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Feb 27, 2011
तोताराम और २० करोड़ का शराब का विज्ञापन
(सन्दर्भ : सचिन ने बीस करोड़ का शराब का विज्ञापन छोड़ा । बीस करोड़ का कोकाकोला का विज्ञापन पकड़ा- २७-२-२०११)
हम चबूतरे पर बैठे थे कि तोताराम जल्दी-जल्दी आगे से गुजरने लगा । हमने आवाज़ लगाई- क्या घर भूल गया जो भागा जा रहा है ? कहने लगा- अभी ज़रा जल्दी में हूँ । चाय आते समय पिऊँगा । हाँ, एक बात का ध्यान रखना । कोई शराब के विज्ञापन का प्रस्ताव लेकर आए, तो मना कर देना । भले ही वह बीस करोड़ क्या, दो सौ करोड़ का ऑफर दे । कह देना तोताराम शराब के विज्ञापन नहीं करता ।
हमें आश्चर्य हुआ, बीस करोड़ का विज्ञापन और वह भी तोताराम को ? कब से करने लगा यह साइड बिजनेस ? कभी चर्चा भी नहीं की ।
हमने उसे पकड़ कर रोक लिया, कहा- पहले सारी बात बता । तब जाने देंगे ।
बोला- आज कल शराब बनाने वाले विज्ञापन के लिए सेलेब्रिटीज को ढूँढ़ रहे हैं । सचिन ने तो मना कर दिया है सो अब बचा और कौन ? अब वे मुझे ढूँढते हुए फिर रहे होंगे और तू जानता है कि मैं शराब के पक्ष में नहीं हूँ सो चाहे कितने भी रुपए दें मगर मैं शराब का विज्ञापन नहीं करने वाला । हाँ, कोई कोकाकोला वाला या पेप्सी वाला आए तो कह देना कि मैं अभी आधे घंटे में आ रहा हूँ ।
हमने हँसी आगई, कहा- क्यों भाई, और कोई महत्त्वपूर्ण व्यक्ति नहीं बचा क्या, तेरे अलावा विज्ञापन करने के लिए । बड़े-बड़े बादशाहों और महानायकों को देख ले । कह रहे हैं पैसे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं । किसी की शादी, जन्म दिन कुछ भी हो बुला लो, पैसे दो और करवालो नाच-गाना, कमर मटकवाना, जो चाहो । अब तू ही एक बचा है शालीनता और सिद्धांतों का पालन करने वाला ? और सचिन की जहाँ तक बात है तो उसने शराब नहीं तो कोकोकोला वाला विज्ञापन पकड़ लिया । दोनों में कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं है । शराब पीकर भी आदमी को लगता है कि वह कुछ भी कर सकता है जैसे कि चूहा शराब पीकर बिल्ली से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है । कोकाकोला का विज्ञापन भी ऐसे ही दिखाया जाता है कि उसे पीते ही जो चाहो सो हो जाएगा । वैसे दोनों ही कोई जीवन रक्षक वस्तुएँ नहीं हैं ।
तोताराम कहने लगा- यदि शराब कोई बुरी चीज होती तो क्या सरकार उसे बंद नहीं कर देती ? और तुझे पता नहीं, शराब से जो टेक्स मिलता है उससे कई कल्याणकारी कार्यक्रम चलाती है सरकार । और फिर सचिन ने कहा है कि कोकाकोला वाले विकास के कार्य भी तो करते हैं ।
हमने कहा- किसी गाँव के सारे जलस्रोतों का शोषण करके कोई एक गड्ढा खुदवा देते हैं और प्रचारित कर देते हैं कि इसमें वाटर हार्वेस्टिंग करेंगे । और हो गया विकास । अरे, यहाँ का पानी, यहाँ के पीने वाले और एक रुपए का माल और वह भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, पिलाकर बारह रुपए ले जाते हैं अपने देश । यह है विकास ? इतने रुपए में तो आदमी इससे ज्यादा दूध खरीद सकता है । और जहाँ तक रोजगार की बात है तो लाखों बोतल बनाएँगे और रोजगार मिलेगा पन्द्रह लोगों को । इससे ज्यादा रोजगार तो दस-बीस गाएँ पालने पर लोगों को मिल सकता है ।
सचिन के क्रिकेट और कोकाकोला से जो विकास हो रहा है उसी का परिणाम है कि टी.वी., मोबाइल और कम्प्यूटर सस्ते हो रहे हैं और खाने की चीजें महँगी । बिना पेट में रोटी गए यह सब ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है ।
तोताराम हँसते हुए कहने लगा- नाराज़ न हो बंधु, तुझे नहीं जँचता तो कोई बात नहीं । नहीं करेंगे विज्ञापन । लाखों करोड़ के घोटालों से, सत्तर लाख करोड़ स्विस बैंक में चले जाने से भी जिस देश का कुछ नहीं बिगड़ सकता तो उस देश के एक वरिष्ठ और विशिष्ट नागरिक तोताराम पर भी दस-बीस करोड़ का विज्ञापन छोड़ देने से कोई असर नहीं पड़ेगा ।
अच्छा, अब इस चाय को गरम करवा ले । ठंडी हो गई दीखे ।
हमने कहा- तोताराम, भले ही सचिन को २० करोड़ का शराब का विज्ञापन ठुकराने पर भारत रत्न नहीं मिला हो मगर तुझे अवश्य ही यह दो सौ करोड़ का शराब का विज्ञापन ठुकराने के कारण 'भारत-रत्न' मिलेगा ।
तोताराम ने हमें बड़ी अदा से सलाम ठोंका, और कहा- ज़र्रा नवाज़ी के लिए शुक्रिया ।
२८-२-२०११
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन । Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Jhootha Sach
Feb 16, 2011
टीम इण्डिया और हार-जीत
तोताराम चाय पीने में व्यस्त था और हम अपनी चिंता में । हमने पूछा- तोताराम, अब प्रवीण कुमार के हाथ की चोट कैसी है ?
