Showing posts with label amitabh bacchan. Show all posts
Showing posts with label amitabh bacchan. Show all posts

Aug 13, 2013

गरीबी : एक मानसिकता



जब से राहुल बाबा ने गरीबी को एक मानसिकता मानते हुए कहा है कि इसका रूपए या रोटी की कमी जैसी भौतिक स्थितियों से कोई संबंध नहीं है तब से लोग उनका मज़ाक उड़ा रहे हैं । अब ऐसे लोगों को कौन समझाए कि यह कितना गहरा और गतिशील आर्थिक दर्शन है । मुक्त अर्थव्यवस्था के गहरे पानी में पैठकर निकाला गया मोती है ।

कहते हैं जब संवत १९५६ में भारत में भयंकर अकाल पड़ा था तब लोग अपनी अंटी में रूपए दबाए हुए मँहगाई का रोना रोते-रोते भूखे मरते-मरते ही मर गए । अरे, जब तक पैसे थे तब तक मज़े से मालपुए खाते, उसके बाद उधार लेकर खाते, फिर भीख माँगकर खाते और जब भीख भी मिलनी बंद हो जाती तो चोरी करते, डाका डालते मगर खाते और ठाठ से खाते-पीते । 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' नाम का भी तो कोई दर्शन है और इसी भारत का है । कुछ भिखारियों को देखिए- दिन भर भीख माँगते हैं लेकिन शाम को दारू पीकर फिल्म देखने जाते हैं । नरेन्द्र मोदी, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, शरद यादव आदि के पास क्या कोई पैसे का अभाव है जो आधी-अधूरी दाढ़ी बनाते हैं । गरीबी की मानसिकता जो ठहरी । दाढ़ी बनाने में कंजूसी से कितना फर्क पड़ जाएगा । चार बाल उखाड़ने से क्या मुर्दे का वज़न कम हो जाता है ? लेकिन क्या किया जाए, हजार कोशिशों के बावजूद मन के अन्तरतम में घुसी गरीबी अपना असर दिखा ही देती है । वरना चिदम्बरम जी को देखिए, अरबों रूपए का घाटे का बजट बनाकर भी दिन में तीन बार दाढ़ी बनाते हैं ।

अमरीका एक धनवान देश इसलिए है कि वहाँ लोग कमाने से पहले खर्चने की सोचते हैं, कई-कई क्रेडिट कार्ड रखते हैं और जब तक कोई भी उन्हें उधार देता है, लेते चले जाते हैं और मज़े करते हैं । फूड-स्टाम्प से भोजन की बजाय दारू खरीद लेते हैं । जब अमरीका के ट्विन टावर पर हमला हुआ तो बुश साहब ने कहा था- जाओ, बाजारों में जाओ और खूब खर्चो क्योंकि आज अमरीका पर खतरा है । और एक हमारा देश है कि सारे दिन गरीबी का रोना रोता रहता हैं । जब-तब प्रधान मंत्री मितव्ययिता के उपदेश देते रहते हैं । चमड़ी जाय लेकिन दमड़ी न जाय । एक सेठ ने अपने मुनीम से पूछा- मुनीम जी, हिसाब लगाकर बताइए कि हमारे पास कितनी संपत्ति है ? मुनीम ने कहा- सेठ जी, यदि आपकी सात पीढ़ियाँ भी कभी कुछ न करे और खूब मज़े से रहें तो भी कोई कमी नहीं पड़ेगी । सेठ जी ने घबराकर कहा- तो मुनीम जी आठवीं पीढ़ी का क्या होगा ?

नेहरू जी जब प्रधान मंत्री नहीं बने थे और स्वतंत्रता के आन्दोलन में लगे हुए थे और आमदनी का कोई जारिया नहीं था तब भी दिन में एक बार दाढ़ी ज़रूर बनाते थे । कपड़े भी बढ़िया और टिपटॉप पहनते थे । और एक गाँधीजी को देखिए केवल धोती पहनते थे और वह भी आधी । जब राजीव गांधी प्रधान मंत्री बने थे तब वे किसी भी लाभ के पद पर नहीं थे लेकिन दाढ़ी बनाने में कभी कंजूसी नहीं की और एक राहुल गाँधी हैं कि घर मे दो-दो सांसद हैं, और न बीवी-बच्चों का कोई खर्चा फिर भी दो पैसे बचाने के लिए समय पर दाढ़ी भी नहीं बनाते । अमिताभ बच्चन को देखिए, बहू बेटा हीरो-हीरोइन, खुद महानायक हैं, फिल्मों और विज्ञापन से नोट कूट रहे हैं, पत्नी सांसद फिर भी मियाँ कंजूस इतने कि आधी ही दाढ़ी बनाते हैं । मन के गरीब । उत्तराखंड के विपदाग्रस्त लोगों के लिए दान भी दिया तो क्या ? दो पुरानी कमीजें । हैसियत और नीयत में बहुत अंतर है । और हम जानते थे इनके पिताजी को, थे तो मास्टर लेकिन दिन में दो बार दाढ़ी बनाते थे और ठसके से रहते थे ।

सुनते हैं- हैदराबाद के निज़ाम बड़े कंजूस थे । जब भी उनके यहाँ कोई सिगरेट पीने वाला मेहमान आता था तो उसके जाने के बाद वे उसकी पी हुई सिगरेट के ठूँठे उठाकर पिया करते थे । चीनी आक्रमण के समय बहुत से गरीब-अमीर लोगों ने राष्ट्रीय रक्षा कोष में जी खोल कर चन्दा दिया लेकिन निज़ाम साहब ने क्या कहा- मैं गरीब आदमी हूँ , मेरे पास देने को कुछ भी नहीं है । उस समय एक व्यक्ति ने उन्हें एक पैसे का मनीआर्डर भेजा था ।

हमारे ख्याल से भारत के लोगों की नीयत में ही गरीबी है । एक बार एक आदमी रोटी पर रोटी का ही एक टुकड़ा रखे हुए खाना खा रहा था । रोटी का कौर तोड़ता, रोटी पर रखे टुकड़े से छुआता, कौर को मुँह में रखता और फिर सी-सी करता । दूसरा आदमी उसे देख रहा था । उसे बहुत आश्चर्य हो रहा था । उसने रोटी खा रहे आदमी से पूछा- सी-सी क्यों कर रहे हो ? वह बोला- मिर्च बहुत तीखी है । उसने फिर पूछा- मिर्च तो कहीं दिखाई नहीं दे रही है । पहले वाला आदमी कहने लगा- सब्जी नहीं है इसलिए मैं मिर्च की कल्पना करते हुए रोटी खा रहा हूँ । दूसरे ने कहा- भले आदमी, जब कल्पना ही कर रहे हो तो मिर्च क्यों, रबड़ी की कल्पना करो । पहले ने कहा- नहीं, भाई, मैं गरीब आदमी हूँ । रबड़ी की कल्पना करने की मेरी हैसियत नहीं है । तो यह है वह गरीब मानसिकता जिसकी ओर राहुल बाबा संकेत कर रहे थे । सुनते हैं जय ललिता के पास दस हजार साड़ियाँ और साढ़े सात हजार सेंडिल हैं लेकिन इतनी कंजूस हैं कि कभी एक साथ दो साड़ियाँ और दो जोड़ी सेंडिल नहीं पहने ।

