुद्दा बनाना चाहिए । यदि चुनाव में खड़े होना है और अपने कर्मों पर विश्वास नहीं है तो जाति के उद्धार की बात करनी चाहिए । सो आपने भी बुर्के को हटवाने के लिए फ़्रांस की पहचान को मुद्दा बनाया । फ़्रांस की पहचान की चिंता आप नही करेंगे तो क्या तोगड़िया जी करेंगे ? हमारी बात और है, हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता पहले बुश करते थे अब ओबामा कर रहे हैं ।

वैसे जहाँ तक सिर और पूरा शरीर ढँकने वाले कपड़े पहनने की बात है तो सारे संसार में ही औरतें और मर्द सभी सिर ढकते ही थे । आज भी पोप और नन्स का पहनावा इस का प्रमाण है । अन्य सम्प्रदायों में भी धार्मिक अधिकारी सिर ढकते ही हैं । जिसे किसी भी प्रकार काबिले-ऐतराज़ नहीं माना जाता । पर चूंकि अब देश की पहचान का सवाल आ गया तो फिर कोई समझौता नहीं न हो सकता ।

वैसे हमारे गाँधीजी तो कहा करते थे कि जब भी सांप्रदायिक चिह्न समाज में भेद-भाव फैलाने का काम करने लग जाएँ तब वे त्याज्य हो जाते हैं । वे स्वयं धर्म का कोई चिन्ह धारण नहीं करते थे । मज़े कि बात देखिये कि आज जितना सांप्रदायिक उत्पात दुनिया में कभी नहीं था और आज ही दुनिया इन तथाकथित पहचानों के चक्कर में सबसे ज्यादा है । इसका कारण कहीं से भी धार्मिक नहीं है बल्कि आर्थिक और राजनीतिक है । आज धर्म के द्वारा ही चंदा मिलता है और कहीं न कहीं सत्ता की राह भी इसी के थ्रू खुलती है । पहले तो पोप का दर्ज़ा राजा से भी बड़ा था । कट्टर देशों में आज भी राजा इन लोगों को संतुष्ट रखने में ही भलाई समझता है । इनके ठाठ और ठेकों की जाँच कोई नहीं करता । दुनिया में लाखों करोड़ डालर, पोण्ड और दीनारों का धंधा है यह । मुफ़्त का ठाठ ऐसे ही थोड़े छोड़ सकता है कोई ।

तो हमें विश्वास है कि आप फ़्रांस की पहचान को बचाने वाले इस 'वेल हटाइन ' कार्यक्रम में अवश्य सफल होंगे । 'वेल हटाइन' आप समझ ही गए होंगे । 'वेल' मतलब कि पर्दा और 'हटाइन' मतलब कि हटाना अर्थात् 'पर्दा हटाना' । अगर फ़्रांस में बुरके को ग़ैर कानूनी घोषित करना हो तो उसके लिए 'वेलेंटाइन डे' उर्फ़ 'वेल हटाइन डे' को ही चुनियेगा । हमारे अनुसार तो वेलेंटाइन डे का त्यौहार भी सभी प्रकार के 'वेल' अर्थात् 'पर्दे' हटाने का दिन है ।

हमारे यहाँ तो बेचारा नायक चिल्लाता ही रह जाता है कि- 'ये पर्दा हटा दो, ज़रा ज़लवा दिखा दो' । और नायिका है कि उससे भी ज़ोर की आवाज़ में चिल्लाती है- 'पर्दे में रहने दो, पर्दा ना उठाओ । परदा जो उठ गया तो भेद खुल जायेगा' । गाने तो दोनों अभी तक सुन रहे हैं । पर अभी तक यह दावे से नहीं कह सकते कि पर्दा उठा या नहीं । यदि परदा उठ गया तो उठने पर भेद खुला या नहीं ? यदि खुल गया तो वह कौन सा भेद था ? हमारे हिसाब से तो सबके वही दो हाथ-पैर, दो आँखें, एक नाक दो कान होते हैं । पता नहीं, नायिका कौन सा भेद छुपाना चाहती है और नायक पर्दा हटवाकर कौन सा ज़लवा देखना चाहता है ।

पर अब तो हमारे यहाँ भी लड़कियाँ छोटे से निक्कर और छोटी सी बिना बाँहों की कमीज़ में नज़र आने लगी हैं । हमारे यहाँ बुर्का और घूँघट अभी भी हैं पर बिना किसी कानून के ही धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं । आपकी तरह कानून बनाने की मज़बूरी नहीं आई । आपकी फ़्रांस की पहचान की बात हम बाद में करेंगे पर अभी तो पर्दा हटाओ अभियान पर ही ध्यान केन्द्रित करें । सो आप बुर्का पहनने जैसी आपराधिक गतिविधि को रोकने के लिए कानून बनाने में ज़ल्दी करें और इस वेलेन्टाइन डे को यह कानून लागू कर ही दें । इस वेलेन्टाइन डे से बुर्का पहनने के अपराध में जो जुर्माना वसूला जाये उसे लँगोटी लगाये, सार्वजनिक रूप से चूमा-चाटी करते, फ़्रांस की पहचान को बचाए रखने वाले जोड़ों को पुरस्कार स्वरूप दे दिया जाये जिससे वे ठण्ड से बचने के लिए दारू खरीद सकें और ठण्ड लग जाने पर जुकाम की दवा का प्रबंध कर सकें क्योंकि हमारे यहाँ तो अभी ठण्ड जम कर पड़ रही है । आपके फ़्रांस में तो और भी ज्यादा ठण्ड पड़ रही होगी । ऐसे में कम कपड़े पहनने की फ्रेंच-संस्कृति को बचाना बड़े साहस का काम है ।