तोताराम- पता नहीं । उसके स्थान पर श्री संत को ले लिया गया है ।
हम- पर क्या प्रवीण कुमार ठीक हो गया तो श्री संत को निकाल कर फिर प्रवीण कुमार को ले लिया जाएगा?
तोताराम- हो भी सकता है ।
हम- क्या वह श्री संत से बेहतर बॉलर है ?
तोताराम- यह चांस की बात है ।
हम- अब भज्जी की चोट कैसे है ? क्या वर्ल्ड कप तक ठीक हो जाएगा ? भज्जी के बिना तो कैसे चलेगा ?
तोताराम- यह तो होता ही रहता है । कोई न कोई तो खेलेगा ही ।
हम- पर अब टीम इण्डिया की क्या संभावना है ?
तोताराम- अपने वाले तो यही कह रहे हैं कि टीम इण्डिया जीतेगी ।
हम- ऐसा तो हमेशा ही कहते रहते हैं पर १९८३ के बाद जीती तो नहीं अपनी टीम । वैसे अबकी बार तो पूजा-पाठ किए हैं, ख्वाज़साहिब के यहाँ भी चादर चढ़ाई है । जीत जाएँ तो ठीक रहे । अगले वर्ल्ड कप तक तो क्या पता, सचिन सन्यास ले ले । धोनी तो कह रहा है कि सचिन को वर्ल्ड कप का उपहार देंगे । तेरा क्या ख्याल है ?
तोताराम- मेरा ख्याल क्या काम आएगा । काम तो खेल आएगा । अच्छा खेलेंगे, तो जीत जाएँगे । मैं कोई ज्योतिषी हूँ क्या जो बता सकूँ ?
हम- ज्योतिषी तो शरद पवार जी भी नहीं हैं फिर भी जब वे कृषि जिंसों के बारे में बोलते हैं तो महँगाई बढ़ जाती है तो कुछ तो उनके ज्ञान या जुबान में कमाल है ही । फिर भी तेरा मन क्या कहता है ?
तोताराम झल्ला कर कहने लगा- अब चाय भी पीने देगा या नहीं । हद हो गई यार, एक चाय में और कितना भाषण पिलाएगा ? पहले तो तू क्रिकेट वालों की बड़ी टाँग खिंचाई किया करता था । अब क्या हो गया ? बड़ी क्रिकेट की फ़िक्र लग रही है, क्या बात है ? क्या तूने क्रिकेट पर कोई सट्टा लगा रखा है ?
हमने कहा- नहीं ऐसी बात तो नहीं है ।
तोताराम- तो फिर इतना परेशान क्यों हो रहा है ?