अब एक ऊँचे, सकारात्मक और धनवान मानसिकता वाले रईस का उदाहरण देखिए । एक बार एक बच्चा हाँफते हुए घर पहुँचा और अपने पिता से बोला- पिताजी, आज मैंने दो रूपए बचा लिए । पिता ने पूछा- कैसे ? बेटे ने उत्तर दिया- आज मैं, रिक्शे से घर आने की बजाय एक रिक्शे के पीछे-पीछे दौड़ता हुआ घर आ गया । खानदानी रईस पिता ने उसे एक झाँपड़ मारते हुए कहा- गधे के बच्चे, करवा दिया ना खानदान की इज्ज़त का कचरा । लोग क्या समझ रहे होंगे । अगर दौड़ना ही था तो कम से कम टेक्सी के पीछे तो दौड़ता । बचत भी की तो दो रूपए की । टेक्सी के पीछे भागता हुआ आता तो बीस रूपए बचते । करा दिया ना अठारह रूपए का नुकसान । हम खानदानी रईस हैं । कभी छोटी-मोटी बचतों के पीछे नहीं जाते ।

सो हमें चाहिए कि अपनी गरीबी वाली मानसिकता छोड़ें और टेक्सी के पीछे भाग-भाग कर अपना आर्थिक स्तर बढ़ाएं । गरीबी का रोना रो कर भावी प्रधान मंत्री को दुखी और देश को बदनाम न करें । इसी सकारात्मक और समृद्ध चिंतन के चलते सोचते हैं कि सत्रह हज़ार रूपए मासिक की इस मोटी पेंशन का आखिर करेंगे क्या ? कब तक बसों में धक्के खाकर गरीबी का नाटक करते रहेंगे । एक-दो प्लेन खरीद ही लें ।

७ अगस्त २०१३

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Apr 12, 2012

अमिताभ बच्चन का क्रिकेटाद्वैत

अमित जी,
जय राम जी की । इससे पहले भी हमने आप द्वारा 'कलाकार और कला के प्रति लोगों की उपेक्षा' को लेकर प्रकट की गई चिंता के बारे में लिखा था । आशा है अब आपको कल ३ अप्रैल २०१२ को आई.पी.एल. के उद्घाटन समारोह में कविता पाठ करने के बाद कला के प्रति लोगों की उपेक्षा के बारे में कोई शिकायत नहीं रही होगी । सारे देश के कला और साहित्य प्रेमी संपूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से इकट्ठा हुए थे और रस में गोते लगा रहे थे । हमारे पास तो टी.वी. है नहीं, सो उस अद्भुत कला महोत्सव को देख नहीं पाए । पहले जब 'रामायण' सीरियल नया-नया शुरु हुआ था तो हम पड़ोस में जाकर देख आया करते थे मगर अब वह ज़माना नहीं रहा । पहले लोग घर आए व्यक्ति को आदर पूर्वक बैठाया करते थे और चाय भी पिलाया करते थे । अब तो कोई घर आता है तो लोग नाक-भौंह सिकोड़ते हैं । सो हम चाह कर भी कला, साहित्य और भक्ति के इस महान कार्यक्रम को देख कर अपना जन्म सफल नहीं कर पाए ।

हमारे यहाँ तो हिंदी का एक अखबार आता है जिसमें खेल पन्ने पर आपका कविता गाते हुए फोटो तो नहीं आया । क्योंकि कुछ भी कहें, हमें लगता है कि अखबार वालों ने समझा होगा कि देखने के मामले में लोग शायद करीना और प्रियंका और केटी पेरी को अधिक प्राथमिकता देते हैं । बस, एक छोटा सा समाचार आया कि आपने एक कविता का पाठ किया जिसमें आपने पुनर्जन्म मिलने की स्थिति में किसी भी रूप में क्रिकेट से ही जुड़ने की कामना की है-
 अगर जन्म मिले दोबारा मुझे तो
इस निराले खेल का छोटा सा हिस्सा बनूँ मैं
गेंद का, बल्ले का, पिच का,
कोई हिस्सा बनूँ मैं ।


बस, इतनी ही कविता छपी थी अखबार में । कोई बात नहीं, देखने को तो कुछ था नहीं । और जहाँ तक भक्त की भावना को समझने की बात है तो हमारे लिए कविता के इतने शब्द ही पर्याप्त है । हम भी छोटे-मोटे कवि हैं । हालाँकि ऐसा अद्भुत भक्ति काव्य कभी भी हमसे नहीं लिखा गया । यह सब पूर्व जन्मों का फल और भगवान की कृपा के बिना संभव नहीं होता । आप पर भगवान की कृपा है । ऐसे ही बनी रहे और आप ऐसे ही भगवान की भक्ति करते रहें और सुख-संपत्ति प्राप्त करते रहें । मोक्ष तो दुःखी लोग माँगते हैं कि फिर से इस दुःखमय संसार में न आना पड़े । सच, बड़े-बड़े नेताओं की दुर्गति देखकर हम तो अगले जन्म में क्रिकेट का हिस्सा तो क्या, मनमोहन सरकार का हिस्सा भी नहीं बनना चाहेंगे ।

वैसे अखबार में यह नहीं बताया गया कि यह कविता किसकी थी ? क्या फर्क पड़ता है ? जब आप गा रहे थे तो आपकी ही थी । सच पूछिए तो यदि यही कविता कवि स्वयं गाता तो हो सकता है लोग सुनने के लिए ही नहीं आते । जैसे कि हमारी गज़लें यदि जगजीत सिंह गाते तो प्रसिद्ध हो जातीं और यदि छम्मक छल्लो पर फिल्माई जाती तो युगों-युगों तक युवतियाँ उस पर उछलतीं और युवक सीटियाँ बजाते । हालाँकि इस बात का महत्त्व नहीं है फिर भी हम कवि की पीड़ा जानते हैं इसलिए बताते चलें कि इसे प्रसून जोशी ने लिखा था । वैसे 'स्लम डॉग मिलेनियम' में 'दर्शन दो घनश्याम' भजन को सूरदास का बता दिया जब कि वह गोपाल सिंह नेपाली का है ।

हमने इसी प्रकार के तादात्म्य भाव से परिपूर्ण रसखान की रचना पढ़ी और पढ़ाई है । आपने भी पढ़ी होगी यदि दून स्कूल वालों ने इसे अंग्रेजी स्कूल के पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने लायक समझा होगा तो । इसमें भी कवि किसी भी रूप में कृष्ण और ब्रज-भूमि से जुड़ना चाहता है । कविता सवैया छंद में है और उसे गाकर भी आनंद लिया जा सकता है यदि किसी के मन में 'आउट डेटेड ' कहलाने का भय नहीं हो तो । कविता इस प्रकार से है-
मानुष हौं तो वही 'रसखान' बसों ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन ।
जो खग हों तो बसेरो करों उन कालिंदी-कूल कदम्ब की डारन ।
जो पशु हों तो कहा बस मेरो चरों नित नन्द की धेनु मँझारन ।
पाहन हों तो वही गिरि को जो भयो ब्रज छात्र पुरंदर कारन ।


आप सोच रहे होंगे कि कवि ने और कुछ क्यों नहीं चाहा ? हो सकता है कि उस समय भारत में अंग्रेज नहीं आए थे और न ही क्रिकेट इस देश का धर्म बना था । यदि उस समय तक क्रिकेट भारत में आ गया होता और उसमें इतना पैसा हुआ होता तो रसखान ही क्या, स्वयं भगवान कृष्ण भी गीता में अर्जुन से यही कहते नज़र आते कि ‘हे अर्जुन, खेलों में मैं क्रिकेट हूँ ।’

यदि खेल को धर्म मानें तो उस समय इस देश में कबड्डी, खो-खो, पहलवानी, घुड़सवारी, तलवार-तीर-धनुष चलाना आदि बहादुरी वाले धर्म हुआ करते थे और तब खेलों में अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के धर्म जैसा कोई पक्षपात नहीं हुआ करता था । और तब खेलों में कोई पैसा भी खास नहीं हुआ करता था । यदि कोई सेठ या ठाकुर खुश हो गया तो किसी पहलवान को इनाम में ५१ रुपए दे देता था या फिर कोई कुश्ती या कबड्डी प्रेमी किसी खिलाड़ी को दूध पीने के लिए भैंस दे दिया करता था ।