कुछ लोग कहते हैं कि जब से अमरीका में आतंकवाद की घटना हुई है तब से सारे गोरे देश इस्लाम से बहुत डरने लग गए हैं । इस्लाम के प्रतीकों में भी उन्हें व्यापक विनाश के हथियार नज़र आने लगे हैं । सभी गोरे देशों ने अफ्रीका और एशिया के देशों पर राज किया और वहाँ के कच्चे माल के साथ-साथ वहाँ के लोगों को भी सस्ती मज़दूरी के लिए ले आये । उस समय किसी को भी न तो उनके रीति-रिवाजों, धार्मिक-स्थानों और पहनावे से डर लगा और न ही उनके काले बुर्के से । अब हालत यह है कि डेनमार्क में मस्ज़िदों की मीनारों से भी डर लगने लगा है । जब अमरीकी काले लोगों को मज़दूरी करवाने के लिए गुलाम बना कर ले गए थे तब वे बोझा नहीं थे मगर अब 'व्हाइट मैन्स बर्डन' बन गए हैं । पर हम इस बात से सहमत नहीं हैं । आप तो फ़्रांस की संस्कृति और मूल्यों की रक्षा के लिए यह पर्दा हटवाने की कोशिश कर रहे हैं ।

कुछ लोग परदे को भी संस्कृति से जोड़ देते हैं । हमारे यहाँ तो शादी के बाद पत्नी पति तक को भी तब तक अपना मुँह नहीं दिखाती जब तक वह उसे मुँह दिखाई नहीं दे देता । अन्य औरतें भी जब नई दुल्हन का मुँह देखना चाहती हैं तो उन्हें भी मुँह-दिखाई का नेग देना पड़ता है । हालाँकि हमारे यहाँ तो पुरानी औरतों को तो ऐसा अभ्यास हो गया है कि वे घूँघट निकाल कर भी सारे काम आसानी से कर लेती हैं । आजकल कई महिलाएँ घूँघट निकाल कर सरपंची तक कर रही हैं । कई साहसी महिलाएँ तो घूँघट निकाल कर आपने ससुर तक से लड़ भी लेती हैं । इस प्रकार अपनी संस्कृति की रक्षा भी कर लेती हैं और अपने सशक्तीकरण का भी प्रमाण दे देती हैं । फिर भी आजकल कोई भी पर्दा प्रथा का समर्थन नहीं करता । शर्म तो आँखों की होती है । बेशर्म परदे में भी सभी खुराफातें कर जाती है और शर्म वाली खुले मुँह भी गलत काम नहीं करती ।

घूँघट अर्थात् पर्दे के कुछ फायदे भी हैं । झीने घूँघट में सारी कमियाँ छुप जाती हैं । पहले, दिन में तो पत्नी का मुँह देखने का अवसर ही नहीं मिलता था । रात तो अवसर मिलता था तो लगता था कि आज ही पहली बार मिल रहे हैं । ज़िंदगी भर आकर्षण बना रहता है । तभी हमारे यहाँ एक गीत है- 'थारै घूँघटिये मैं सोळा सूरज ऊग्या ए मरवण' । पहले यह सब चलता था पर अब तो एक सूरज से ही ग्लोबल वार्मिंग का खतरा हो गया है । सोलह को कौन बर्दाश्त करेगा । सौंदर्य पूरा ही एक साथ दिख जाये तो उसका आकर्षण ख़त्म हो जाता है । तभी अंग्रेजी में भी तो कहा गया है- हाफ कंसील्ड एंड हाफ रिवील्ड । कभी आधे घूँघट में से, एक आँख से झाँकती नायिका का चित्र देखा है ? आपके योरप में पूरा चेहरा ही क्या सारा शरीर ही सारे दिन दिखता रहता है । चोली और चड्डी बस इतनी सी रहती है कि कानूनी रूप से गुप्त अंग न दिखें । वैसे कोशिश यही रहती है कि सब कुछ पारदर्शी हो जाये । राजनीति और अर्थ व्यवस्था में जहाँ पारदर्शिता होनी चाहिए वहाँ तो हज़ार चोरी और जहाँ थोड़ी बहुत लाज-शर्म होनी चाहिए वहाँ कोई सीमा नहीं । हमें लगता है कि यह जो एक दो सेंटीमीटर कपड़ा बचा है वह भी ज़ल्दी ही गायब हो जायेगा । ऐसी संस्कृति की यही परिणति होनी है । तब शायद बाज़ार तन ढँकने के धंधे से कमाई करने की रणनीति बनाएगा ।

वैसे घूँघट के नुकसान भी हैं । एक फिल्म आई थी- घूँघट, जिसमें घूँघट के चक्कर में दुल्हिनें ही बदल गई थीं । यदि घूँघट या पर्दा होता तो आप कार्ला ब्रूनी का सौंदर्य और उसकी फिगर कैसे देख पाते ? और कैसे यह महा-मिलन हो पाता ? हो सकता है कि आपको अपनी पहली दोनों पत्नियों को इतनी पारदर्शिता से देखने का अवसर नहीं मिला हो । आपने उनकी फिगर का अनुमान ३६-२४-३६ का लगाया हो और निकली हो ३४-३२-३५ । अब इतना बड़ा अन्याय कैसे सहा जाये । कोई कह सकता है कि इसमें बच्चों की क्या गलती । पर बच्चों का क्या । अपना भी तो कोई जीवन होता है । पर अगर कार्ला की फिगर वह नहीं रही तो ? पर कार्ला चतुर है । वह आपको ढीला नहीं छोड़ेगी और 'सी-बीच' पर तो जाने ही नहीं देगी वरना क्या पता वहाँ और कोई माडल दिख जाये ।

फ़्रांस में इस समय केवल १९०० बुरका पहनने वाली बची हैं । वे भी धीरे-धीरे कम हो जायेंगी । पर तब तक क्या पता बुर्के में छुप कर कोई आतंकवादी पुरुष ही आ जाये तो ? वैसे असली मुद्दा बुर्का है भी नहीं, मुद्दा तो आतंकवाद है ।

बहुत हो गया । फिलहाल तो सब कुछ ठीक है । क्यों आपके नए नए वेलेंटाइन में बाधा डालें ।