हमने कहा- बात यह है तोताराम कि पिछले वर्ल्ड कप के समय हमने क्रिकेट पर कुछ दोहे लिखे थे और एक तेजी से बढ़ते अखबार ने उन्हें छापने और प्रति दोहा हमें बीस रुपए देने का आश्वासन भी दिया था । तीन दोहे छपे भी मगर जैसे ही टीम इण्डिया हारने लगी तो उसने हमारे दोहे छापना बंद कर दिया और साठ रुपए भी खा गए । अबकी बार उन्हीं दोहों को फिर एक अखबार में भेजा है । यदि टीम इण्डिया हारने लगी तो फिर दोहे छपना बंद ।
तोताराम बोला- लगता है, तेरे दोहों से ही पिछली बार टीम इण्डिया हार गई । यदि तू अपने दोहे वापिस ले ले और फिर कभी क्रिकेट के बारे में कुछ भी नहीं लिखे तो मैं तेरी आमदनी की भरपाई कर सकता हूँ । ले यह सौ का नोट और बंद कर अपने अपशकुनी दोहे ।
हमने कहा- तोताराम, क्रिकेटर विज्ञापन के लिए बिकाऊ हो सकते हैं, हमारी कलम नहीं ।
१३-२-२०११
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Dec 22, 2010
रिकार्ड और रिजल्ट
आज तोताराम आया तो हमने उसे कहा- पहले चेहरा पोंछ फिर चबूतरे पर चढ़ना । उसे बड़ा अजीब लगा, बोला- क्यों चेहरे पर क्या लगा हुआ है ? हमने कहा- बड़ी मुश्किल से मावठ (राजस्थान में सर्दियों की बरसात) थमी है और चबूतरा सूखा है । तेरे चेहरे से नूर टपक रहा है, कहीं चबूतरा फिर गीला न हो जाए ।तोताराम चिढ़ कर बोला- तेरे जैसे मनहूस आदमी पर गुस्सा तो बहुत आता है पर क्या करें- 'न तो कूँ और न मो कूँ ठौर' । खैर, कुर्सी तो मँगवा, आज मैं जूट के इस सड़े कट्टे पर नहीं बैठूँगा । आज तो हालत यह हो रही है कि 'आज मैं ऊपर, आसमाँ नीचे' ।
हमने फिर छेड़ा- कभी-कभी ज्यादा शीर्षासन करने से ऐसे हो जाता है ।
तब तक पोता कुर्सी ले आया था । तोताराम हमें घूरता हुआ कुर्सी पर बैठ गया और बोला- आज केवल चाय से काम नहीं चलेगा । पकौड़े भी बनवा ले । खबर ही ऐसी लाया हूँ कि उछल पड़ेगा ।
पूछा- ऐसी क्या खबर है ? क्या भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता मिल गई या २-जी स्पेक्ट्रम का पैसा रिकवर हो गया या पाकिस्तान ने आतंकवादी शिविर नष्ट कर दिए या स्विस बैंक का काला पैसा देश वापिस आ गया या प्याज फिर से पच्चीस रुपए पर आ गया ?
तोताराम ने कहा - नहीं, ऐसी कोई छोटी-मोटी खबर नहीं है । सचिन ने दक्षिणी अफ्रीका के खिलाफ अपना पचासवाँ टेस्ट शतक बना कर इतिहास रच दिया ! बता, किस खिलाड़ी ने बनाए हैं इतने शतक ? ब्रेडमैन ने भी नहीं । अभी टाइम्स मैगजीन के मुखपृष्ठ पर सचिन का फोटो आया है और उसके वन डे में दोहरे शतक को सबसे बड़ी खेल घटना माना गया है ।
-और पचासवाँ शतक बनाने के बाद भारत आउट हो गया होगा ।
-क्या तूने मैच देखा था ?
-नहीं, मगर जब किसी की केवल रिकार्ड पर ही निगाह होती है तो ऐसा ही होता है । देखा नहीं, द्रविड के भी जैसे ही बारह हज़ार रन पूरे हुए तो वह भी आउट हो गया । पर पारी की हार से तो भारत को कोई नहीं बचा सका, न सचिन, न द्रविड ।
-पर दक्षिणी अफ्रीका की ६२० रन की पारी की चमक तो सचिन के ५० वें शतक से कम हो ही गई ।
-तू चमक को लिए फिरता है । बात तो परिणाम की है । और परिणाम यह है कि भारत एक पारी और २५ रन से हारा और दक्षिणी अफ्रीका जीता । सचिन कितने भी रिकार्ड बना ले पर जब तक भारत वर्ल्ड कप नहीं जीतता तब तक कोई भी चमक कपिल से ज्यादा नहीं हो सकती ।
तोताराम ने कहा- मास्टर, तेरी यही सबसे बड़ी खराबी है कि तू खुश होना जानता ही नहीं ।
हमने कहा- तोताराम, ऐसी बात नहीं है । हमें भी सचिन की उपलब्धि से खुशी है मगर क्या तुझे नहीं लगता कि किसी महल का दीपक देखकर कब तक जमना-जल में खड़े रहकर पूस की रात काटी जा सकती है ? मुकेश अम्बानी ने पाँच हज़ार करोड़ का घर बनवा लिया मगर अपने घर की टपकती छत को इसी आधार पर कैसे भूला जा सकता है ? मुकेश ने 'दुनिया मुट्ठी में कर ली' मगर आम आदमी के हाथ से तो दाल-प्याज तक फिसल गए । करोड़ों बच्चों को क्रिकेट क्या, स्कूल, खेल के मैदान तो दूर, पूरा सा भोजन नहीं मिलता । किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो ९ प्रतिशत जी.डी.पी. पर क्या गर्व करें ? मनमोहन जी के ईमानदार होने पर गर्व करें या उनकी नाक के नीचे होने वाले लाखों करोड़ के घोटाले पर सिर पीटें ? गाय बहुत सुन्दर है मगर दूध नहीं देती तो क्या उसे चाटें ? गाँधी जी ने कहा था कि किसी देश की प्रगति उस देश के सबसे गरीब आदमी की हालत से नापी जानी चाहिए । खेल-तमाशे, मेले-उत्सव, नाच-गाने, दो रोटी मिलने के बाद ही अच्छे लगते हैं । सच तो यह है तोताराम, कि यदि आज कोई मृत्यु का सरल, बिना दर्द का साधन निकल आए और सरकार उसे जनता को उपलब्ध करवादे तो सच मान, इस देश के करोड़ों लोग तत्काल तैयार हो जाएँगे । जीवन के प्रति इतनी निराशा हमें तो इस उनहत्तर साल के जीवन मे आज पहली बार दिखाई दी है ।
किस रिकार्ड और किस चमक को देखकर इस सूचीभेद्य अंधकार को काटें । कहते हैं 'रात भर का है मेहमाँ अँधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा' मगर जब रात खत्म होगी तभी तो सवेरा आएगा ।
कहते-कहते हमारी आँखों गीली हो गईं, हमने कंधे पर रखे गमछे से उन्हें पोंछा । तोताराम ने हमारे कन्धे पर हाथ रख दिया, बोल वह भी कुछ नहीं सका । बोलने को था भी क्या ?