क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में तो हाड़ तोड़ना है और कमाई कुछ नहीं । अब बोक्सर मेरी कोम को देखिए । अब भी बेचारी कुपोषित सी लगती है । उसने कहा है कि शायद ओलम्पिक में पदक ले आने पर कुछ हालत सुधरे । आपको याद हो तो १९५० में भारत की फ़ुटबाल टीम ने वर्ल्ड कप में ब्राजील में खेलने के लिए क्वालीफाई कर लिया था लेकिन तब इतना पैसा ही नहीं था कि उन्हें बाहर भेजा जा सकता ।

अगर उस समय क्रिकेट होता और आज जितना पैसा होता तो किसे पता हमें अपने पुराने भारतीय साहित्य में ऐसी भी रचनाएँ मिलतीं जैसी कि आपने आई.पी.एल. के उद्घाटन सत्र में सुनाई । और फिर अपने-अपने भगवान हैं । जैसा भक्त, वैसे भगवान । भगवान तो कण-कण में हैं । जैसी जिसकी भावना होती है भगवान उसी रूप में दिखाई देते हैं ।
जाकी रही भावना जैसी ।
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ।।


किसी को विधर्मियों की हत्या में धर्म और भगवान की सेवा दिखाई देती है तो किसी दिलीप सिंह जू देव जैसे को पैसा भगवान से बड़ा नहीं, तो भगवान से कम भी नहीं दिखाई देता । किसी को नर में नारायण दिखाई देता है तो किसी को मंदिर में भी चुराने लायक जूते या मौका लग जाए कोई छेड़ने लायक युवती दिखाई देती है । एक सज्जन अपनी पत्नी को डराने के लिए अगले जन्म में चूहा या काक्रोच बनने की कामना की थी । कई लोग किसी हसीना का कुत्ता बनना चाहते हैं । एक पियक्कड़ को तो अपने तत्कालीन जन्म से कितनी घृणा थी यह इस शे'र से जाना जा सकता है-
या रब मुझे बनाना था भट्टी शराब की ।
इंसान बाना के क्यों मेरी मिट्टी खराब की ।


आजकल शराब की इतनी अनुपलब्धता नहीं है इसलिए लोग दस रुपए में लोकल दारू की एक सौ मिलीलीटर की थैली सूँत कर अपनी मिट्टी को खराब होने से बचा लेते हैं ।

आपने क्रिकेट के धर्म-स्थल आई.पी.एल. में पिच की घास, गेंद, बल्ला या क्रिकेट से संबंधित कुछ भी बनना चाहा । आप ही क्या, यह खेल ही ऐसा है जिसमें खेती जैसा पुण्य कार्य छोड़ कर पवार जैसे संत तक पिले पड़े हैं । इस खेल में बड़ा स्कोप है । गांगुली मैदान में पानी पिला-पिलाकर कप्तान बन गया । और तो और, लालू जी का पुत्र तेजस्वी बिना एक भी मैच खेले दस-बीस लाख रुपए ले गया ।

हमारे यहाँ कहा गया है- रावळै को तेल तो पल्लै में ही चोखो
अर्थात राजा के यहाँ से यदि तेल मिले और आपके पास कोई बर्तन न हो तो उसे पल्ले में ले लेना भी फायदे का सौदा होता है । राजमहल का तेल जो है ! आपको तो खैर, बकायदा अच्छा-खासा पैकेज मिला होगा ।

हमने हिंदी साहित्य में भारतीय दर्शन के कई प्रकार पढ़े हैं जैसे- अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि । हमारा विश्वास है कि आपने क्रिकेट के साथ अद्वैत स्थापित करके जिस दर्शन का प्रदर्शन किया है वह भी अवश्य ही भारतीय दर्शन में स्थान प्राप्त करेगा और श्रद्धालुओं का कल्याण करेगा ।

हरि ओम तत्सत् ।

४-४-२०१२
पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Apr 5, 2012

कला और कलाकार का सम्मान

अमित जी,
नमस्ते । हम आपके फैन हैं मगर वैसे नहीं जैसे कि आपको मंदिर या मोम की मूर्तियों में कैद करने वाले । हम तो आपकी कला के फैन हैं इसीलिए समय-समय पर आपको नेक सलाह देते रहते हैं पर यह सलाह भी ऐसी चीज है कि एक तो लोग बिना माँगे देने लगते हैं या फिर सलाह भी फालतू । अब देखिए ना, लोग हैं कि सचिन को सलाह दिए जा रहे हैं कि रिटायर हो जाओ । अरे भाई, यह कोई सेनाध्यक्ष जैसी कोई सरकारी नौकरी है क्या, कि एक निश्चित दिन रिटायरमेंट लेना ही पड़ेगा । यह तो अपना निजी वेंचर है जब तक मर्जी हो खेंचते रहो । और जब ऑफर आ रहे हैं, चाहे वे एक्टिंग के हों या क्रिकेट के, तो फिर लगे रहो मुन्ना भाई ।

हमें न तो सचिन के खेलते रहने से ऐतराज़ है और न आपके सत्तर के पेटे में राम-राम करने की उम्र में तीन-तीन शिफ्ट में काम करने से तकलीफ । हमने तो कल एक अखबार के मुखपृष्ठ पर उस अखबार के नाम के पास ही छपे आपके एक विचार को पढ़ कर यह पत्र लिखने का सोचा । विचार क्या था, चीत्कार था - एक कलाकार का, कला और कलाकार की इस देश में उपेक्षा को लेकर । आपने बताया कि जब एक कलाकार समर्पण के साथ अपनी प्रस्तुति देता है तो लोगों का ध्यान उसकी कला की ओर न होकर कहीं और होता है तो लगता है कि इस कला-प्रेमी देश में कलाकारों का सम्मान खत्म हो गया है । बड़ा दुःख हुआ इस दर्दनाक स्थिति को जानकर ।

हम भी एक छोटे-मोटे कलाकार हैं मगर पैसे लेकर प्रस्तुति नहीं देते । पैसे लेकर प्रस्तुति देने वाले कलाकार का बड़ा मरण हो जाता है । ढंग की प्रस्तुति न दो तो फिर लोग बुलाएँगे नहीं और यदि बुलाने वालों से यह कर दो कि तुम ढंग से क्यों नहीं सुनते हो तो भी वे फिर नहीं बुलाएँगे । हर हालत में मरण । हमने अपने कई मित्रों को, जो कि मंचीय कवि हैं, कई सेठों के घर पर उनके ड्राइंग रूम में फरमाइश पर कविता सुनाते देखा है और उसी दौरान सेठ जी पादते जाते हैं और कहते जाते हैं- हाँ, तो वो फलाँ कविता सुनाइए, अलाँ कविता सुनाइए । और बेचारे कवि महोदय को सुनानी पड़ती है । पेट का सवाल जो है । यह पेट भी साला, बहुत बदमाश चीज़ है । आदमी को जाने क्या-क्या नाच नचाता है । तभी रहीम जी ने पेट को संबोधित करते हुए यह दोहा लिखा था-

कहु रहीम या पेट ते क्यों न भयो तू पीठ ।
रीते मान बिगाड़िहैं भरे बिगाड़ै दीठ ।।
अर्थात, रहीम जी कहते हैं कि हे पेट तू पीठ क्यों नहीं हुआ? पेट खाली हो तो मान बिगाड़ता है, भरा हो तो नज़र बिगाड़ता है ।