अच्छा तो 'हैप्पी वेल हटाइन डे' ।

२८-१-२०१०

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Jan 7, 2009

इंडिया की मृत्यु


प्रिय पाठको!
आज हम आपको बहुत दुखी हृदय से यह सूचना दे रहे हैं कि इंडिया की मृत्यु हो गई है । मृत्यु जीवन की अन्तिम परिणति है । जो पैदा हुआ है वह अवश्य मरेगा । पर हमें तो इसी बात का दुःख हैं कि जहाँ उसकी मृत्यु हुई है वहाँ किसी प्रकार के इलाज़ या अन्य सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी । बड़ा लाड-प्यार और सार-संभाल थी फिर भी मृत्यु हो गई । अब हम क्या कर सकते हैं । अब तो बस श्रद्धांजलि ही दी जा सकती है । दो मिनट का मौन ही रखा जा सकता है । इंडिया को दुनिया के सबसे समर्थ व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त था । जब समय बुरा आता है तो समर्थ से समर्थ व्यक्ति पर कोई अदना सा आदमी जूता तक फ़ेंक देता है और लोग तमाशा देख कर रह जाते हैं ।

इंडिया की मृत्यु की सूचना हमें फॉक्स न्यूज़ से मिली जिसमे व्हाइट हॉउस के लारा बुश के कार्यालय के सेली मेक्डोनो के हवाले से बताया गया कि इंडिया की १८ वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई । तो क्या इंडिया की उमर केवल १८ वर्ष ही थी । अब साहब १८ वर्ष पहले जनम हुआ तो उम्र १८ वर्ष से ज़्यादा कैसे हो सकती है । खुश होने की बात यह है कि इंडिया को लारा बुश ने अपने परिवार के सदस्य के समान बताया है ।

इंडिया को १८ वर्ष होने के कारण वोट का अधिकार भी मिलने वाला था । हो सकता है सुरक्षा परिषद् की सदस्यता भी मिल जाती । अमेरिका चाहे तो क्या नहीं हो सकता । पर क्या किया जाए अब तो इंडिया की मृत्यु ही हो चुकी । आप कहेंगें कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इंडिया मर जाए और हम जिंदा रहें ? ऐसा बहुत बार हुआ है । स्वर्णिम चतुर्भुज के इंजीनीयर पांडे की ठेकेदारों ने हत्या करवा दी और कुछ नहीं हुआ । नेता के जन्म दिन के लिए लाखों का चन्दा नहीं देने पर मनीष गुप्त की हत्या कर दी गई और कुछ नहीं हुआ । ताज़ा उदहारण ही देख लीजिये कि आतंकवादी पाकिस्तान के थे, सारी दुनिया जानती है, पाकिस्तान आँखों-आँखों में हँसता हुआ कह रहा कि आतंकवादी उसके यहाँ के नहीं थे । आगे भी यही कहता रहेगा । आपने सबूत दिए और वह कह रहा है कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं । आगे भी यही कहता रहेगा । दुनिया तमाशा देख रही है । यह मरना नहीं है तो क्या है ?

बने फिरो जगद्गुरु, बने फिरो आर्थिक महाशक्ति ।

अब चलो आपको बता ही देते हैं कि यह इंडिया और कोई नहीं - लारा बुश की प्रिय बिल्ली है जिसको भारत प्रेम के कारण मेडम ने इंडिया नाम दिया था ।

आप में से कुछ ज़्यादा राष्ट्रवादी होने का नाटक करने के कारण कहेंगे कि बिल्ली को इंडिया नाम देने से भारत के सम्मान को ठेस लगी है । अब इसका क्या किया जाए । ऐसा तो होता ही रहता है । अमरीका में तो शिव, गणेश और काली आदि को सेंडिल पर छाप दिया था ।

वैसे बिल्ली, कुत्ते से ज़्यादा निकट होती है मालिक के ।

बिल्ली का नाम इंडिया रखने का किस्सा आज का नहीं बल्कि २४ जुलाई २००१ का है । हमने उस समय अपनी प्रतिक्रिया में दो कुण्डलिया छंद लिखे थे (कुण्डलिया संग्रह 'अपनी-अपनी लंका') जो आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहें हैं ताकि सनद रहे ।

नौकर के होते सदा रामू, भोला नाम ।
भोले शंकर,राम पर ना होते नाराज़ ।
ना होते नाराज़, उड़ेगी काहे खिल्ली ।
कुत्ते से हर तरह श्रेष्ठ होती है बिल्ली ।
जोशी जिनके कुत्ते बन, वे पूँछ हिलाएँ ।
तो उनकी बिल्ली बनकर हम क्यों शरमाएँ ।

बुश की बिल्ली बन गया अगर इंडिया देश ।
तो क्यों होते हो दुखी, क्यों खाते हो तैश ।
क्यों खाते हो तैश, बड़ों के कुत्ते बिल्ली ।
सब सुख भोगें, रहें सदा कलकत्ता, दिल्ली ।
कह जोशी कवि म्याऊँ बोलें उन्हें रिझाएँ ।
तो चूहा क्या, चिकन केन्टकी वाला खाएँ ।

६ जनवरी २००९

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Dec 30, 2008

तोताराम के तर्क: आतंकवाद का अंतुले-सिद्धांत



वैसे तो राजनीति में आने और पद पाने के बाद अंतुले ही क्या, कुत्ता भी जय जैवन्ती गाने लग जाता है, सूअर भी डायरिया होने के डर से बोतलबंद पानी पीने लग जाता है, गधा भी अंगूर छील कर खाने लग जाता है । हम तो अपनी 'आधी और रूखी' में ही खुश हैं पर जब अंतुले ने मुम्बई कांड के बाद संसद में आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कानून बनाए जाने के दौरान १७ दिसम्बर को जो अप्रासंगिक बात निकाली उससे बड़ी कोफ़्त हुई । अगले दिन जैसे ही तोताराम आया, हम चालू हो गए- यह क्या तोताराम, सभ्य समाज में चार आदमियों के बीच बैठा आदमी छींकते समय नाक के आगे रूमाल रख लेता है, उबासी लेते समय मुँह के आगे हाथ कर लेता है, आदमी सड़क की तरफ़ पीठ करके पेशाब करता है, कुत्ता भी सड़क के बीच पेशाब नहीं करता बल्कि एक किनारे कहीं झाडी-कूड़े पर जाकर टाँग उठाता है, खाना खाते समय आदमी सोचता है कि ज़्यादा आवाज़ न हो, भले आदमियों के बीच साला पादने का भी एक सलीका होता है पर इस अंतुले को देखो, अस्सी साल की उमर हो गई पर इतना होश नहीं कि संसद में बैठ कर क्या बोल रहे हैं । सारी दुनिया देख-सुन रही है और ये महाशय कितनी खतरनाक और अनर्गल बात मुँह से निकल गए । अगर उचित-अनुचित का होश नहीं है तो आदमी चुप बैठे, बोलना क्या ज़रूरी है ? कहा भी है, -
बोली एक अमोल है, जो कोई बोले जानि ।
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि ॥