इस बीच पता नहीं कब चाय ठंडी हो गई ? पत्नी को फिर से चाय गरम करने के लिए कहने का भी मन नहीं हुआ ।
प्रिय पाठको, हम आपकी खुशी से जलते नहीं है बल्कि यही सोच कर खुश हैं कि चलो कोई तो खुश है, भले ही गफलत में ही सही ।
२०-१२-२०१०
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Nov 4, 2010
पचास लाख में चश्मे की नीलामी
आज जब रोज हजारों करोड़ की रिश्वत, घोटालों और निवेश की खबरें पढ़ते है तो हमें उस दिन को याद करके हँसी आ जाती है जब हम रिटायर होने वाले थे । बड़े बाबू ने हिसाब लगाकर बताया था-गुरु जी, आपको रिटायरमेंट पर पूरे पाँच लाख मिलेंगे । हमने कहा- बड़े बाबू, उस समय आप हमारे साथ रहना क्योंकि हमारी गणित कमज़ोर है । क्या पता, गिनने में गलती हो जाए । जब बड़े बाबू ने बताया कि यह रकम आपको नकद नहीं मिलेगी बल्कि आपके बैंक खाते में जमा होगी तब कहीं जाकर तसल्ली हुई । चलो,जितना आसानी से गिना जा सके उतना ही थोड़ा-थोड़ा करके निकलवाते रहेंगे ।
तभी तोताराम ने हमारा ध्यान भंग किया- मास्टर, तेरा चश्मा कितने में बेचेगा ?
हमने कहा- बेचना क्या है, तू ऐसे ही ले जा । इसके ग्लास बोतल के पेंदे जैसे हैं और इतने भारी कि दो चार मिनट में ही नाक दुखने लग जाती है । पोती भी कह रही थी- बाबा, अब इस चश्मे को छोड़ दो नया बनवा लो । छोड़ना तो है ही ।
बोला- फिर तू अखबार कैसे पढ़ेगा ? दूसरा है क्या ?
हमने उत्तर दिया- अब अखबार पढ़ने के कोई सेन्स नहीं है । रोज एक जैसी खबरें आती हैं । सवेरे-सवेरे वही हत्या, गबन, घोटाले, एक्सीडेंट, बलात्कार, चोरी, डाका पढ़-पढ़ कर जी घबराने लगता है । और जब से यह पढ़ा है कि शहीदों की विधवाओं के मकान भी मुख्य मंत्री और जनरल हड़प गए तो डर लगने लग गया है । कलियुग क्या, महाकलियुग आ गया है । सोचते हैं, अखबार पढ़ना ही छोड़ दें । वैसे कभी कभार कोई चिट्ठी-पत्री लिखनी हुई तो देख विचारेंगे । नया बनवा लेंगे । तू तो इसे ले ही जा ।
तोतराम बोला- बंधु, मैं कोई चीज मुफ्त में नहीं लेता । तेरे चश्मे की नीलामी करते हैं । जितने मिल जाएँ, तेरे ।
अब हमें भी इस खेल में मजा आने लगा था । सो पत्नी से चश्मा मँगवाया । चश्मा हमारे सामने स्टूल पर रख दिया गया । तोताराम ने हमारी पत्नी से कहा- भाभी, आप यहीं रुको । गवाह के हस्ताक्षर भी तो होंगे । चाय नीलामी के बाद बना लेना । आप बिडर होंगी । तो बोलो, मास्टर रमेश जोशी के चश्मे की रिज़र्व प्राइस है बयालीस लाख एक रुपए ।
पत्नी भी इस खेल में शामिल हो गई और अंदर से बेलन ले आई और दो-तीन बार स्टूल पर ठोंक कर बोली- चिक्की के दादाजी के चश्मे की रिजर्व बोली है बयालीस लाख एक रुपए । जो भी सज्जन इससे ज्यादा की बोली लगाना चाहते हैं, लगा सकते हैं ।
पत्नी की आवाज़ की गूंज भी खत्म नहीं हुई थी कि तोताराम बोल पड़ा- पचास लाख । और कोई चौथा व्यक्ति उस समय आसपास भी नहीं था सो अगली बोली लगने की संभावना नहीं थी । पत्नी ने फिर तीन बार स्टूल पर बेलन ठोंका- पचास लाख एक, पचास लाख दो, पचास लाख तीन । और घोषणा कर दी कि पचास लाख में चश्मा तोताराम जी का हुआ ।
तोताराम ने कहा- भाभी, आप गवाह रहना । और अपनी जेब से चेक निकाल कर हमारे हाथ पर रख दिया । पूरे पचास लाख की रकम लिखी हुई थी ।
हमने कहा- तोताराम, यह नाटक ठीक तेरी योजना के अनुसार पूरा हुआ पर हमें यह बात अभी तक समझ में नहीं आई कि तुमने चश्मे की बोली बयालीस लाख एक रुपए ही क्यों लगाई ? इतनी बड़ी बोली में एक रुपए का क्या महत्व है ? पूरे बयालीस लाख क्यों नहीं रखा ?