अब भाई साहब, पेट भरे तो मुक्ति मिले । पेट का न होना तो संभव नहीं । और जब पेट बड़ा हो जाता है तो किसी भी तरह से छुटकारा नहीं मिलता । न पेट भरे और न जान छूटे । कबीर जी का पेट बहुत छोटा था । आधी और रूखी में ही भर जाता था और वह आधी भी अपने करघे पर बुने हुए कपड़े की कमाई की होती थी । सो किसी सेठ के घर जाकर भजन गाने की नौबत नहीं आई ।

आपको अपने जीवन की एक सच्ची घटना सुनते हैं । बात १९८२ की है । हम उन दिनों पोर्ट ब्लेयर जाते हुए कलकत्ता में रुके हुए थे । वहाँ हमने एक हास्य कवि सम्मलेन का समाचार पढ़ा । उसमें हमारे राजस्थान के एक प्रसिद्ध हास्य कवि भी भाग ले रहे थे जो हमारे वरिष्ठ मित्र भी थे । हमें उनसे मिलने का लालच हुआ सो पहुँच गए उनके पास वहीं मंच के पीछे ड्रेसिंग रूम में । जहाँ वे एक अन्य कवि से साथ ड्रेसिंग कर रहे थे मतलब कि हम-पियाला हो रहे थे । हमने पूछा- गुरु, यह क्या ? माँ सरस्वती का ऐसा चरणामृत ? कहने लगे- क्या करूँ एक ही कविता को बार-बार सुनाते हुए डर लगता है कि कहीं हूट न हो जाऊँ ? सो डर भगाने के लिए एक आध पैग लगाना पड़ता है ।

इसके बाद उन्होंने हमें भी मंच पर आमंत्रित किया । चूँकि हम उन श्रोताओं के लिए नए थे सो उन्होंने हमें हूट करना चाहा और कविता से पहले ही हू-हू करना शुरु कर दिया । हमने बिना घबराए उनको डाँटने के लहजे में कहा- सुनो, मैं पैसे लेकर सुनाने नहीं आया हूँ । तुम्हें सौ बार सुनना हो तो सुनो नहीं तो मैं नहीं सुनाऊँगा । श्रोता शांत हो गए और फिर हमने अपनी कविता सुनाई और वह लोगों को पसंद भी आई । यह बात और है कि हमारे उन कवि मित्र ने हमें पारिश्रमिक के दो सौ रुपए भी दिलवाए । यदि हम पैसे लेकर आए हुए कलाकार होते तो हमसे ऐसा साहस कभी नहीं होता कि श्रोताओं को झिड़क सकते । तो यह है बंधु, निष्कामता की शक्ति ।

हमने मुगल-ए-आज़म फिल्म देखी थी । कैसे और किन परिस्थितियों में देखी यह बताने की ज़रूरत नहीं है । आपने भी ज़रूर देखी होगी । उसमें सलीम युद्ध में विजय प्राप्त करके कई बरसों बाद लौटा है और जोधाबाई तानसेन से इस उत्सव को यादगार बनाए के लिए कुछ विशेष सुनाने के लिए कहती है । रात हो चुकी है । महल की मुँडेरों पर दिए झिलमिला रहे हैं । अंदर का कुछ नहीं दिखाई दे रहा है । बस, वहीं दीवार के पास तानसेन गाते दिख रहे हैं- 'शुभ दिन आयो रे' ।

तो यह है दरबारी कलाकारों का हाल । हाल हमेशा से ही यही रहा है । यदि आज हो रहा है तो कौनसी नई बात है । उन्हीं मुगल-ए-आज़म, जिल्ल-ए-सुभानी अकबर के दरबार का एक और किस्सा है । तब अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी हुआ करती थी । उन्होंने कृष्ण भक्ति के अष्टछाप के कवियों में से एक को उनका गाना सुनने के लिए राजधानी बुलवा भेजा । बेचारे कवि को आना पड़ा । मगर इस प्रकार के शाही सम्मान से परेशान थे । वे अकिंचन भक्त थे । रास्ते भर सोचते और कुढ़ते हुए पहुँचे और पता है, महाशय ने वहाँ जाकर क्या सुनाया? बोले -
संतन को सीकरी सों का काम ।
आवत जात पनहियाँ टूटें, बिसर जात हरि नाम ।


बादशाह और सारा दरबार सुन्न । अकबर ने उन्हें क्षमा माँगकर विदा किया । अब सोचिए कि उनकी जगह कोई इनाम-इकराम का लालची होता तो क्या ऐसे कह सकता था ?

अब आजकल कोई महानायक या किंग या बादशाह पैसे के लालच में किसी सेठ के बेटे की शादी में उसके फार्म हाउस में या जन्म दिन पर किसी बाहुबली या धनबली के घर नाचने जाएगा, तो फिर ध्यान से सुनने या न सुनने या कलाकार और कला के सम्मान के बारे में मुँह नहीं खोल सकता । मुँह माँगे पैसे लेकर मुन्नी बाई नहीं कह सकती कि यह ड्रेस नहीं पहनूँगी या कपड़े नहीं उतारूँगी या बेड रूम सीन नहीं करुँगी ।

वैसे आपकी बात ठीक भी है कि लोग कला को गंभीरता से नहीं लेते । जब राष्ट्रपति के भाषण को ही लोग ध्यान से नहीं सुनते, विधान सभा में बैठकर पोर्न वीडियो देखते हैं या सोते नज़र आते हैं तो आप-हम जैसे कलाकार तो किस खेत की मूली हैं । यह बात राजनीति में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी लागू होती है । ज़माना खराब है लोग भगवान के घर में भी लड़कियाँ छेड़ने और जूते चुराने जाते हैं ।

हमारे गाँव में एक कथावाचक जी आया करते थे गरमी की छुट्टियों में । विशेष रूप से महिलाएँ गरमी की लंबी दुपहरी बिताने के लिए कथा सुनने के लिए जाया करती थीं । जैसे आजकल लोग समय बिताने के लिए फिल्मी गीतों की अन्त्याक्षरी किया करते हैं । वे महिलाएँ भी अपने साथ कुछ टाइम पास ले जाया करती थीं मतलब कि काचरी छीलना या कैर चूँटना जैसे काम । हमने महात्मा जी को कई बार कहते सुना था- माता-बहनो, आप कथा सुनने आती हैं या कैर चूँटने ? मगर किसी पर कोई असर नहीं पड़ता था । इन सब समस्याओं के बावज़ूद महात्मा जी ने कभी कथा सुनाना बंद नहीं किया । कथा नहीं सुनाते तो खाते क्या ?

इसके विपरीत हमने परम संत रामसुखदास जी को भी सुना है । वास्तव में संत थे । न बच्चे, न बीवी, न कोई संपत्ति, न कोई घर, न कोई आश्रम । एक भगवा धोती जिसे आधा कमर से लपेटते और आधा शरीर पर ओढ़ लेते थे । एक जोड़ी खड़ाऊँ और एक कमंडल । न फोटो खिंचवाते थे और न किसी से पैर छुआते थे । उन्हें कभी किसी को कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि शांत रहें या ध्यान से सुनें । जब बोलते थे तो लगता था कि इस दुनिया में ही नहीं हैं । न किसी की तरफ देखना और न कोई अनावश्यक शारीरिक हरकत । और आजकल के च्यवनप्राश बेचने वाले, करोड़ों अरबों के आश्रमों के मालिक बाबाओं को, लोगों को रिझाने के लिए सत्संग से पहले ब्यूटी पार्लर में जाना पड़ता है, चुटकले सुनाने पड़ते हैं । कई तो भीड़ जुटाने के लिए सुन्दर चेलियाँ भी रखते हैं ।

तो बंधु, जब तक कोई शौक धंधा नहीं बनता तब तक ही खैर है । अन्यथा तो धंधे के सारे नाटक करने ही पड़ते हैं और पैसे देकर पधारे दर्शकों के अनुसार नाचना ही पड़ता है । उनके नाटक और नखरे सहने ही पड़ते हैं । तभी हमारा मानना है कि कलाकार को अपना पेट पालने के लिए कुछ और करना चाहिए और फिर अपनी मनमर्ज़ी से अपने शौक के लिए सम्मान पूर्वक जो चाहे करे । कहीं मानापमान का प्रश्न ही नहीं उठेगा । हमें तो लगता है कि पैसे के लिए नाचने वाले कोई भी हों - पूनम पांडे और राखी सावंत और मुन्नी या शीला या चिकनी चमेली या जलेबी बाई से भिन्न नहीं हैं - भाँड तो भाँड ही होता है फिर क्या फर्क पड़ता है कि उसकी फीस सौ रुपए है या सौ करोड़ ?