तोताराम मुस्कराया, बोला- मास्टर, यह राजनीति है, इसमें उचित-अनुचित, समय-असमय कुछ नहीं होता । राजनीति में कभी-कभी असम्बद्ध लगने वाली बात भी बड़ी सोची समझी होती है और उसके भी बड़े दूरगामी परिणाम निकलते हैं । यह तो तुझे मालूम ही होगा कि विचार और शब्द कभी नष्ट नहीं होते । वे सृष्टि के सर्वर में ई-मेल की तरह सुरक्षित रहते हैं और कम्प्यूटर खोलते ही प्रकट हो जाते हैं । इसलिए अपने मतलब की बात वक्त-बेवक्त छोड़ते रहना चाहिए । यह राजनीति का 'अंतुले-सिद्धांत' है । अंतुले -सिद्धांत के अनुसार हेमंत करकरे को मरवाने के लिए किसी संघ समर्थक ने उसे ताज होटल की बजाय हॉस्पिटल भिजवा दिया जहाँ आतंकवादियों ने नहीं वरन किसी और (?) ने उसकी हत्या कर दी । इस 'और' का मतलब तो तू समझता ही है । मतलब की करकरे की हत्या के लिए पाकिस्तान से आए आतंकवादी नहीं बल्कि मालेगाँव बम-काण्ड के आरोपी लोग ज़िम्मेदार हैं ।

हमें बड़ी कोफ़्त हुई, कहा- इस अंतुले-सिद्धांत के अनुसार तो हिटलर को बदनाम कराने के लिए यहूदियों ने स्वयं को गैस चेम्बरों में बंद करके आत्महत्या करली, बुश ने आतंकवाद से लड़ने के बहाने दो टर्म तक अपनी कुर्सी पक्की करने के लिए ख़ुद ही ९/११ वाली घटना करवा दी, हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए नरेन्द्र मोदी ने स्वयं ही गोधरा कांड करवा दिया और कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने लिए मुसलमानों को मरवा दिया, भा.जा.पा. ने चुनावी मुद्दा खड़ा करने के लिए मुम्बई-कांड करवा दिया । छी, क्या घटिया सोच-विचार है!

तोताराम बोला- सौ प्रतिशत इसी तरह न हो तो भी राजनीति हमेशा अपना ही हित देखती है । कौए की दृष्टि हमेशा गंदगी पर ही रहती है । मुम्बई कांड से ज़्यादा लोग तो रोजाना भूख से मर जाते होंगे । बात जनता का मरना नहीं है, जनता तो मरती ही रहती है । जनता को तो मरना ही है । आतंकवादी नहीं मारेंगें तो किसी नेता के जन्म-दिन के लिए फंड जुटाने वाले कार्यकर्ता मारेंगे । अब चाहे अंतुले माफी माँग लें पर उनके सिद्धांत ने चुनाव से पहले संकेत तो भेज ही दिया अपने वोट बैंक के पास । शक के कीटाणु एक बार दिमाग में घुसने के बाद कभी समाप्त नहीं होते ।

याद रख बन्दर कितना ही बूढ़ा हो जाए गुलाटी मारना कभी भूलता । यह कुत्ते वाली पूँछ है । कहा भी है, 'राखो मेलि कपूर में हींग न होए सुगंध ।'

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२७ दिसम्बर २००८



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Dec 26, 2008

मौलाना संत और राष्ट्र-धर्म-हीन आतंक



मौलाना मसूद अज़हर,
बिना आदाब के ही बात शुरू कर रहे हैं । आदाब की ज़रूरत ही नहीं । आप तो बिना आदाब के ही दाब लेते हैं । उर्दू-हिन्दी शब्दकोश देखकर पत्र लिख रहे हैं क्योंकि आप ठहरे मौलाना । पता नहीं किस गलती की क्या सज़ा दे दें । हमें शब्दकोश में अज़हर और मसूद के मायने नहीं मिले, पता नहीं कैसे शब्दकोश हैं । नेपोलियन को भी अपने शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं मिला था । हाँ, मौलाना का अर्थ ज़रूर मिल गया - वह व्यक्ति जिसे आलिम लोगों ने उसकी योग्यता देखकर मौलाना की उपाधि दी हो । मतलब कि यह एक मानद उपाधि है । सच्ची उपाधि तो मानद ही होती है । विश्वविद्यालय की पी.एच.डी. तो कोई भी दस बीस हज़ार में लिखवा लेता है । अभिनव बिंद्रा को केवल दस मीटर दूर से निशाना लगाने पर ही मद्रास विश्वविद्यालय ने पी.एच.डी. की मानद डिग्री दे दी फिर आप तो पाकिस्तान में बैठकर दिल्ली में निशाना लगा देते हैं आपको तो एक साथ दस-पाँच डी.लिट मिल जानी चाहियें थीं । मौलाना का एक अर्थ और मिला- दुखदायी । पर आप जैसे धर्म-प्राण व्यक्ति को 'दुखदायी' कहकर हम अपने प्राणों को संकट में नहीं डालना चाहते । धर्म- प्राण के भी दो अर्थ होते हैं- एक वह जो धर्म के लिए अपने प्राण दे दे और एक वह धर्म के लिए दूसरे के प्राण ले ले । प्राण देने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि कहा है- 'शरीरमद्यं खलु धर्म साधनम्' । यदि शरीर ही नहीं रहेगा तो धर्म का क्या खाक पालन करेंगें । इसीलिए आपने अपने शरीर का पर्याप्त ध्यान रखा है । आपके प्यार से पाले पोषे शरीर के कारण ही आपके भक्त आपको 'हाथी का बच्चा' कहते हैं । ईसा, मूसा, बुद्ध, महावीर, कबीर, गाँधी आधी पसली के आदमी थे । तभी आज उन्हें कौन पूछता है । जब कि आपकी चर्चा से अख़बार भरे पड़े हैं । इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि आप, लोगों के द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से मान्यता प्राप्त विद्वान और धर्म-प्राण व्यक्ति हैं ।