कहने लगा- बात एक नहीं, एक लाख रुपए की भी नहीं है । मुझे तो अपने मास्टर का एक रिकार्ड बनवाना था सो बनवा दिया । अरे, जब सचिन का पुराना बल्ला बयालीस लाख में बिक सकता है तो एक राष्ट्र निर्माता का वह चश्मा जिससे उसने देश के लिए बड़े-बड़े सपने देखे हैं, बयालीस लाख से अधिक में क्यों नहीं बिक सकता ? इतना कह कर उसने पचास लाख का एक चेक हमारे हाथ पर रख दिया । अब तो तोताराम की इस मजाक की योजना पूरी तरह से स्पष्ट हो गई । यदि यह नाटक नहीं होता तो उसे क्या पता था कि चश्मा पचास लाख में नीलाम होगा ।
हमने कहा- तोताराम, तेरे खाते में तो पचास लाख पैसे भी नहीं हैं फिर यह चेक काटने का क्या मतलब ? मान ले यह चेक हमने बैंक में डाल दिया तो ?
कहने लगा- मास्टर, ऐसा मत करना नहीं तो मुझे जेल की सजा हो जाएगी । इस देश में भले ही करोड़ों-अरबों का घपला करने वालों पर कार्यवाही न हो, देशद्रोहियों को फाँसी देने का निर्णय लेने में बरसों लग जाए मगर चेक अनादरण के मामले में फटाफट सजा हो जाएगी । प्लीज, बैंक में मत डाल देना ।
हम इस चेक को कौन सा बैंक में डालने वाले थे हम तो तोताराम से मज़ाक कर रहे थे । हमने वह चेक पता नहीं कहाँ रख दिया जैसे कि बच्च्चों के चूरण की पुड़िया में निकलने वाले खेलने के नोट ।
३१-१०-२०१०
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Dec 20, 2009
क्षमा बडन को चाहिए
आदरणीय बाल ठाकरे जी,जय महाराष्ट्र, जय 'मराठी मानूस' । सबसे पहले तो हम इस बात के लिए क्षमा माँगते है कि हम आपको हिन्दी में पत्र लिख रहे हैं । मराठी की लिपि देवनागरी है इसलिए पढ़ तो सकते हैं, यदि हम महाराष्ट्र में रहते होते तो शीघ्र ही बोलना भी सीख जाते । तब यदि विधान सभा में शपथ लेने की नौबत आती तो हम मराठी में ही शपथ लेते और कभी भी आज़मी की तरह हिन्दी में शपथ लेने जैसा जघन्य अपराध नहीं करते । दूसरे, हम सचिन की तरफ़ से भी क्षमा माँगते हैं । आपके सलाह देने के बाद से इतना डर गया कि अहमदाबाद में मात्र चार रन पर ही आउट हो गया । अमितजी और मधुर भंडारकर समझदार है जो तत्काल ही क्षमा माँग ली ।
आजकल मास्टरों और देश को रास्ता दिखने वालों तक को दिशाओं का ज्ञान नहीं है तो दसवीं-बारहवीं पास सचिन को इतिहास-भूगोल का इतना ज्ञान कहाँ से होता । उसे आप और आपके महान आदर्शों तथा इतिहास-भूगोल का ज्ञान होता तो ऐसा नहीं बोलता । जब १९६० में बंबई का महाराष्ट्र और गुजरात में विभाजन हुआ और उससे भी पहले जब सौ से भी अधिक लोगों ने मराठी सम्मान और महाराष्ट्र के निर्माण के लिए बलिदान दिया था तब तो वह पैदा भी नहीं हुआ था । वह तो आप और हम जैसे लोगों को मालूम है । सचिन तो सोलह साल का होते ही क्या, उससे भी पहले से ही क्रिकेट खेलने लग गया था । कहाँ से यह सब समझ पाता । हमें ही आज तक कुवैत और सिंगापुर की राजधानियों का पता नहीं है ।
दुनिया में करीब दो सौ देश हैं । सभी मात्र राष्ट्र ही हैं । महाराष्ट्र कोई भी नहीं । राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र होता है । भारत से बड़ा महाभारत होता है । ब्राह्मण से बड़ा महाब्राह्मण होता है जो मृतक-कर्म का दान लेता है । तो सचिन ने कहा- मुम्बई सारे भारत की है । यह भी नहीं सोचा कि यदि मुम्बई सारे भारत की हो गई तो आपके और राज के पास क्या रहेगा । जैसे कश्मीर हिंदू पंडितों का नहीं हो सकता वैसे ही मुम्बई किसी भारतीय की कैसे हो सकती है ?