जय राम जी की ।

२८ मार्च २०१२


पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Feb 2, 2012

तोताराम का मन्त्र जाप

टी.वी. पर साहित्य उत्सव में गुलज़ार साहब को सुना । पता नहीं वे नज्में थी या कविताएँ मगर चूँकि गुलज़ार साहब की थीं तो श्रवणीय तो होंगी ही । बूढ़े पेड़ , उस पर लटकी बूढ़ी चुड़ैलों आदि के बारे में कुछ था । वैसे तो दोषपूर्ण या निर्दोष किसी भी तरह के सपने अब आने बंद हो गए हैं । आते भी हैं तो महँगाई के सपने आते हैं । पहले इनसे डर लगता था पर जब से अपनी गर्दन मनमोहन सिंह जी और मुक्त बाजार को सौंप दी है तब से डर लगना भी बंद हो गया है । जब डर से मुक्ति नहीं दिखती तो फिर डर से भी समझौता हो जाता है । बकरा कब तक डरेगा ..'बलि का एक दिन मुअय्यन है , नींद फिर कब तलक नहीं आती' । मगर गुलज़ार साहब वाली बूढ़ी चुड़ैलों ने रात में कई बार दर्शन दिए । विनोबा वाले झोले में अपनी किताबें डाले , भयंकर मेकअप किए हुए उत्सव में अपना कोई पुराना चाहने वाला ढूँढती घूम रही थीं । बार-बार नींद उचटने से सुबह समय से आँख नहीं खुलीं ।

जब खुलीं तो लगा चबूतरे पर कोई मन्त्र-जाप सा कर रहा है और थोड़ी देर फुसफसाने के बाद 'ओम फट' जैसी कुछ ध्वनि निकाल रहा है । हमने बिना देखे ही कहा- बाबा , क्यों ठण्ड में यहाँ बैठकर हम पर पाप चढ़ा रहे हो । कुछ ठंडी रोटी , पुराना कपड़ा चाहिए तो कहो और फिर कहीं धूप में जाकर बैठो ।

तभी वह आकृति अपनी चद्दर उतार कर खड़ी हो गई और कहने लगी- मैं कोई भिखमंगा नहीं हूँ । मैं तो तोताराम हूँ । पता चला कि तू अभी तक सो रहा है सो यहाँ 'कोलावेरी डी' गाने की प्रेक्टिस कर रहा था । हमें बड़ा अज़ीब लगा । हमने 'कारे कजरारे’ को राष्ट्रगीत का दर्ज़ा हासिल करते हुए देखा है , ‘करोड़पति कुत्ते’ ( स्लम डॉग मिलेनियर ) के गाने 'जय हो' को कांग्रेस द्वारा चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए नाव बनाते हुए भी देखा है और खैर भाजपा तो पैरोडी बनाने में सबसे होशियार है ही । सुना है उसने अब गोवा में 'कोलिवेरी डी' गाने की ट्यून और शब्दों को 'कमलवाली दी' करके फिट कर दिया है मगर तुझे कौन सा चुनाव जीतना है जो राम-नाम का जाप करने की उम्र में 'कोलावेरी' के चक्कर में पड़ा है ?

तोताराम ने कहा- समझदार आदमी को समय के साथ चलना चाहिए । यदि गोबर खाने का फैशन है तो गोबर खाने में नहीं हिचकना चाहिए । ओपरा विनफ्रे के आने से भारतीय साहित्य का कौन सा भला हो जाएगा मगर वह चर्चित है सो हर जगह महत्त्वपूर्ण और भीड़ जुटाने के लिए आवश्यक हो जाती है । यदि तू माइकल जेक्शन या लेडी गागा के बारे में नहीं जानता तो कोई तुझे भले लोगों में बैठने भी नहीं देगा ।

अमिताभ बच्चन कौन सा किशोर है जो 'कोलावेरी' सुनकर उछल रहा है । भाई , हर आदमी को बिकाऊ चीज से शिक्षा लेनी चाहिए । जो दिखता है सो बिकता है और जो बिकता है सो कमाता है और जो जितना ज्यादा कमाता है वह उतना ही बड़ा माना जाता है । अमिताभ बच्चन की विशेषता यही है कि वह अब भी कई बड़े-बड़े हीरो से ज्यादा कमा रहा है । और उसी क्रम में वह 'कोलावेरी डी' पर जान छिड़क रहा है । तुझे पता होना चाहिए कि आई.आई.एम. में भी 'कोलावेरी डी' के प्रसिद्ध होने और कमाई करने के मूल कारणों की खोज की जा रही है । तेरे मन्त्रों और भजनों ने आज तक कितनी कमाई कर ली ? तभी तो उन पर शोध करना तो दूर किसी ढंग के कार्यक्रम में उनके केसेट तक नहीं बजाए जाते ।

अब तो हमसे भी नहीं रहा गया , कहा- क्या पैसा ही सब कुछ है ? यदि सरकार को दूध से ज्यादा शराब से कमाई हो रही है तो शराब दूध से श्रेष्ठ नहीं हो जाती । कल को यदि पूनम पांडे को एक फिल्म के पचास करोड़ मिलने लग जाएँगे तो क्या उसके कपड़े उतारने और यू ट्यूब पर अपने वीडियो डालने की कला को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया जाना चाहिए ? और ये मनेजमेंट कालेजों वाले कोई मानवता का कल्याण करने के लिए नहीं बैठे हैं । यहाँ तो ऐसे लोग तैयार किए जाते हैं जो मोटा पैकेज देने वाली कंपनियों के मुनाफे के लिए ग्राहकों को ज़हर तक खिला देने की योग्यता रखते हों । पेप्सी वाली इंदिरा नूई क्या किसी जनकल्याण के कारण फ़ोर्ब्स की दुनिया की पावरफुल महिलाओं की सूची में है ? नहीं , वह तो अपने मालिक के मुनाफे के लिए लोगों में केंसर फ़ैलाने वाले ठंडे की बिक्री बढ़ाने के करण है ।

तोताराम कौनसा चूकने वाला था , बोला- हो सकता है आज तुझे मेरी बात ठीक नहीं लगती हो मगर यदि इसी तरह बाज़ार का दबदबा बढ़ता गया तो यह भी असंभव नहीं है ।

हम क्या कहते- बस , इतना ही कह पाए कि तोताराम शुभ-शुभ बोलो ।

२२-१-२०१२

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Apr 10, 2011

बुड्ढा होगा तेरा बाप

(अमिताभ बच्चन ने 'बुद्धा' और 'बुड्ढा' में कन्फ्यूजन न हो इसलिए अपनी फिल्म 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' में 'बुड्ढा' शब्द की स्पेलिंग रोमन में 'bbuddah' करवाई, १६-३-२०११)