आजकल आपके धर्म और राष्ट्रीयता को लेकर कई सवाल उठाये जा रहें हैं । अब इनको कौन समझाये । आप तो पहले ही कह चुके हैं कि आप राष्ट्र की अवधारणा को ही नहीं मानते । फिर आपकी क्या राष्ट्रीयता ? ज़रदारी ने भी आपकी बात का समर्थन ही किया है कि आतंकवादी का कोई देश नहीं होता । अब या तो आपका पाकिस्तान क्या कोई भी देश नहीं हैं और यदि आपका देश पाकिस्तान हैं तो आप आतंकवादी नहीं हैं । सीधा सा गणित हैं । पता नहीं लोग क्यों नहीं समझते । रही बात धर्म की तो उसके लिए भी कह दिया गया है कि सच्चा मुसलमान आतंकवादी नहीँ हो सकता इसलिए या तो आप सच्चे मुसलमान नहीं हैं या फिर आतंकवादी नहीं हैं । आपको सच्चा मुसलमान न मान कर क्या किसी को अपना सिर फुड़वाना है ? इस प्रकार आप सच्चे मुसलमान हैं और आतंकवादी कभी नहीं हो सकते जो आपको आतंकवादी मानते हैं वे धर्म को नहीं जानते ।

अब रहा प्रश्न आपके नज़रबंद होने या जेल में होने या पाकिस्तान में होने का तो इस बारे में पहले कहा गया कि आप जेल में हैं फिर कहा गया कि नज़रबंद हैं और अब कहा जा रहा है कि पता नहीं आप कहां हैं । आप ठहरे सच्चे संत । संत तो सबके होते हैं । हवा का, पानी का, सच्चे संतों का, फकीरों का, खुशबू का कोई घर या ठिकाना होता है क्या ? जब, जहाँ, जिसको आपकी दया की ज़रूरत होती है आप पहुँच जाते हैं । १९९४ से १९९९ तक भारत की जेल की भी शोभा बढ़ा चुके हैं । जब आपको गिरफ्तार किया गया था तो आपके पास ७० हज़ार डालर नक़द मिले थे । हमें तो चालीस साल की नौकरी के बाद भी इतने पैसे नहीं मिले । पर हमने काम भी क्या किया था । बच्चों को दो अक्षर सिखाये थे । आपकी बात अलग है आप ने तो अपने चेलों को अपना लोक और दूसरों का परलोक सुधारना सिखाया है । आपकी और हमारी क्या तुलना ।

आपका दर्शन है कि सारे संसार को इस्लाम के शासन के नीचे लाना । ठीक भी है, जब इस्लाम नहीं था तो सारी दुनिया दुखी थी और जब, जहाँ-जहाँ इस्लाम आ गया वहाँ -वहाँ दुनिया सुखी हो गई । इस लिए सारी दुनिया को सुखी बनने के लिए आपको कुछ भी कर के सारी दुनिया में इस्लाम लाना है । वैसे दो हज़ार साल में सारी दुनिया ईसाई नहीं हो सकी और डेढ़ हज़ार साल में आधी दुनिया भी मुसलमान नहीं हो सकी । हो सकता है आप अब तक के सबसे काबिल मौलाना हुए हों ।

वो क्या कहते हैं कि - कुतिया समझे कि गाड़ी उसके बल पर चलती है ।

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२० दिसम्बर २००८



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Jhootha Sach

Dec 7, 2008

आपके साथ हमारी पूरी सहानुभूति है मियाँ ज़रदारी



मियाँ ज़रदारी,
भगवान आपको सद्बुद्धिप्रदान करे । भले ही लोग आपकी आलोचना करें पर हमें आप से सहानुभूति है । वैसे आप खानदानी जागीरदार और ज़रदार हैं, तभी तो बेनज़ीर ने आपको चुना । जैसे डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी और मास्टर की पत्नी बिना किसी डिग्री के ही मास्टरनी बन जाती है वैसे ही आप भी बिना चुनाव लड़े ही प्रधान मंत्री क्या, प्रधान मंत्री पति बन गए । हमारे यहाँ महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद महिला सरपंच चुनी जाने लगी हैं और उनका सारा काम उनके पति महोदय चलाते हैं, सील और लेटर पेड उन्ही की जेब में होते हैं । यहाँ तक कि वे सरपंच पति के नाम से जाने भी जाते हैं । नेतागिरी करते घूमते रहते हैं । आपने भी प्रधान मंत्री पति होने का बड़ा सुख लिया है । सेंट पर सेंट खा जाने पर भी आपको कौन पूछ सकता था पर हम आपके संतोष और पारदर्शिता की दाद देते हैं कि आपने केवल दस प्रतिशत ही खाया और पूरी पारदर्शिता से खाया कि लोग आपको मिस्टर दस परसेंट के नाम से ही जानने लगे । अब मिस राईस ने मुम्बई मामले की जाँच पूरी पारदर्शिता से करवाने के लिए कहा है, पर आप ही क्या पूरे पाकिस्तान का ही इतिहास कपड़ों के बावजूद पूरा पारदर्शी रहा है यह अमरीका से ज़्यादा और कौन जानता है? जब आप नवाज़ से गठबंधन कर रहे थे तब भले ही नवाज़ मूर्ख बन रहे थे या मज़बूरी में थे पर हमें तो सब कुछ पूरा साफ-साफ दिख रहा था ।