महाराष्ट्र के निर्माण के लिए सौ से भी अधिक लोगों ने बलिदान दिया । किसी को तो बलिदान देना ही पड़ता है । यदि सभी समझदार लोग अपना बलिदान दे देते तो आज महाराष्ट्र और 'मराठी मानूस' की अस्मिता की रक्षा कौन करता ? राज्य बनवाना सरल है पर आप और राज की तरह दिन रात भूखे रहकर काम करना अधिक कठिन है । आप नहीं होते तो महाराष्ट्र का क्या होता । हम आपके स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करते हैं ।कुछ लोग आपको 'बूढ़ा बाघ' कहते हैं । उन्हें पता नहीं कि शेर-बाघ कभी बूढ़े नहीं होते । बूढ़े हो भी जाएँ तो भी कोई उनके पास जाने की हिम्मत नहीं कर सकता । हमें तो प्रभु, सच कहें, मरे बाघ की खाल छूने से भी डर लगता है । पता नहीं कैसे पुराने राजा मरे बाघ पर पैर रखकर, हाथ में बंदूक थामे फ़ोटो खिंचवा लेते थे । बाघ बूढ़ा हो जाता है तो भी भूख तो लगती ही है । पंचतंत्र में एक बूढ़ा बाघ सोने का कड़ा दिखाकर लोगों को ललचाता था और पास आने पर अपना भोजन बना लेता था । अब जब आपके सोने के कड़े राज लेकर भाग गया तो पेट पालने के लिए कुछ तो करना ही पड़ता ना ।
आपकी जाति का हमें पता नहीं । वैसे भी कहा गया है- "जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान" । ज्ञान, भगवा वेष और गले में माला के कारण आप ब्राह्मण लगते हैं और रजोगुण के कारण क्षत्रिय । कुछ भी हो दोनों ही दशाओं में आप बड़े हैं । "क्षमा बड़न को चाहिए" । हमारे एक साथी थे जिनको उनके एक मातहत ने जाति सूचक शब्दों के आरोप के चक्कर में उलझा दिया । उसके बाद से उन्होंने अपने आफिस में आंबेडकर की तस्वीर लगा ली और हर मामले में 'अम्बेडकर-अम्बेडकर' की रट लगाते थे । सो अब भविष्य में कुछ भी प्रश्न पूछने पर सचिन भी 'जय महाराष्ट्र,जय मराठी मानूस' के अलावा कुछ भी नहीं बोलेगा । हमारे गाँव में एक ठाकुर साहब थे । जब उन्हें कोई पूछता कि धरती का बीच कहाँ है तो वे ज़मीन पर लाठी गड़ा कर कहते कि यह क्या है ? लोगों को मानना पड़ता कि धरती का बीच वहीं है जहाँ ठाकुर साहब कह रहे हैं । सो अब सचिन को भी धरती के बीच का पता लग गया है । आप उसे क्षमा दान दें जिससे वह अगले मैचों में ठीक से खेल सके ।
लोग बहुत गर्व कर रहे हैं कि सचिन ने सत्रह हज़ार रन बना लिए हैं । इसमें क्या बड़ी बात है । आप अब तक क्रिकेट खेलते रहते तो पचास हज़ार रन बना लेते और वह भी नोट-आउट । आप को आउट करने की हिम्मत किस बालर में हो सकती है । यदि स्टंप गिर भी जाते तो एम्पायेर नो-बाल दे देता । जान तो सभी को प्यारी होती है । हमारे एक और ठाकुर साहब थे । क्रिकेट खेलते थे और बालर और फील्डर उनके मुसाहिब होते थे । एक बार गेंद शाट लग कर जाने कहाँ चली गई । गेंद नहीं मिली सो नहीं मिली और ठाकुर साहब आजीवन रन बनाते रहे । उनके शतकों का रिकार्ड आज तक नहीं टूटा है । सचिन को राजनीति की पिच पर रन नहीं लेना चाहिए था । जब भगवान की दया से क्रिकेट से पैसा मिल रहा है तो राजनीति की कीचड़ वाली पिच पर क्यों उतरा जाए ? राजनीति वैसे भी भले लोगों के बस का काम नहीं है । जब दारू की एक दुकान के पास दूसरी दुकान खुलती है तो बिक्री पर असर तो पड़ता ही है ।