महानायक जी,
नमस्कार । मन तो साष्टांग दंडवत करने का हो रहा है मगर क्या बताएँ कुछ उम्र और कुछ ब्राह्मण होने का दंभ आड़े आ रहा है । आप अन्यथा नहीं लीजिएगा । आपकी नई फिल्म आ रही है -'बुड्ढा होगा तेरा बाप' । पता नहीं, किस महान लेखक ने सुझाया है यह नाम मगर यह तय है कि इस नाम के द्वारा लेखक ने मानव-मन की एक बहुत बड़ी कमजोरी को उजागर कर दिया है । आदमी शादी, बाल-बच्चे और पोते-पोती सब कुछ चाहता है मगर न तो बुड्ढा दिखना चाहता है, न होना चाहता है और न ही बुड्ढा कहलाना चाहता है । जवान दिखने के लिए पता नहीं, क्या-क्या करता है ? सोचता है कि यमराज को धोखा दे देगा । उसे मालूम नहीं कि यमराज के पास सही जन्म तिथि लिखी हुई है और सही समय पर उसके दूत लेने आ जाएँगे और कोई बड़े-से-बड़ा वकील भी जमानत नहीं दिलवा सकेगा ।

आप कोई जवान नहीं हैं और न ही इस फिल्म में जवान का पार्ट किया होगा मगर यह तय है कि जवानों वाला दमखम जरूर दिखाया होगा वरना यह डायलाग हो ही नहीं सकता कि 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' । हो सकता है कि फिल्म में आपको किसी ने 'बुड्ढा' कह दिया होगा तो आपने उसे डाँट पिलाई होगी- 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' ।

तो फिल्म के नाम को यदि हिंदी में लिखा जाए तो कोई परेशानी नहीं मगर रोमन में लिखते समय आपको लगा कि कहीं लोग buddha को 'बुद्धा' न समझ लें जो कि एक महान व्यक्ति का नाम है । वैसे बुद्ध का नाम रोमन में लिखने के लिए 'buddh' ही पर्याप्त है फिर भी अधिकतर लोग अंग्रेजी के प्रभाव के कारण buddha लिखते हैं । मगर सब जानते हैं, विशेषकर भारतीय कि यह ‘बुद्ध’ ही है ‘बुद्धा’ नहीं है । वैसे जहाँ तक खतरे की बात है तो दोनों में एक जैसा ही है क्योंकि बुद्ध ने तो इस संसार के आकर्षण जवानी में ही छोड़ दिए थे और किसी बुड्ढे व्यक्ति से भी यही आशा की जाती है कि वह बूढ़ा होते-होते इस दुनिया का मोह छोड़ दे । मतलब कि दुनिया के मज़े न तो ‘बुड्ढा’ के लिए हैं और न ‘बुद्ध’ के लिए । वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम इसीलिए बनाए गए हैं । मगर अधिकतर लोग मरते-मरते भी से दुनिया से लिपटे रहना चाहते हैं उन्हें बुड्ढा होने, कहलाने और दिखने से डर लगता है । विशेषरूप से फिल्म वालों को क्योंकि उनकी तो रोटी-रोजी ही इस शरीर और नाचने-उछलने पर चलती है । आप तो खैर, अपनी उम्र के अनुसार ही रोल करते हैं मगर कभी-कभी कहानी की माँग के अनुसार 'कारे कजरारे' गाना पड़ जाए यह दूसरी बात है ।

तो आपने दर्शकों को भ्रम से बचाने के लिए 'बुड्ढा' की स्पेलिंग bbuddah करवा दी । बहुत बढ़िया । वैसे फ़िल्में दर्शकों को भ्रमित करने के ही बनाई जाती हैं । कहीं वास्तव में ही किसी आदर्श को फोलो नहीं करने लग जाएँ इसलिए भाण्ड या नचनिये टाइप आदर्श फिल्मों में दिए जाते हैं अन्यथा बाज़ार का सारा धंधा ही खतरे में पड़ जाएगा । यदि रोमन लिपि में हिंदी को लिखने की ध्वनियाँ नहीं है तो इसकी सज़ा आप हिन्दी को क्यों दे रहे हैं । रोमन में ट,ठ,ड,ढ और त,थ,द,ध की ध्वनियों को लिखने के लिए अलग-अलग चिह्न नहीं हैं । ढ़,ड़ की ध्वनियाँ लिखने के लिए भी नहीं । देवनागरी में लिखने में तो यह समस्या नहीं आती । रोमन में तो सत्ता और सट्टा, पट्टा और पत्ता, गधा और गढ़ा, परी और पारी, गन्दा और गंडा एक ही हैं । और फिर रामगढ़ जैसे शब्द तो आप रोमन में लिख ही नहीं सकते । या तो रामगर्ह (ramgarh) लिखें या रामगढ (ramgadh) जब कि यह शब्द है- रामगढ़ । आपने 'बुड्ढा' की जो रोमन स्पेलिंग सुझाई है उसका उच्चारण होगा 'ब्बुड्डाह' । बंधु, ऐसा तो कोई शब्द किसी भी भाषा में नहीं है । हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में तो हमें एक भी शब्द ऐसा नहीं मिला जिसके शुरु में दो व्यंजन जैसे कि क्क,ख्ख,ब्ब,ग्ग आदि आते हों । हो सकता है, आप दुनिया में जगह-जगह घूमते हैं । किसी भाषा में सुन लिया हो । और फिर जब कोई इस स्पेलिग्न से उच्चारण करेगा तो पहले ब..ब.. करना पड़ेगा तो लगेगा कि शाहरुख की तरह कहीं हकला तो नहीं रहा है । वैसे हम आपको इसका एक हल बताते हैं कि 'बुड्ढा' को क्यों न 'बूढ़ा' कर दिया जाए । न तो अर्थ में कोई फर्क पड़ेगा और न बोलने में कोई परेशानी आएगी । वैसे यह भी बताते चलें कि जब 'बुद्ध' का नाम लिखा जाता है तो या तो 'लोर्ड बुद्ध' लिखा जाता है या 'भगवान बुद्ध' ।

हमने चालीस वर्ष हिंदी पढ़ाई है और आपका जन्म भी एक हिन्दी-भाषी परिवार में हुआ है । आपके पिताजी भी भले ही अंग्रेजी के एम.ए., पी.एच.डी. थे, जीवन भर अंग्रेजी पढ़ाई मगर लिखा हिन्दी में ही । आपको भी हिन्दी अच्छी तरह से आती है फिर आप हिन्दी की ‘हिन्दी’ करने और हमारी रोटी-रोजी पर लात मारने पर क्यों तुले हुए हैं ? हम तो आपके अभिनय वाले क्षेत्र में टाँग नहीं अड़ाते । वैसे अपने भारत में यह भी एक धारणा है कि जो गलत हिंदी बोलता है उसे अंग्रेजी का ज्ञाता मान लिया जाता है ।

और अब बुड्ढे वाली बात, सो बंधु, यदि किसी ने बुड्ढा कह दिया तो क्या आसमान टूट पड़ा । काहे को गुस्सा करना । गुस्सा तो गुस्सा ही है चाहे फिल्म में किया जाए या वास्तव में । स्नायु तंत्र पर जोर तो पड़ता ही है । अब अपन कौनसे जवान हैं ? हम जुलाई २०१२ में सत्तर के हो जाएँगे और आप अक्टूबर २०१२ में । अब मान ही क्यों नहीं लेते सच को ? जितना जल्दी अपने को बूढ़ा मानेंगे उतना जल्दी ही दादा बन जाएँगे । बूढ़े होने का भी एक मज़ा है । पता नहीं, आपको उसका पता चला कि नहीं ? हम तो बुढ़ापे का मज़ा ले रहे हैं और यदि कोई बच्चा अभ्यासवश हमें 'अंकल' कह भी देता है तो हम उसको डाँट देते है और 'दादा' या 'बाबा' कहलवाकर ही पीछा छोड़ते हैं ।