अगर बेनज़ीर वाला हादसा न होता और वे चुनी जाती तो फिर टेन परसेंट वाला मामला चल निकलता । पर अब क्या किया जाए पूरी हंड्रेड परसेंट की जिम्मेदारी आ गयी । आतंकवादियों को पकड़ें या नहीं पर हिसाब तो पूरा बना कर दिखाना पड़ेगा । और अब बुश की जगह यह ओबामा आ गया । यह हिसाब किताब का कुछ पक्का लगता है । आपसे ज़्यादा अनुभव नवाज़ को है । अच्छा होता आप उनको प्रधान मंत्री बना देते । पर यह साली कुर्सी होती ही बड़ी कुत्ती चीज । अच्छे अच्छों का दिल डोल जाता है । और दिल का क्या ? पालिन को देखते ही जूते खाने वाले डायलाग बोलने लगा । आपने कुर्सी सँभालते ही अच्छी अच्छी बातें बोलना शुरू किया तभी से हमारा माथा ठनकने लगा था । कवियों ने कहा भी है-
बुरो बुराई जो तजे, तो चित खरो सकात ।
ज्यों निकलंक मयंक लखि, गनें लोग उत्पात ॥

अर्थात यदि बुरा आदमी बुराई छोड़ने की बात करता है, तो मन में शंका होती है । जैसे यदि चन्द्रमा में दाग न दिखे तो लोग इसे किसी दुर्घटना की शंका के रूप में देखते हैं ।

अब देख लो मुम्बई वाला मामला हो गया ना ।

अब आप भारत द्वारा वांछित बीस आतंकवादियों के बारे में जो कुछ कह रहें हैं यदि वह आपकी बात है तो दुःख की बात है और यदि आई.एस.आई., कट्टरपंथियों और सेना के दबाव के कारण कह रहे हैं तो और भी भयंकर बात है । फिर क्या फ़ायदा हुआ, ऐसा लोकतंत्र तो पहले भी पाकिस्तान में चल ही रहा था । हमें आपकी हालत पर तरस आता है । कठपुतली राजा की हालत तो गुलाम से भी बुरी होती है । अगर और आतंकवादियों की बात छोड़ भी दें तो दाऊद इब्राहीम तो भारत का नागरिक है उसे सरंक्षण देने का क्या मतलब है ? यदि निर्दोष व्यक्ति को प्राणों का भय हो तो उसको शरण देना शरणागत वत्सलता हो सकती है जैसे राम ने विभीषण को शरण दी थी या राजा शिवि ने कबूतर को शरण दी थी या हम्मीर अलाउद्दीन के एक सेना अधिकारी को शरण दी थी । पर दाऊद इब्राहीम तो मुम्बई बम कांड का अपराधी है । उसे शरण देना तो शत्रुता है जैसे ब्रिटेन का फिजो, जगजीत सिंह चौहान या लाल डेन्गा को शरण देना था ।

आपकी वर्तमान स्थिति के बारे में हम आपको एक कहानी सुनाते हैं । एक बार एक गीदड़ ने देखा कि एक शेर दहाड़ा, उसकी पूँछ खड़ी हो गई, आँखें लाल हो गईं फिर वह शिकार पर टूट पड़ा और जानवर को मार लिया । गीदड़ को यह तरीका बड़ा सरल लगा । घर आकर उसने अपनी पत्नी से कहा अब मैं शिकार करूँगा । उसने ज़ोर से हुआं-हुआं की आवाज़ निकाली और पत्नी से पूछा- बता मेरी आँखें लाल हुई कि नहीं, पूँछ खडी हुई कि नहीं । पत्नीके मना करने पर उसने डाँट पिलायी । पत्नी ने डरकर हाँ कर दी । उत्साहित होकर गीदड़ पास ही एक छोटी झाड़ी में से पत्तियाँ खा रहे ऊँट की गर्दन पर टूट पड़ा । ज्यों ही ऊँट ने गरदन ऊँची उठाई, गीदड़ ज़मीन से आठ फुट ऊँचा उठ गया । गीदड़ी ने डर कर कहा- हे हठीले! शिकार करने का हठ छोड़ दे । तो गीदड़ ने एक दोहा कहा-
सुंदर का बोल मेरे मन भावे ।
पर धरती पर पैर मंडण नहीं पावे ॥

अर्थात हे सुन्दरी ! मुझे तुम्हारी बात अच्छी लगती है पर क्या करूँ मेरे पैर ही धरती पर नहीं टिक पा रहे हैं ।

यदि आप वास्तव में ही पाकिस्तान में लोकतंत्र को बचाना और मज़बूत करना चाहते हैं तो नवाज़ के साथ मिलकर
ईमानदारी से काम करिए । शुरू में इन आतंकवादियों को पालने वाला अमरीका ही है पर अब अपनी फटी में ही सही, मदद करने के लिए तैयार है सो अच्छा मौका है पाकिस्तान को कट्टरपंथियों से मुक्त कराने का । इतिहास में नाम दर्ज करवाने के मौके बहुत ही कम लोगों के जीवन में आते हैं । अब मौका है हिम्मत करने का वरना इतिहास का कूड़ेदान बहुत बड़ा है उसमें आप जैसे जाने कितने पड़े होंगे ।

आपका शुभचिंतक ,
रमेश जोशी

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४ दिसम्बर २००८



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Jhootha Sach

Dec 4, 2008

चिदंबरम का मार्ग-दर्शन और गृह मंत्री की भाषा




चिदंबरम जी ,
वणक्कम । आप गृह मंत्री बन गए । दुविधा में हैं कि आपको बधाई दें या संवेदना प्रकट करें ? वित्त मंत्रालय अच्छा था । आराम से वातानुकूलित संसद में चार घंटे अंग्रेज़ी में सुन्दरकाण्ड का पाठ कर दिया और पाँच साल की छुट्टी । आधे से ज़्यादा सांसदों को अंग्रेजी समझ में नहीं आती । जिनको टेक्स चोरी करनी है उनकी सेवा में अंग्रेज़ी जानने वाले चार्टर्ड अकौन्टेन्ट मौजूद हैं और जो टेक्स से बच नहीं सकते उन्हें समझ कर करना ही क्या है ।