हम आपकी दो बातों से विशेष प्रभावित हैं और मन ही मन ईर्ष्या भी करते हैं । एक तो आपके पास अपना पत्र है जिसमें आप जो चाहे, जितना चाहे लिख सकते हैं । हम तो पचास रचनाएँ भेजते हैं तो कहीं जाकर एक छपती है । यदि हमारे पास अपना पत्र होता तो सच कहते हैं हम भी कोई न कोई रिकार्ड बना कर ही मानते । दूसरी यह कि आपके सिर पर अभी तक काले, घने, चमकदार बाल हैं जब कि हम तो अड़सठ साल में ही गंजे होने लग गए हैं । कहने को तो तिलक भी 'बाल' गंगाधर थे । पर पता नहीं उनके सिर पर कितने बाल, थे भी या नहीं क्योंकि वे पगड़ी बाँधते थे । नेहरू जी के सिर पर भी बाल बहुत ही कम थे तभी टोपी नहीं उतारते थे । हमें तो आज तक यह समझ नहीं आया कि क्यों उनके जन्म दिन को 'बाल-दिवस ' के रूप में मनाते हैं जब कि बालों को देखते हुए तो यह गौरव आपको मिलना चाहिए था । बड़ी नाइंसाफ़ी है ।
खैर, जय महाराष्ट्र, जय 'मराठी मानूस' । भूल चूक के लिए एडवांस में माफ़ी ।
१७-११-२००९
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Jhootha Sach
Nov 1, 2008
मास्टर ब्लास्टर एंड मास्टर
प्रिय सचिन,
आशीष और पैंतीसवे जन्मदिन की बधाई | तुम क्रिकेट के मास्टर हो, और हिन्दी के भूतपूर्व मास्टर | तुम ब्लास्टर हो पर हमने ब्लास्ट करने जैसी कोई आतंकवादी गतिविधि अंजाम नहीं दी | तुमने पिच पर चौके लगाए और हमने बच्चों की कापियों में स्पेलिंग की गलतियाँ साफ़ करने के चोके लगाए | तुमने बहुत शतक लगाए तो हमने भी हमेशा शत-प्रतिशत परिणाम देकर चालीस वर्षों में सैंकडों शतक लगाए हैं | पिच पर लगे शतक और मिलनेवाली रकम का हिसाब लगाया जाए तो एक शतक करोड़ों का बैठता है | जबकि हमें सैंकडों शतकों के बावजूद एक भी एक्स्ट्रा इन्क्रीमेंट नहीं मिला | वही सूखी तनख्वाह |
तुमने साफ़ कह दिया कि अभी संन्यास लेने का कोई इरादा नहीं है, वरना तो जाने कितने लोग पवार सा'ब को घेर लेते और उनके अन्न उत्पादन के काम में बाधा डालने लग जाते | यूँ तो गली-गली में बच्चे धूप में दौड़-धूप करके सचिन बनने के सपने देखते हैं पर सबके जुगाड़ कहाँ फिट हो पाते हैं | तुम घायल हुए, ज़ीरो पर आउट हुए, अनफिट हुए, पर किसी प्रकार पिच से चिपके रहे | जामे ही रहना चाहिए | हमारी बात और है, फिट होते हुए भी, साथ के होते ही सरकार ने रिटायर कर दिया | अब किसी स्कूल में दो हज़ार की मास्टरी करो वह मज़ा कहाँ | वैसे ही जैसे तुम किसी स्कूल में पी.टी.आई. बन जाओ या अपने होटल में खाना परोसो |
तुम ही क्यों संन्यास लो? छियासठ बरस के अमिताभ 'मेरी मखणा' गा रहे हैं | अस्सी के अडवाणी प्रधानमंत्री बनने का ख़्वाब देख रहे हैं, संसद के सामने श्रंखला बना रहे हैं तो तुम श्रंखला खेलना क्यों छोडो? व्यक्ति को कमाई के धंधे कि पिच पर पिचक जाने के बाद भी चिपके रहना चाहिए| लोगों का काम है कहना, कुछ तो लोग कहेंगे | ऐसी बातों के समय हीयरिंग-एड निकाल कर जेब में रख लेनी चाहिए | लोग तो पैंसठ साल नौकरी करने के बाद भी मंत्री बन जाते हैं और तुम उनके पोतों की उमर्में संन्यास ले लो ! ख़ुद तो एक पेंशन पेल रहे हैं राजनीति में पिटने के बाद सांसद की पेंशन पेलेंगे | तुम्हारी कौनसी पेंशन है | जब तक खेलो तब तक दिहाड़ी और तभी तक विज्ञापन बाद में कौन पूछता है | वर्ल्ड कपविजेता कपिल देव को मैच देखने का पास तक नहीं दिया |
रन का क्या, बने, न बने | और वैसे भी आजकल मैच देखने कौन जाता है ? लोग तो चीयर-गर्ल्स को देखने ज़्यादा जाते हैं जैसे मेले में मूर्ति के दर्शन करने कम और जूते चुराने, जेब काटने, और गोलगप्पे खाने ज़्यादा लोग जाते हैं |
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(२५-अप्रेल-२००८ सीमा संदेश,श्रीगंगानगर से प्रकाशित )
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.