वैसे सुना है कि इस फिल्म में हेमामालिनी हैं जो अभी ड्रीम गर्ल बनी हुई हैं तो फिर उसके साथ हीरो का काम करते हुए 'बुड्ढा' कहलवाना आप तो क्या, देवानंद जी भी बर्दाश्त नहीं कर सकते ।

१७-३-२०११

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Nov 15, 2010

चश्मे का हिसाब-किताब


कुछ बातें ऐसी हैं जिनके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता । वे अपने आप हो जाती हैं । न चाहने पर भी हो जाती हैं । जैसे कि मौत, रिटायरमेंट और किसी का वरिष्ठ नागरिक होना । पहले दिवाली के दूसरे दिन सब एक सिरे से मोहल्ले के सभी बड़े स्त्री-पुरुषों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया करते थे । हम सोचा करते थे कि कभी तो हम इतने बड़े होंगे ही कि मोहल्ले के बच्चे-जवान हमारे पैर छूने के लिए आया करेंगे मगर किस्मत की बात कि वरिष्ठ नागरिक बने हुए चार साल हो गए मगर कोई भी पैर छूने नहीं आता । हम अपने मन में तो यह जानते ही हैं कि हममें उम्र बढ़ने के बावज़ूद बुजुर्गों वाली गंभीरता नहीं आई है । और कभी-कभी हमें यह लगता है कि बच्चों को भी हमारी इस कमी का पता चल गया है या फिर हो सकता है कि अब वह चलन ही खत्म हो गया । सब एस.एम.एस. और फोन से ही काम चला लेते हैं । आने-जाने की ज़हमत उठाने की ज़रूरत ही नहीं । आदत से लाचार हमीं अपने से बड़ों के चरण छूने जाते हैं । मगर अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है । हो सकता है कि दस-पाँच बरस में या तो वे या फिर हमारी ही ‘जै राम जी की’ हो जाएगी ।

वैसे तोताराम तो कोई दो घंटे से ही आया बैठा है । पर तोताराम के आने को हम आना नहीं मानते क्योंकि वह तो रोजाना ही आता है । वैसे इसका एक कारण यह भी है कि जब घर में ज़्यादा काम होता है तो हम दोनों की पत्नियाँ यही चाहती हैं कि यदि हम घर के अंदर न आएँ तो अधिक सुविधा रहेगी । तोताराम के आज दोपहर में भी जमे होने का एक कारण यह भी हो सकता है । तभी एक युवा पत्रकार आ गया । हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं । अभी वह संघर्ष कर रहा है । मतलब कि उसे खबरें देने के पैसे नहीं मिलते । हाँ, वह लोगों की छोटी-मोटी खबरें छपवा कर उनसे चाय-पानी का जुगाड़ ज़रूर कर लेता है । वैसे, जब से अखबारों के कई-कई संस्करण निकलने लगे हैं तब से अखबार का नाम भले ही राष्ट्रीय हो मगर उनका चरित्र स्थानीय क्या, गली-मोहल्ले जैसा हो गया है । एक जिला मुख्यालय के भी शहरी और ग्रामीण संस्करण निकलने लगे हैं । अखबार में छपी अपनी खबर को देख कर व्यक्ति फूला नहीं समाता कि अब तो सारा संसार उसे पढ़ रहा होगा मगर असलियत यह है कि पन्द्रह किलोमीटर दूर के गाँव में पढ़े जा रहे अखबार में वह खबर हो ही नहीं । इस प्रकार विज्ञापन भी अधिक मिल जाते हैं और जहाँ तक खबरों के संकलन का प्रश्न है तो आप न्यूज एजेंसियों से इंटरनेट पर ही कमरे में बैठे-बैठे दुनिया भर की खबरें और फोटो डाउनलोड कर सकते हैं ।

तो युवा पत्रकार आया, हमारे पैर छुए और एक-दो अखबारों के दिवाली की बधाई के विज्ञापनों से भरे पन्ने हमारे सामने फैला दिए । हमें लगा, हमारी साधना सफल हुई । कोई तो आया । जैसे कि कोई साधारण आदमी आमरण अनशन पर बैठ जाए और शाम तक उसे सँभालने के लिए कोई न आए । ऐसे में कोई गली का युवा नेता ही आ जाए और कहे कि हम आपकी माँगों को सरकार तक पहुँचाएँगे । अनशन तोड़िये और यह शिकंजी पीजिए । बस, कुछ इसी शैली में हमारा मान रह गया । हमने उसे आशीर्वाद दिया, चाय ऑफर की । उसने विज्ञापनों की भीड़ में से एक चार लाइन का समाचार निकाल कर पढ़वाया । 'मास्टर रमेश जोशी का पुराना चश्मा पचास लाख में नीलाम हुआ' । हमें लगा, यह कारस्तानी भी तोताराम की ही है । असलियत हम जानते है फिर भी एक गर्व की अनुभूति जैसी कुछ हुई । 'पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही' वाली शैली में । सोचने लगे कि अब उन लोगों को पता चलेगा, आँखें फट जाएँगी जिन्होंने हमारी पुस्तकों को पाँच सौ रुपए के पुरस्कार के लायक भी नहीं समझा । तभी एक सज्जन, जिन्हें हम जानते नहीं थे, हमें बधाई देकर बैठकर गए । हमने उन्हें भी चाय प्रस्तुत की ।

चाय पीते-पीते उन्होंने पूछा- मास्टर साहब, इतना महँगा चश्मा किसने खरीदा ?
हम ज़वाब देते इससे पहले ही तोताराम बोल पड़ा- इससे क्या फर्क पड़ता है कि किसने खरीदा ?

तभी युवा पत्रकार बीच में कूदा- समाचार देने तो तोताराम जी आए थे । इनको तो पता होगा ही ।

अब बारी तोताराम की थी, बोला- तुम तो पत्रकार हो । तुम्हें तो मालूम होना चाहिए कि समाचार का सूत्र बताने के लिए संवाददाता को कोई बाध्य नहीं कर सकता ।
अब तक चुप बैठा, अनजान सज्जन कहने लगा- यह ठीक है कि आपको बताने के लिए कोई बाध्य नहीं कर सकता मगर आयकर विभाग के नियमों के अनुसार जिसने भी खरीदा है उसे तो बताना पड़ेगा ही कि इतना पैसा कहाँ से आया ?

आज पता नहीं तोताराम क्यों आक्रामक मुद्रा में था, बोला- लगता है आप आयकर विभाग से हैं । तो महोदय, जब किसी ने मोनिका लेविंस्की की क्लिंटन द्वारा हस्ताक्षरित 'वह' ड्रेस करोड़ों में खरीदी थी तब आप कहाँ थे ? जब मर्लिन मुनरो की प्रथम प्रेमलीला वाला पलंग किसी ने करोड़ों में खरीदा था आपने क्या किया था ?

आयकर विभाग वाला सज्जन पहले तो अचकचा गया मगर फिर कुछ कानूनी हो गया- हमारा विभाग विदेशों में हुए घपलों के लिए जिम्मेदार नहीं है ।

तोताराम बोला- तो फिर यही बता दीजिए कि सचिन तेंदुलकर का बल्ला बयालीस लाख में खरीदने वाला कौन है ? अमिताभ बच्चन के साथ खाना खाने की नीलामी बारह लाख में छुड़ाने वाला कौन है ? उन्हें दो लाख तीस हज़ार का चश्मा किसने भेंट किया ? चलो छोटी-मोटी बातें तो छोड़िये, मुकेश अम्बानी ने मात्र चालीस करोड़ सालाना तनख्वाह में दस हज़ार करोड़ का बँगला कैसे बनवा लिया ? बाबा रामदेव को करोड़ों का हेलीकोप्टर किसने भेंट किया ? और मान लो हमने ही खरीद लिया मास्टर का चश्मा तो क्या घपला कर दिया ?