अब यह गृह मंत्रालय मिल गया । बड़ा सूगला विभाग है । जब शान्ति हो तो कोई धन्यवाद नहीं देता पर जब कोई दुष्ट चुपके से कहीं कुछ कर जाता है तो गृहमंत्री की गर्दन पकड़ो । चाय की रहदी लगाने वाला भी इस्तीफा माँगने लग जाता है । वित्त मंत्रालय में तो आराम से गाड़ी पर बैठे, कान में कलम घुसेड़े करते रहो कागज़ काले । सेंसेक्स, मुद्रास्फीति, रिसेशन, मेल्ट-डाउन किसी के समझ में नहीं आता तो बोलेगा कौन? खैर! अपने गृह मंत्री बनते ही अपने वक्तव्य में सबसे सहायता की अपेक्षा की थी सो हम आपकी सहायता के लिए ही यह पत्र लिख रहे हैं ।

वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय या किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में तो केवल अच्छी अंग्रेज़ी जानने मात्र से ही नौकरी और पदोन्नति मिल सकती पर इस भारत में हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों जाने बिना न तो प्रधान मंत्री और न ही गृह मंत्री मंत्री के रूप में सफल हुआ जा सकता है । अगर देवीलालजी अंग्रेज़ी जानते होते या देवेगौड़ा जी हिन्दी जानते होते तो टर्म पूरा कर जाते । आप तमिल और अंग्रेजी तो बढ़िया जानते हैं , हिंदी भी थोड़ी-थोड़ी समझ लेते हैं पर गृहमंत्री के लायक नहीं । अगर ग़लत सन्दर्भ में नानी याद दिला दी तो लोग और सब बातें छोड़ कर केवल भाषा की टाँग तोड़ने लग जायेंगे ।

गृह मंत्रालय के अन्दर में मुख्य रूप से पुलिस आती है और पुलिस की भाषा सबसे अलग होती है । पुलिस की भाषा किसी स्कूल में नहीं सीखी जा सकती है यह तो पुलिस और आम जनता के बीच सार्थक संवाद में चौकियों और थानों में विकसित होती है । इसे सीखने के लिए आपको ८ पी.एम. के बाद किसी पुलिस चौकी के पिछवाड़े छुप कर खड़े होना होगा । पर सावधान रहिएगा कि कहीं आम आदमी समझ कर कोई कानून का रखवाला आपका स्टेटमेंट न ले ले ।

गृह मंत्री खैर ! मंच पर तो पुलिस वाली संसदीय भाषा नहीं बोल सकता पर यह तो तय है कि उसका काम वित्तमंत्री वाली भाषा से भी नहीं चल सकता । और मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल वाली भाषा से तो बिल्कुल भी नहीं । इनकी भाषा इतनी करुण होती है कि सुनकर आदमी का दिल मेल्ट डाउन हो जाए और बन्दूक चलाने की बजाय अपना सर पीटने लग जाए पर क्या किया जाए आतंकवादियों के दिल होता ही नहीं । सो हम गृह मंत्री के लिए उपयुक्त हिन्दी भाषण के बारे में आपको कुछ जानकारी देना चाहते हैं ।

संकट के समय गृह मंत्री को माइक सामने होते हुए भी चिल्ला-चिल्ला कर बोलना चाहिए भले ही आवाज़ फट जाए या मुँह से झाग नकलने लग जायें । आपको धीरे-धीरे स्टाइल वाली अंग्रेजी बोलने की आदत है , पर चिल्लाते-चिल्लाते अभ्यास हो जाएगा जैसे माँगते-माँगते आदमी एक अच्छा फकीर हो जाता है । प्रत्येक भाषा में कुछ शब्द और मुहावरे ऐसे हटे हैं जिन से जोश, बहादुरी और दृढ़ता टपकती है । इनका बीच-बीच में प्रयोग करने से सुनने वालों को लगता है कि बन्दा ज़रूर कुछ न कुछ करेगा । जैसे ईंट से ईंट बजा देंगे, नानी याद दिला देंगे, नाकों चने चबवा देंगे, धूल चटा देंगे, दाँत खट्टे कर देंगे, छठी का दूध याद करा देंगे, खून की नदियाँ बहा देंगे, मर जायेंगे, मिट जायेंगे आदि-आदि ।

यदि अंग्रेजी बोलनी ही तो 'नो स्टोन अन टर्न्ड' जैसे मुहावरों का ही प्रयोग करें । अंग्रेजी का छौंक लगाने से हिन्दी का स्वाद और बढ़ जाता है । बीच-बीच में 'भारत माता की जय' चिल्लाते रहना चाहिए । यदि वोट बैंक को खतरा नहीं हो तो 'वन्दे मातरम' भी चिल्लाया जा सकता है ।

आप सोच रहेंगे होंगे कि क्या इस तरह भाषण देने या चिल्लाने से आतंकवादी डरकर भाग जायेंगे या आने का साहस नहीं करेंगे । ऐसी बात नहीं है । पर हाँ, इससे जनता का गुस्सा निकल जाएगा । मनोवैज्ञानिकों का मत है कि चिल्लाने से हीन भावना दूर होती है । वैसे जनता कब तक निराश और हताश रह सकती है । आखिर तो झख मार कर पेट के लिए दिहाड़ी पर जाना ही पड़ेगा । थोड़े दिनों में भूल जायेगी । बस अगले चुनावों तक माहौल बनाकर रखिये । और अगर अगले बरस जनता ने पाटिया पलट ही दिया फिर अडवानी जी जानें या तोगडिया जी जानें या आतंकवादी जी जानें ।

आपका शुभचिंतक,
रमेश जोशी

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२ दिसम्बर २००८




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Jhootha Sach

Dec 1, 2008

अब तो पड़ गयी ठण्ड ? पाटिल का इस्तीफा



गृह मंत्री का पद क्या हो गया, आफ़त हो गई । घर में एक मंत्री होती है घर वाली । सब उस पर सवार । चाय अभी तक क्यों नहीं बनी, क्या झाड़ू लगाती हो, यहाँ कूड़ा पड़ा है, दाल में नमक ज़्यादा क्यों पड़ गया, बच्चा क्यों रो रहा है, मेरे मोजे कहाँ हैं, चुन्नू आज लंच-बोक्स भूल गया । गृहिणी एक और प्राण खाने वाले हज़ार । सास, ननद, ससुर, देवर, पति सबके अपने-अपने नखरे । अगर यही अपना चंडी वाला रूप दिखा दे तो सबकी जूँएं सो जायें । पाटिल बेचारे भले आदमी । किसी की जेब कट गई तो पाटिल की गलती, लल्लू की मुर्गी कल्लू का कुत्ता ले भगा तो पाटिल पर गुस्सा, किसी के घर में मच्छर घुस गया तो पाटिल को पकड़ो, किसी की दाल में मक्खी गिर गई तो पाटिल की लापरवाही । गृह मंत्री क्या बन गए सारे देश के गुलाम हो गए! अरे इतना बड़ा देश, हजारों किलोमीटर की स्थल और जल सीमा, रखवाली करने वाला एक आदमी और घुसने वाले अरबों लोग । लोगों को ख़ुद को तो अपने दो बच्चों की पूरी सी ख़बर नहीं रहती कि होम वर्क किया नहीं, स्कूल का नाम लेकर होटल में दारू तो नहीं पी रहा । करोड़ों बंगालादेसी आ घुसे तो क्या अकेले पाटिल के ही टाइम में ही आ घुसे? चालीस साल में और भी तो गृह मंत्री हुए है । पर ठीकरा पाटिल के सर । जिसे देखो पाटिल पर पिला पड़ रहा है ।

और आरोपों का आधार देखिये? बन्दे के सूट । उनका समयानुकूल साफ-सुथरे कपड़े पहनना । जिनके पास एक निक्कर और कमीज़ के अलावा और कुछ नहीं वे भुने जा रहे हैं । पाटिल दिन में तीन-तीन सूट बदलते हैं । अरे भाई जब हैं तो क्या ट्रंक में बंद करके रखने के लिए हैं क्या? क्या चड्डी-बनियान पहने ही किसी जेबकतरे के पीछे भाग लें? तब इनकी आत्मा को शान्ति मिलेगी । विष्णुजी के पास तो एरिया कम था । एक हाथी को बचाने के लिए नंगे पाँव दौड़ पड़े तो उसके चर्चे आज तक गाये जा रहे हैं । अगर पूरे भारत का चार्ज दे दिया जाए तो पता चले । फिल्मों में एक नाचने वाली तीन मिनट में तीस ड्रेसें बदल लेती है तो किसी को कोई एतराज़ नहीं । ये तो चाहते हैं कि गृह मंत्री पाँच साल तक न तो नहाये, न कपड़े बदले, न बाल ठीक करे । हो सकता है आतंकवादी गृह मंत्री के पसीने की बदबू से भागते हों ।

इन आम आदमियों को क्या पता कि कपड़े अवसर के अनुकूल पहनने चाहियें । अगर मान लीजिये पहन रखा है हरा सूट और जाने की ज़रूरत पड़ गयी गमी में तो सोचिये क्या अच्छा लगेगा? मौका देखना पड़ता है उसके अनुसार रंग चुनना पड़ता है । भले मरने वाले को लोग जला कर आ जायें और आप काला या सफ़ेद सूट खोजते रह जायें, कोई बात नहीं । डेकोरम भी तो कोई चीज़ होती है । पत्रकारों से क्या लालू जी की तरह लुंगी में ही मिललें?

भगवान की कृपा से मंत्री बन गए तो कपड़े पहनने का मौका मिला है वरना तो वकील थे तो वही काला कोट, सरदी, गरमी बरसात सभी मौसमों में । लोग समझते है कि भाडू (वकील) के पास एक ही कोट है । और ये मंत्री कोई ज़बरदस्ती बन गए क्या? बना दिया तो बन गए, हटा दिया तो हट गए । 'लायी हयात आए, कजा ले चली चले । न अपनी खुशी से आये, न अपनी खुशी चले ।' अब किसी और को बनाया तो वह बन गया । अब आप सोचते होंगे कि नया गृह मंत्री चड्डी बनियान और जूते पहन कर खड़ा रहेगा और सीटी बजाते ही दौड़ पड़ेगा । यह हो सकता है कि ये पेंट पहनते और वह लुंगी बाँधेगा पर थोड़ा बहुत टाइम तो उसमे भी लगेगा ही । लुंगी में दौड़ना थोड़ा मुश्किल तो होता ।

वैस हमें तो इस बात पर आश्चर्य है कि जब लोगों को आतंकवाद समाप्त करने इतना सरल उपाय मालूम था तो समय रहते बताया क्यों नहीं? पाटिल को हटा देते, मुम्बई पर हमला होता ही नहीं । अच्छा हो, पाटिल को हटवाने वाले ख़ुद ही गृहमंत्री बन जायें और दो चार दिन में हटा दें आतंकवाद को । हम उसके नाम की सिफ़ारिश कर देंगें । पर फिर भी न मिटा तो?

पंडित होने के नाते हम पाटिल साहब को ग्रह शान्ति का एक नुस्खा बताते हैं- वे अपने उन काले, सफ़ेद और हरे रंग वाले कुख्यात सूटों को किसी विपक्षी पार्टी वाले या पत्रकार को दान में दे दें और हर मंगलवार को ब्रह्म मुहूर्त में कच्छा बनियान पहन कर नंगे पैर कनाट प्लेस वाले हनुमान जी के दर्शन करने जाएँ । अवश्य दिन फिरेंगे । रही बात चिदंबरम की तो उनके पास तो सीधा सा उपाय है कि आतंकवादियों के आयात पर इतना टेक्स लगा देंगे कि बच्चू को लाख बार सोचना पड़ेगा कि आतंकवाद के धंधे में रहूँ या कोई और धंधा करूँ?

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१ दिसम्बर २००८




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