Jhootha Sach
आशीष और पैंतीसवे जन्मदिन की बधाई | तुम क्रिकेट के मास्टर हो, और हिन्दी के भूतपूर्व मास्टर | तुम ब्लास्टर हो पर हमने ब्लास्ट करने जैसी कोई आतंकवादी गतिविधि अंजाम नहीं दी | तुमने पिच पर चौके लगाए और हमने बच्चों की कापियों में स्पेलिंग की गलतियाँ साफ़ करने के चोके लगाए | तुमने बहुत शतक लगाए तो हमने भी हमेशा शत-प्रतिशत परिणाम देकर चालीस वर्षों में सैंकडों शतक लगाए हैं | पिच पर लगे शतक और मिलनेवाली रकम का हिसाब लगाया जाए तो एक शतक करोड़ों का बैठता है | जबकि हमें सैंकडों शतकों के बावजूद एक भी एक्स्ट्रा इन्क्रीमेंट नहीं मिला | वही सूखी तनख्वाह |
तुमने साफ़ कह दिया कि अभी संन्यास लेने का कोई इरादा नहीं है, वरना तो जाने कितने लोग पवार सा'ब को घेर लेते और उनके अन्न उत्पादन के काम में बाधा डालने लग जाते | यूँ तो गली-गली में बच्चे धूप में दौड़-धूप करके सचिन बनने के सपने देखते हैं पर सबके जुगाड़ कहाँ फिट हो पाते हैं | तुम घायल हुए, ज़ीरो पर आउट हुए, अनफिट हुए, पर किसी प्रकार पिच से चिपके रहे | जामे ही रहना चाहिए | हमारी बात और है, फिट होते हुए भी, साथ के होते ही सरकार ने रिटायर कर दिया | अब किसी स्कूल में दो हज़ार की मास्टरी करो वह मज़ा कहाँ | वैसे ही जैसे तुम किसी स्कूल में पी.टी.आई. बन जाओ या अपने होटल में खाना परोसो |
तुम ही क्यों संन्यास लो? छियासठ बरस के अमिताभ 'मेरी मखणा' गा रहे हैं | अस्सी के अडवाणी प्रधानमंत्री बनने का ख़्वाब देख रहे हैं, संसद के सामने श्रंखला बना रहे हैं तो तुम श्रंखला खेलना क्यों छोडो? व्यक्ति को कमाई के धंधे कि पिच पर पिचक जाने के बाद भी चिपके रहना चाहिए| लोगों का काम है कहना, कुछ तो लोग कहेंगे | ऐसी बातों के समय हीयरिंग-एड निकाल कर जेब में रख लेनी चाहिए | लोग तो पैंसठ साल नौकरी करने के बाद भी मंत्री बन जाते हैं और तुम उनके पोतों की उमर्में संन्यास ले लो ! ख़ुद तो एक पेंशन पेल रहे हैं राजनीति में पिटने के बाद सांसद की पेंशन पेलेंगे | तुम्हारी कौनसी पेंशन है | जब तक खेलो तब तक दिहाड़ी और तभी तक विज्ञापन बाद में कौन पूछता है | वर्ल्ड कपविजेता कपिल देव को मैच देखने का पास तक नहीं दिया |
रन का क्या, बने, न बने | और वैसे भी आजकल मैच देखने कौन जाता है ? लोग तो चीयर-गर्ल्स को देखने ज़्यादा जाते हैं जैसे मेले में मूर्ति के दर्शन करने कम और जूते चुराने, जेब काटने, और गोलगप्पे खाने ज़्यादा लोग जाते हैं |
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(२५-अप्रेल-२००८ सीमा संदेश,श्रीगंगानगर से प्रकाशित )
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