हमें आयकर विभाग का अधिक अनुभव तो नहीं है पर इतना ज़रूर जानते हैं कि वे आपसे कुछ भी पूछ सकते हैं मगर आप उनसे कुछ नहीं पूछ सकते । टेक्स का एक पैसा कम जमा हो जाए तो मनमाना ब्याज लगा देंगे पर अगर आपने भूल से टेक्स ज्यादा जमा करवा दिया तो वापिस मिलेगा या नहीं इसकी गारंटी नहीं है । हमने पेन कार्ड बनवाते समय सभी कुछ ठीक लिख कर दिया था पर उन्होंने कार्ड में हमारे नाम की स्पेलिंग गलत छाप दी । पूछने गए तो कहने लगे- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । बस, पैसे का हिसाब ठीक होना चाहिए ।

आयकर वाला कहने लगा- मगर जब तोताराम जी या आप अपना रिटर्न भरेंगे तब तो सब दिखाना ही पड़ेगा और इनकम का सोर्स बताना ही पड़ेगा ना ?

अब तोतराम ने छक्का मारा, कहने लगा- जी, हमने ही ख़रीदा है चश्मा । समाचार में यह कहाँ लिखा है कि नकद खरीदा या किस्तों में ? और हाँ, पेमेंट भी हम ही करेंगे मगर पाँच रुपए रोजाना की किस्तों में । ले लेना खर्चे का हिसाब-किताब ।

अब तो आयकर विभाग वाले की शक्ल देखने लायक थी ।

फिर भी हम नहीं चाहते थे कि त्यौहार के दिन मिठास कम हो सो पत्नी से कुछ मिठाई लाने के लिए आवाज़ लगाई ।

७-११-१०

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach

Nov 13, 2010

तोताराम की आवाज़ का पेटेंट


आज तोताराम नहीं आया । नौ बज गए । अब उसके आने की कोई उम्मीद लगती । जैसे ही हम अंदर जाने लगे तो एक उजबंग से सज्जन के साथ तोताराम आता दिखाई दिया । हमने रोकना चाहा, तो बोला- अभी जल्दी में हूँ, वकील से मिलना है ।

हमने पूछा- तेरा वकील से क्या काम आ पड़ा ? क्या कहीं तूने भी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में फ्लेट तो नहीं कबाड़ा था ?

कहने लगा- मौका मिलने पर कौन चूकता है, पर मैं अभी इतना बड़ा आदमी नहीं बना कि उस सोसाइटी में फ्लेट कबाड़ सकूँ । मुख्यमंत्रियों, सेनाध्यक्षों का पेट भरे तो किसी और का नंबर आए ना । मैं तो अपने इस ब्रदर-इन-ला के काम से जा रहा हूँ ।

हमने कहा- तेरे सभी सालों को हम जानते हैं । ये सज्जन उन में से तो कोई भी नहीं हैं ।

कहने लगा- इनकी और मेरी एक ही समस्या है और उसी के कानूनी हल के लिए हम वकील की सलाह लेने जा रहे हैं इसलिए हम दोनों ब्रदर-इन-ला हुए कि नहीं ?

ब्रदर-इन-ला की इस नई व्युत्पत्ति ने हमें आश्चर्यचकित कर दिया ।

हमने कहा- अच्छी बात है । चले जाना, एक-एक चाय तो हो जाए ।

दरअसल हमारी रुचि चाय पिलाने में इतनी नहीं थी जितनी कि कानूनी मामले को जानने में थी ।

हमने पूछा- तुम्हारे साले साहब, सॉरी, ब्रदर-इन-ला की क्या समस्या है ?

तोताराम ने बताया कि इन सज्जन का नाम है 'नवारी लाल' । हमें नाम बड़ा अजीब लगा । पूछने पर तोताराम की जगह वे सज्जन खुद ही बताने लगे- जैसे आप तोताराम जी के भाई साहब हैं वैसे ही हमारे भी । सो भाई साहब, बात यह है कि नाम तो हमारा बनवारी लाल है और हम टीचर के बताए अनुसार बड़े 'बी' से अपना नाम शुरु करते थे मगर जब से एक महानायक 'बिग बी' बन गए तो हमने सोचा- 'राड़ से बाड़ भली' । अपना क्या है, छोटे बी से अपना नाम लिखना शुरु कर लिया करेंगे । फिर पता चला कि उनके साहबजादे भी फिल्मों में चल निकले हैं तो स्माल बी उनके लिए रिज़र्व हो जाएगा । सो कोई टोके उससे पहले ही मैंने अपना स्माल बी भी हटा दिया और अब मात्र 'नवारी लाल' रह गया हूँ । सोचता हूँ, कोई इन बचे हुए तीन अक्षरों को भी कब्ज़ा ले उससे पहले ही इनका तो पेटेंट करवा लूँ ।

अब हम तोताराम की तरफ मुखातिब हुए- तो महाशय तोताराम जी बताइए, आप किस चीज का पेटेंट करवाने जा रहे हैं ? कहीं अपनी आवाज़ का पेटेंट तो नहीं करवाने जा रहे, अमिताभ बच्चन की तरह ? ठीक भी है, इस गुरु गंभीर आवाज़ का पेटेंट करवा ही लेना चाहिए । ऐसी आवाज़ सदियों में ही किसी एक को भगवान अता फरमाता है ।

 तोताराम कहने लगा- मैं सब समझता हूँ तुम्हारा इशारा । ठीक है, मेरी आवाज़ मनमोहन सिंह जी की तरह शालीन है पर है तो विशिष्ट ना । और मुझे मालूम है कि तू इसे अपनी भाषा में 'मिमियाती' हुई आवाज़ कहेगा । मगर याद रख मिमियाती आवाज़ का भी महत्व होता है । क्या दहाड़ती आवाज़ के बल पर अडवानी जी प्रधान मंत्री बन सके ? और मान लो बन भी जाते तो कितना टिक पाते ? और मान लो अटल जी की तरह किसी तरह टिक भी जाते तो क्या दूसरी टर्म के लिए चुने जाते ? और मान लो चुने भी जाते तो क्या ओबामा और मिशेल को इस तरह नचा पाते जैसे कि मनमोहन जी ने दिल्ली और मुम्बई में नचा दिया ? यह इस मिमियाती आवाज़ का ही कमाल है । सो जब तक कोई और दूसरा कूद नहीं पड़े उससे पहले मैं भी अपनी इस मिमियाती आवाज़ का पेटेंट करने जा रहा हूँ । 

हम सोच रहे थे कि ज़माना कितना बदल गया है । राम ने धनुष-बाण का, कृष्ण ने बाँसुरी का, शिव ने त्रिशूल का, विष्णु ने सुदर्शन चक्र का, सरस्वती ने वीणा का पेटेंट नहीं करवाया और लोग हैं कि अपनी आवाज़ का पेटेंट करवा रहे हैं । अरे भाई, आवाज़ क्या अपनी है ? यह तो भगवान की दी हुई है ? और किसे पता है, कब बंद हो जाए मगर नहीं साहब, यह हमारी आवाज़ है और हम इसका पेटेंट करवाएँगे । ठीक है करवाइए । हमें क्या ?

८-११-२०१०

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)


(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach